- एक कमरे में बनाए गए स्टोर रूम में जंग खा रहे हैं बेड, एक कक्ष में बैठते हैं दो चिकित्सक
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की ओर लोगों को आकर्षित करने के लिए शुरू किए गए राजकीय आयुवेर्दिक चिकित्सालय अपनी उपयोगिता साबित करने के मामले में पिछड़ रहे हैं। इन अस्पतालों के लिए आज तक विभाग की ओर से खुद के भवनों तक की व्यवस्था नहीं की जा सकी है।
जिले में अधिकांश अस्पताल सीएचसी और पीएचसी परसिर में उपलब्ध कराए गए एक-दो कमरों से संचालित किए जा रहे हैं। मेरठ जिले के सबसे बड़े 25 शैय्या वाले आयुर्वेदिक चिकित्सालय की स्थिति यह है कि इसके लिए भेजे गए बेड स्टोर के रूप में प्रयोग किए जाने वाले रूम में जंग खा चुके हैं। जबकि यहा तैनात दो चिकित्सक एक ही कक्ष में बैठकर बारी-बारी से रोगियों को देखते रहते हैं।
मेरठ जनपद में 18 आयुर्वेदिक और चार यूनानी अस्पताल लंबे समय से चलाए जा रहे हैं। पूर्व में इन्हें किराए के भवन में चलाया जाता रहा। वर्ष 2018 में सरकारी स्तर से लिए गए निर्णय के आधार पर अधिकतर चिकित्सालयों को निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और उच्चीकृत स्वास्थ्य केन्द्र परिसर में उपलब्ध कराए गए कमरों में शिफ्ट कर दिया गया। इन स्थानों पर कहीं एक, तो कहीं दो कमरे राजकीय चिकित्सालय के लिए उपलब्ध हो सके।
मेरठ जनपद का सबसे बड़ा राजकीय चिकित्सालय 25 शैया वाला है। जिसे कंकरखेड़ा की टीकाराम कालोनी स्थित पीएचसी परिसर में उपलब्ध तीन कमरों में शिफ्ट किया गया है। यहां की स्थिति यह है कि तीन कमरों में एक कमरा दो चिकित्सकों के लिए है। एक कमरे को स्टोर रूम की शक्ल दी गई है। जिसमें पूर्व में उपलब्ध कराए गए 25 बेड को एक के ऊपर एक करके रखा गया है।
इस अवधि में अधिकांश बेड जंग खाकर कबाड़े में तब्दील हो चुके हैं। जबकि तीसरे कमरे का प्रयोग रोगियों के बैठने और स्टाफ के अन्य दो कर्मचारियों के लिए किया जाता है। राजकीय आयुर्वेद चिकित्सालय के प्रभारी डा. संजय कुमार और उनके सहयोगी डा. सौरभ सिंह का कहना है कि अगर प्रशासन स्तर से भूमि उपलब्ध करा दी जाए, तो विभाग की ओर से भवन निर्माण कराया जा सकता है।
दूसरे जनपदों में कुछ स्थानों पर ऐसा किया जा चुका है। एक मार्च को प्रभारी ने अपने स्तर से क्षेत्रीय आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा अधिकारी को एक पत्र भी प्रेषित किया है। जिसमें कहा गया है कि स्वयं का भवन न होने के कारण जनता को सेवाओं का समुचित लाभ नहीं दिया जा पा रहा है।
आयुर्वेद सेवाएं निदेशक की ओर से पूर्व में एक पत्र प्रदेश भर के अधिकारियों को प्रेषित किया गया है। जिसमें अपने स्तर से प्रयास करके भूमि की व्यवस्था कराने की अपेक्षा की गई है। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधियों के स्तर से अगर इसमें सहयोग किया जाए, तो विभाग के भवन में आयुर्वेदिक चिकित्सा का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।
मरीज ही भर्ती नहीं, 25 शैय्या किस काम की
अव्वल तो राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय के पास अपना भवन नहीं हैं, ऊपर से मरीजों को भर्ती करने की कोई सुविधा नहीं है। अगर राजकीय चिकित्सालय में मरीज भर्ती करना पड़े, तो इसके लिए भोजन की व्यवस्था से लेकर रात्रि में देखरेख के लिए स्टाफ, इमरजेंसी के लिए चिकित्सक आदि की जरूरत होगी। चिकित्सालय के रिकॉर्ड के मुताबिक यहां कभी मरीज भर्ती ही नहीं किए जा सके।
ऐसे में पूर्व में जो भोजन बनाने के लिए कर्मचारी, भोजन सामग्री आदि की सुविधाएं रही हैं, उन्हें काफी पहले बंद किया जा चुका है। लब्बोलुआब यह है कि वर्तमान में तीन कमरों में चलने वाले इस अस्पताल के साथ 25 शैय्या शब्द भले ही जुड़ता हो, यहां 25 शैय्या के लिए न भवन है, न स्टाफ है और शायद न ही यहां मरीजों को भर्ती करने की आवश्यकता है। क्योंकि भर्ती किए जाने लायक बीमार होने की स्थिति में परिजन मरीज का आधुनिक चिकित्सा पद्धति से उपचार कराते हैं।
दो फार्मेसी पर छापे, चार दवाई के सैंपल भरे
क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा विभाग की टीम ने दो स्थानों पर छापेमारी की। जिसके अंतर्गत आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने वाली दो फार्मेसी से चार दवाई के सैंपल भरे गए। क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा अधिकारी डा. रेनू ने विभागीय टीम के साथ दो फार्मेसी पर आकस्मिक रूप से छापा मारा। जहां दोनों स्थानों से दो-दो दवाई के सैंपल भरे गए।
डा. रेनू ने बताया कि यह सैंपल लखनऊ लैब में भेजे जाएंगे। जहां से रिपोर्ट आने के बाद अग्रिम कार्यवाही की जाएगी। गौरतलब है कि एक आयुर्वेदिक हेल्थ कैप्सूल में स्टेरायड की मात्रा मिलने के बाद से विभाग ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है। लखनऊ मुख्यालय से सभी क्षेत्रीय अधिकारियों को इस सिलसिले में आदेश जारी किए गए हैं।

