जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: बिहार में मतदाता सूचियों को लेकर उठे विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होनी है। मामला विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद जारी मसौदा मतदाता सूची से जुड़ा है, जिसे लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने इस मामले में 12 और 13 अगस्त की सुनवाई तिथि तय की थी।
निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया है कि कानूनन मसौदा सूची से हटाए गए नामों की अलग सूची बनाने या उनके हटने के कारणों को सार्वजनिक करने की बाध्यता नहीं है। साथ ही, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम पहले ही उठा चुका है।
एसआईआर में सामने आए प्रमुख आंकड़े?
निर्वाचन आयोग ने 24 जून से 25 जुलाई 2025 तक बिहार में कराए गए एसआईआर गणना चरण के महत्वपूर्ण निष्कर्ष साझा किए:
बिहार में कुल 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे
इनमें से 91.69% यानी 7.24 करोड़ मतदाताओं ने अपने गणना फॉर्म समय पर जमा किए
22 लाख मतदाता मृत पाए गए
36 लाख मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित या लापता मिले
7 लाख से अधिक मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत पाए गए
मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए अब तक 10,570 व्यक्तिगत फॉर्म प्राप्त हुए हैं
राजनीतिक आरोपों पर निर्वाचन आयोग की सफाई
निर्वाचन आयोग ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए वोट चोरी के आरोपों को तथ्यहीन बताया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि अब तक किसी भी राजनीतिक दल की ओर से नाम हटाने या जोड़ने के संबंध में कोई औपचारिक आपत्ति या आवेदन नहीं आया है, जबकि मसौदा सूची जारी हुए 11 दिन बीत चुके हैं।
आयोग का क्या कहना है?
आयोग का कहना है कि प्रदर्शन और बयानबाज़ी की बजाय नियमों के तहत प्रक्रिया में भागीदारी ज़्यादा सार्थक होती। आयोग ने यह भी बताया कि उसने एसआईआर के दौरान राजद, कांग्रेस और वाम दलों के प्रतिनिधियों से संवाद किया और हर चरण की जानकारी साझा की। आयोग ने इससे जुड़े दस्तावेज और बैठकों का विवरण भी सार्वजनिक किया है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं की मांग?
विपक्षी दलों की ओर से दायर याचिकाओं में एसआईआर के बाद मतदाता सूची में कथित तौर पर हुए बदलावों की पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि मसौदा सूची से हटाए गए नामों की जानकारी, कारण सहित साझा की जाए, ताकि मतदाताओं को उनके अधिकारों से वंचित न किया जा सके।

