- एसएसपी साहब! कै से मिलेगा इंसाफ? दहेज का मुकदमा कायम कराने के लिए पीड़िता ही काट रही चक्कर
- परिवार परामर्श केंद्रों पर दिन निकलते ही लगने लगता है पीड़ितों का जमावड़ा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: दहेज के खातिर घर से बेघर हुई विवाहित महिलाओं का आखिरकार इंसाफ के लिए ही दर-दर की ठोकरे खाने पड़ रही है। क्योंकि पीड़ित महिलाओं को अपने हक की आवाज उठाने में भी इंसाफ मिलता नहीं दिखाई दे रहा है। क्योंकि महिलाओं को दहेज का मुकदमा कायम कराने के लिए ही चक्कर पर चक्कर काटने पड़ रहे हैं। एसएसपी के समक्ष पीड़ित महिलाएं पेश होती है
तो इन मामलों को परिवार परामर्श के लिए भेज दिया जाता है, लेकिन वहां सिर्फ तारीख पर तारीख के अलावा कुछ नहीं मिलता।जनपद की बात करे तो लगभग एक हजार मामले दहेज से पीड़ित महिलाओं के चल रहे हैं। दिन निकलते ही एसएसपी आफिस पर दहेज के मुकदमे दर्ज कराने के लिए पीड़ित महिलाओं का जमावड़ा लग जाता है। सुबह से इंसाफ के लिए आई महिलाओं को सिर्फ तारीख के अलावा कुछ हासिल नहीं हो रहा है।
- केस-1
मवाना निवासी सबिया को मारपीट कर उसके घर वालों ने बाहर निकाल दिया और दहेज में कार और पांच लाख रुपये की नकदी लाने के लिए कहा। पीड़िता ने ससुराल पक्ष के लोगों के खिलाफ तहरीर दी तो पुलिस ने परामर्श केंद्र के लिए भेज दिया। पीड़िता तीन माह से चक्कर पर चक्कर काटने के लिए मजबूर है।
- केस-2
मोहिउद्दीनपुर निवासी सोनम क ो ससुराल पक्ष के लोगों ने दहेज के लिए मारपीट कर घर से निकाल दिया। पीड़िता ने परतापुर थाने पर तहरीर दी तो उसे परामर्श केंद्र पर भेज दिया। लगभग तीन माह का समय गुजर गया अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। इंसाफ की जगह सिर्फ तारीख पर तारीख मिली।

पीली पर्ची का अस्तित्व धीरे-धीरे हुआ समाप्त
तत्कालीन एसएसपी प्रभाकर चौधरी ने पीली पर्ची का चलन शुरू किया था। एसएसपी द्वारा शुरू की गई इस योजना के तहत फरियादी को इंसाफ मिलता था, लेकिन उनका ट्रांसफर होने के बाद इस पर्ची का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त होता दिखाई दिया है। इस समय पीली पर्ची तो दी जा रही है, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई होती नहीं दिख रही है।
पहले होते थे संबंधित थाना क्षेत्र में मुकदमे दर्ज
दहेज की मांग करते हुए महिला के साथ मारपीट कर ससुराल पक्ष के लोेग घर से बाहर निकाल रहे हैं। पीड़िता जनपद के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष पेश होती थी और तत्काल उसके सम्बंधित थाना क्षेत्र में ही मुकदमे कायम होते थे, लेकिन फिलहाल वह ट्रेंड बदल गया। अब परिवार परामर्श केंद्र के लिए पीड़िता का प्रार्थना पत्र ट्रांसफर कर दिया जाता है। परामर्श केंद्र पर तारीख पर तारीख दे दी जाती है और मुकदमे की संस्तुति भी नहीं होती। जिसके बाद पीड़िता चक्कर काटकर अपने घर पर बैठ जाती है।

