
बहुत इंतजार के बाद और न्यायपालिका के हस्तक्षेप के पश्चात महाराष्ट्र में लोकल बॉडी के चुनाव संपन्न हुए। एक तरफ महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व सफलता हासिल करने वाले एनडीए के लिए यह एक और अवसर था अपनी पैठ जाहिर करने का तो दूसरी तरफ विपक्ष के पास भी यह अवसर था कि वह इसमें सफलता प्राप्त करके विधानसभा चुनावों में भाजपा की सफलता को एक संयोग या हेरफेर वाला प्रबंध साबित कर सके।
परिणाम बतलाते हैं कि विपक्ष इस बार भी पूरी तरह असफल रहा और 29 में से 23 निकायों में भाजपा नीत गठबंधन ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लिया है। कांग्रेस ने किसी तरह अपना आधार बचा लिया और निकायों के मामले में समग्र रूप से भाजपा गठबंधन के बाद वो दूसरे नंबर की पार्टी बनी है। उसे चार निकायों में बहुमत प्राप्त हुआ है। यदि दलों को अलग-अलग करके देखा जाए तो 1425 सीटों के साथ भाजपा पहले नंबर पर, शिंदे वाली शिवसेना 399 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर, कांग्रेस 324 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर, एनसीपी अजीत पवार 167 सीटों के साथ चौथे नंबर पर और ठाकरे वाली शिवसेना 155 सीटों के साथ निराशाजनक रूप से पांचवें स्थान पर रही है। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना 13 और शरद पवार की एनसीपी 36 सीटों के साथ करीब करीब समाप्त प्राय: ही दिखाई दीं। ओवैसी के दल ने भी 125 सीटें प्राप्त करके सबको हतप्रभ कर दिया है।
इन चुनावों में सबकी आंखें मुम्बई महा नगरपालिका चुनावों पर लगी हुई थीं जिसका वार्षिक बजट
भारत के अनेक छोटे राज्यों से भी अधिक होता है। परंपरागत रूप से मुम्बई को शिवसेना का गढ़ माना जाता है और चार दशकों से इस पर ठाकरे परिवार का कब्जा रहा है। बालासाहब के समय शिवसेना निर्विवाद रूप से मुम्बई का किंग मानी जाती थी। राज ठाकरे के अलग होने से इसमें कुछ कमजोरी अवश्य आयी किंतु फिर भी महानगरपालिका में शिवसेना का आधिपत्य बना रहा। ठाणे आदि निकटवर्ती शहरों में भी शिवसेना का प्रभुत्व रहा। जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में एक बड़ा और शक्तिशाली गुट अलग होकर भाजपा के साथ चला गया और कार्यकर्ता विभाजित और भ्रमित हो गए तो शिवसेना का आधार सिकुड़ गया। रही-सही कसर चुनाव आयोग ने शिंदे वाली शिवसेना को असली शिवसेना की मान्यता देकर पूरी कर दी।
उधर भाजपा बड़ी तेजी से मुम्बई में गुजरातियों, मारवाड़ियों के साथ-साथ उत्तर दक्षिण भारतीय प्रवासियों में अपनी पैठ जमाती जा रही थी। शिवसेना अभी भी अपनी मराठी पहचान से बाहर नहीं निकली थी जबकि इस समय तक मुम्बई का कास्मोपोलिटन चरित्र गैर मराठी हो चुका था और मराठी या महाराष्ट्रीयन वहां केवल 35-40 प्रतिशत ही रह गए थे। उस पर नुकसान यह हुआ कि राज ठाकरे को साथ लेने पर वहां का मुस्लिम वोटर नाराज हो गया और कांग्रेस तथा औवेसी की तरफ चला गया। सबसे बड़ी भूल यह की गई कि कांग्रेस से गठबंधन करने की जगह राज ठाकरे की एमएनएस से गठबंधन करके पचास सीटों का नुकसान कर लिया। आंकड़े यह बतलाते हैं कि शिवसेना ठाकरे की पैंसठ और कांग्रेस की चौबीस सीटें यदि गठबंधन होता तो क्रमश: अस्सी और पैंतीस तक पहुंच सकती थीं।
हालांकि अभी भी ठाकरे भाजपा के बाद अपने दल को मुम्बई में दूसरे स्थान पर रखने में सफल हुए हैं। दोनों एनसीपी गुटों का मुम्बई में कोई प्रभाव नहीं दिखाई दिया। भाजपा को भी यहां अपने दम पर बहुमत नहीं मिला है और वह अपना महापौर चुनने के लिए शिवसेना शिंदे पर निर्भर है। मुम्बई में पहली बार औवेसी के दल एआईएमआईएम ने आठ सीटें प्राप्त करके आश्चर्यचकित कर दिया है। ना केवल मुम्बई अपितु पूरे महाराष्ट्र में उसके 125 के लगभग कारपोरेटर विजयी हुए हैं। यह तथ्य बतलाता है कि अब वहां के मुस्लिम धर्मनिरपेक्ष दलों से निराश होते जा रहे हैं।
एक और तथ्य जो इन चुनावों से निकल रहा है वह है गत विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जो संकेत उभरकर आये थे वे इन लोकल चुनावों में अधिक स्पष्ट होकर उभरे हैं। वह संकेत है एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना का निरंतर अच्छा और प्रभावशाली प्रदर्शन। पूरे महाराष्ट्र में उसके चारसौ से अधिक कारपोरेटर चुने गये हैं और मुम्बई में भी ठाकरे बंधुओं की उपस्थिति के बावजूद उसके 29 लोग जीते हैं। यह इस बात का संकेत है कि ओबीसी और मराठा मतदाताओं में यह दल घुस चुका है और तेजी से एनसीपी और शिवसेना उद्धव को अपदस्थ करते जा रहा है। महाराष्ट्र में शरद पवार वाले एनसीपी का पूर्ण पतन इन चुनावों में दिखाई दिया है। लगता है कि शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले अब राजनीति में विपक्ष की राजनीति से उकता गये हैं या रुचि खो चुके हैं। उनके अधिकांश कार्यकर्ता और परंपरागत मतदाता भतीजे अजीत पवार के साथ जा चुके हैं। देर सवेर कोई आश्चर्य कि शरद पवार अपने दल का अजीत पवार के दल में विलय कर दें।

