Saturday, April 11, 2026
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इलेक्ट्रिक वाहनों में बढ़ी दिलचस्पी

  • लोन दे रहा बैंक, लेकिन 40% तक ग्राहक को देना पड़ रहा डाउनपेमेंट, बिक्री में हिस्सेदारी दो प्रतिशत कम
  • इलेक्ट्रिक व्हीकल्स खासतौर पर चार पहिया वाहनों की औसतन कीमत पेट्रोल वाहनों की तुलना में दोगुनी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: इलेक्ट्रिक वाहन वर्तमान समय में काफी डिमांड हैं। लोग अब इलेक्ट्रिक में काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ई-स्कूटर और ई-कार दोनों ते प्रति आकर्षण लोगों में बढ़ रहा है। ई-स्कूटर ई-वाहनों की भारत की सबसे लोकप्रिय पसंद के रूप में उभरे हैं। अब ई-मोटरसाइकिलों की मांग अधिक है। ईंधन की लगातार बढ़ रही कीमतों और बढ़ते प्रदूषण के स्तर ने इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग को बढ़ा दिया है।

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इलेक्ट्रिक स्कूटर सबसे पसंदीदा पर्यावरण के अनुकूल वाहन के रूप में उभर रहे हैं। वहीं, अब दिल्ली एनसीआर की तर्ज पर मेरठ में भी ई-स्कूटर और ई-वाहनों दोनों को लोग खूब पसंद कर रहे हैं, लेकिन इनकी बिक्री में हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है। इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में वृद्धि वैकल्पिक ईंधन वाहनों पर सब्सिडी के माध्यम से प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए स्वच्छ ईंधन को अपनाने की दिशा में सरकार के जोर के अनुरूप है।

पहले आर्थिक सर्वेक्षण में रोडमैप और फिर केंद्रीय बजट में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए एक साथ कई घोषणाएं की गईं। इसके बाद देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग और इनके बढ़ने की चर्चा मुद्दा बन गई। भारत में दो पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री दो गुना से अधिक हुई तो चार पहिया वाहनों की बिक्री तीन गुना बढ़ी। लेकिन देश में बिक्री होने वाले कुल दो पहिया और चार पहिया वाहनों में इनकी हिस्सेदारी महज आधा फीसदी से भी कम है।

नीति आयोग की योजना के मुताबिक देश में 2025 तक 150 सीसी से कम क्षमता वाले सभी दो पहिया वाहन देश में इलेक्ट्रिक बिकेंगे। इसके साथ ही तीन पहिया, बस और कारों की श्रेणी में इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ाना है। लेकिन इलेक्ट्रिक वाहनों की राह में कुछ बाधाएं है। भारत में बैटरी उत्पादन न होना, अच्छी बैटरी का न होना और बुनियादी सहूलियतों के अभाव में यह लोकप्रिय नहीं हो पा रही है।

सोसायटी आॅफ मेन्यूफेक्चरर्स आॅफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (एसएमईवी) के अनुसार देश में वर्तमान में करीब 68 कंपनियां दो पहिया, तीन पहिया और कार निर्माण संबंधी कार्य कर रही हैं। रिसर्च फर्म क्रिसिल के अनुसार बजट में जीएसटी दर घटाने, ब्याज की टैक्स में छूट आदि घोषणाओं से दो पहिया वाहन खरीदने वालों को परंपरागत दो पहिया वाहनों की तुलना में 10 फीसदी तक बचत होगी। वहीं तीन पहिया टैक्सी वालों को पांच फीसदी तक फायदा सामान्य टैक्सियों की तुलना में होगा।

रोडवेज स्थित अरुण हीरो के संचालक ने बताया कि कि बीते 10 साल में देश में करीब चार लाख से अधिक ई-गाड़ी सड़क पर आ चुकी हैं। नीति आयोग द्वारा तय लक्ष्य को अगर पाना है तो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स उद्योग को प्रोत्साहित करना होगा। जैसे जो उद्यमी कंपोनेंट बना रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित करें। 50% लोकल मैन्यूफैक्चरिंग की फेम इंडिया की शर्त के लिए भी कम से कम 1 साल का वक्त मिलना चाहिए। बैंक से लोन सरलता से मिले।

अभी वाहनों में लैड आधारित बैटरी ही लग रही हैं क्योंकि इसकी कीमत कम है। लीथियम बैटरी भी महंगी हैं। वहीं, इस संबंध में बिजनेश हेड, हीरो मोटर्स पंकज कुमार का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की चुनौती के संबंध में दो पहिया इलेक्ट्रिक व्हीकल शोरूम अरुण हीरो के बिजनेस डेवलपमेंट पंकज ने कहा कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को फाइनेंस नहीं हो रहा है। बैंकों के द्वारा, फेम-टू में सब्सिडी न मिलने के कारण गाड़ियां महंगी हो रही है।

जो चुनिंदा बैंक लोन दे भी रहे हैं तो वहां 40 फीसदी तक डाउनपेमेंट ग्राहक को देना पड़ रहा है। ऐसे में ग्राहक को 25 से 28 हजार रुपए तक डाउन पेमेंट करना पड़ता है जबकि दो पहिया खरीदने वाला आठ से 10 हजार रुपए तक ही भार वहन कर सकता है। ऐसे में हमें मुश्किल हो रही है।

दो पहिया वाहनों को मुश्किल से मिल रहा लोन

इलेक्ट्रिक वाहनों की चुनौती के संबंध में दो पहिया इलेक्ट्रिक व्हीकल शोरूम अरुण हीरो के बिजनेस डेवलपमेंट पंकज ने कहा कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को फाइनेंस नहीं हो रहा है। बैंकों के द्वारा, फेम-टू में सब्सिडी न मिलने के कारण गाड़ियां महंगी हो रही है। जो चुनिंदा बैंक लोन दे भी रहे हैं तो वहां 40 फीसदी तक डाउनपेमेंट ग्राहक को देना पड़ रहा है। ऐसे में ग्राहक को 25 से 28 हजार रुपए तक डाउन पेमेंट करना पड़ता है जबकि दो पहिया खरीदने वाला आठ से 10 हजार रुपए तक ही भार वहन कर सकता है। ऐसे में हमें मुश्किल हो रही है।

इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के बाजार में चुनौतियां

देश में बैटरी का न बनना: सबसे बड़ी समस्या देश में बैटरी न बनने की है। अभी भारत में वाहनों के लिए बैटरियां आयात की जाती हैं। साथ ही लैड आधारित बैटरी मिलती हैं जो वजन में भारी हैं और दो-तीन वर्ष तक ही चल पाती हैं। वाहनों की कुल लागत में बैटरी की कीमत 40-50% तक होती है। लिथियम आयन वाली बैटरी सर्वाधिक चीन में बन रही हैं।

चार्जिंग नेटवर्क का न होना: इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के लिए अभी देश में चार्जिंग नेटवर्क न के बराबर है। घर से वाहन चार्ज करने पर समय अधिक लगता है। बेंगलुरू-दिल्ली जैसे शहरों में कुछ ही चार्जिंग स्टेशन हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह देश में पेट्रोल पंप हैं उसी प्रकार से चार्जिंग स्टेशन होने चाहिए जिससे इन वाहनों की लोकप्रियता बढ़ पाएगी।

दो पहिया वाहन सब्सिडी की नई शर्तें: दो पहिया वाहनों को लेड एसिड बैटरी से बाहर रखा गया है। साथ ही दो शर्त भी लगाई हैं कि एक बार चार्ज होने के बाद वाहन 80 किलोमीटर चले और कम से कम स्पीड 40 किलोमीटर प्रति घंटा की हो। अगर मौजूदा ट्रेंड देखें तो देश में अभी बन रहे 90% से अधिक वाहन सब्सिडी लेने से वंचित हो जाएंगे।

50% लोकल मेन्यूफेक्चरिंग का नियम: फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्यूफैक्चरिंग आॅफ (हाइब्रिड एंड) इलेक्ट्रिक व्हीकल्स- फेम इंडिया-2 स्कीम में सब्सिडी के लिए वाहन निर्माता कंपनियों के लिए 50 फीसदी मैन्यूफैक्चरिंग स्थानीय स्तर पर करनी होगी, लेकिन अभी स्थिति यह है कि बैटरी और ज्यादातर उपकरण विदेश से आते हैं, जिसके कारण पूर्व में मिल रही वाहन खरीद पर सब्सिडी नहीं मिल पाती।

महंगी कीमत: अभी देश में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स खासतौर पर चार पहिया वाहनों की औसतन कीमत डीजल या पेट्रोल वाहनों की तुलना में दो गुनी है। कीमत तर्क संगत होगी तो आम ग्राहक इसके प्रति आकर्षित होंगे।

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