
अमेरिका की वित्तीय शोध संस्था हिंडनबर्ग ने भारतीय कॉरपोरेट घराने के सबसे बड़े समूह यानी गौतम अडाणी पर सीधे निशाना साधा है। दुनिया में कभी तीसरे पायदान पर सबसे अमीर बिजनेसमैन की हैसियत रखने वाले गौतम अडाणी (14 फरवरी, मंगलवार तक) अब 20 अमीर लोगों की सूची से बाहर चुके है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडाणी समूह की कंपनियों में एक के बाद एक भारी गिरावट देखने को मिल रही हैं। रिपोर्ट आने से पहले गौतम अडाणी की संपत्ति 120 अरब डॉलर थी। ‘फोर्ब्स रियल टाइम बिलनियर्स’ के अनुसार, अडाणी की कुल संपत्ति अब 52.2 अरब डॉलर तक जा पहुंची है। दिसंबर, 2022 में अडाणी ग्रुप की कुल संपत्ति 155.7 अरब डॉलर तक आंकी गई थी। 24 जनवरी 2023 को आई हिंडनबर्ग रिपोर्ट के कारण अडाणी समूह की एक दिन में तुरंत 7 अरब डॉलर से ज्यादा तक की गिरावट देखी गई थी। जिस वजह से उनकी संपत्ति को अब तक 60 से 65 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। इस रिपोर्ट में अडाणी के कर्ज पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं, जिस कारण अडाणी समूह पर एकाउंटिंग फ्रॉड और स्टॉक मैनिपुलेशन के साथ-साथ ही उन पर भारत से सबसे ज्यादा कर्ज लेने का भी आरोप है।
हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद मुख्यधारा मीडिया घरानों ने चुप्पी साधकर न केवल तमाशा देखा बल्कि इस रिपोर्ट में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। साथ ही सेबी जैसी संस्था का मौन होना भी कई तरह के सवाल खड़े करने वाला रहा। इस संस्था ने अडाणी समूह को जिन 88 सवालों को भेजा है, उसका जवाब देने के बजाय अडाणी भारतीय मीडिया में अपना झूठ को छिपाने के लिए देश के बड़े प्रिंट मीडिया घरानों को विज्ञापन देकर उनका मुंह बंद करा दिया।
जिसके बाद से कई समाचार पत्रों में फुल पेज के विज्ञापन के चलते हिंडनबर्ग रिपोर्ट का कहीं कोई जिक्र तक नही हुआ। यानी इतनी बड़ी रिपोर्ट का आना और उस पर मीडिया की डलता पर्दा सीधे तौर पर भारतीय मीडिया की बेशर्मी को दिखाता है। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने हिंडनबर्ग रिसर्च पर सही से विश्लेषण करना उचित नहीं समझा।
देश के प्रतिष्ठित अखबारों में एक-एक कॉलम में लिखी गई खबरें साफ तौर पर दिखाती है कि मीडिया में नेगेटिव न्यूज के लिए कोई स्थान नहीं है जोकि बहुत गलत है। यानी अब समझ में आ रहा है कि अडाणी को एनडीटीवी क्यों चाहिए था? अपने झूठ-फरेब को छुपाने के लिए एनडीटीवी को खरीदने का कारण कहीं यही भर तो नहीं था, ताकि मीडिया मैं जब उसकी पोल खुले तो उसके सारे काले कारनामों को दबाया जा सके।
अंबानी समूह नेटवर्क18 के अलावा सारे बड़े मीडिया घराने ने हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट को दबा डाला, जिसकी खुले तौर पर कहीं कोई चर्चा नही हुई। हिंडनबर्ग रिपोर्ट की आलोचना करने में मुख्यधारा मीडिया ने अडाणी को बचाने के लिए सारे पैंतरों का इस्तेमाल किया। अब तो ऐसा लगता है कि मुख्यधारा मीडिया ने अडाणी को लेकर कसम खाई हुई है कि जब तक हम हैं आपको कुछ नहीं होने देंगे, तो ऐसे में समझ जाना चाहिए कि जब एंकर पत्रकारिता करना छोड़ दे, तो देश का कॉरपोरेट घराना और राजनेता ऐसे ही देश में लूट मचाते रहेंगे।
लेकिन ऐसे में वैकल्पिक मीडिया ने अपना काम भली भांति निभाया, जिसके चलते देश के सामने अडाणी के सारे काले कारनामों का सच उजागर हो सका। भारतीय मीडिया की कवरेज को अगर छोड़ दें तो अरब और पश्चिमी देशों की मीडिया में हिंडनबर्ग रिसर्च की चर्चा जोरो शोरों से है। अब नौबत यहां तक आने लगी है कि विदेशी बैंकों द्वारा अडाणी को फंड न देने के लिए खिलाफ लोग धरने पर बैठने लगे हैं। लेकिन भारत में यह स्थिति एकदम उलट है।
हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने अडाणी समूह पर जिस तरीके का शिकंजा कसा, उससे पूरे कॉरपोरेट जगत में खलबली मची और अडाणी समूह के सारे काले कारनामें एक-एक करके उजागर होने लगे। इसलिए अडाणी ने मीडिया के उन घरानों पर सबसे पहले फंदा फेंका जहां उसको सबसे ज्यादा डर था कि अगर देश के इन टॉप मीडिया घरानों में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट छप जाती है तो अडाणी समूह का दिवालियापन हो सकता है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने से निवेशकों और कारोबारियों में एक डर का माहौल है।
अब ऐसे में सवाल अडाणी ग्रुप का नहीं है, बल्कि सवाल उन लाखों-करोड़ों उपभोक्ताओं का है, जिनका बैंकिंग और इंश्योरेंस सेक्टर में अपना पैसा लगा है। लेकिन इन्हीं सवालों से बचने के लिए अडाणी इन मीडिया घरानों पर अपना शिकंजा कसना चाहता है। अडाणी कॉरपोरेट का अब एक चमकता हुआ सितारा नहीं, बल्कि निवेशकों के लिए एक भय का पर्याय बन चुका है।
अडाणी ने अखबारों में दिए विज्ञापन के जरिए यह बताने की कोशिश की कि आपको डरने की जरूरत नहीं है। हम राष्ट्र निर्माण में एक अग्रणी भूमिका निभाने जा रहे हैं। अडाणी का कब्जा जमीन से लेकर आसमान तक, पानी से लेकर सड़कों तक तेल से लेकर ग्रीन एनर्जी तक यानी सब जगह अडाणी समूह छाया है। अखबारों को दिए गए विज्ञापन में अडाणी ने यह झलक दिखा दी कि कैसे अडाणी समूह का कारोबार देश के टॉप बिजनेस हाउस में शामिल है।
यानी इस विज्ञापन में ठीक वैसे ही भाषा का इस्तेमाल हुआ जैसी भाषा अमूमन बीजेपी के विज्ञापनों में देखने को मिलती है। जो यह दिखाना चाहते हैं कि यह सरकार सारा कारोबार किसी मुनाफे के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र सेवा के लिए कर रही है। अब इसे झूठ का फालूदा कहे या फिर भ्रष्टाचार में लिप्त कारोबार की गाथा। इसलिए ऐसे में सोचना आपको और हमको है कि देश की सार्वजानिक संपत्ति पर अधिकार वास्तव में किसका है?


