Tuesday, January 25, 2022
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जब विकास के मॉडल से समाज गायब हो जाए!

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सुधांशु गुप्त
     सुनील चतुर्वेदी उन रचनाकारों में हैं, जो बिना किसी शोर-शराबे के अपना काम करते रहते हैं। वह ‘महामाया’ और ‘कालीचाट’ जैसे उपन्यास लिख चुके हैं। ‘कालीचाट’ पर इसी नाम से फीचर फिल्म का निर्माण भी हुआ है। यह भी दिलचस्प बात है कि वह भू गर्भ शास्त्री के रूप में एक सामाजिक संस्था से जुड़े हैं। जल संवर्द्धन एवं जल सरंक्षण पर भी उनका काम महत्वपूर्ण हैं। संभवत: यही वजह है कि ऐसा व्यक्ति जब लेखन में इन मुद्दों पर कलम चलाता है, तो घटनाएं और चीजें ज्यादा यथार्थपरक रूप में सामने आती हैं। पिछले साल ही प्रकाशित हुआ उनका उपन्यास ‘गफिल’ (अंतिका प्रकाशन) विकास के उसी मॉड्ल की पोल खोलता है, जिसके अनुसार समाज में स्मार्ट सिटी बनाने की बात तो होती है, लेकिन समाज के विकास की कोई अवधारणा किसी के पास नहीं होती। यह उपन्यास सिर्फ फाइनेंशियल ग्रोथ को ही विकास का पैमाना मान लिए जाने से पैदा हुई विसंगतियों पर चोट करता है। साथ ही यह उपन्यास कई अर्थों में सुख की भी तलाश करता जान पड़ता है।
उपन्यास की शुरूआत होती है एक पांच सितारा अस्पताल-नोबेल- में 64वर्षीय रघुनंदन के दाखिल होने से। रघुनंदन कोमा में हैं। रघुनंदन अनेक कंपनियों के एमडी हैं। समाज में वह धनी व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं और उनकी खूब प्रतिष्ठा है। यहां अस्पताल को सुनील चतुर्वेदी ने एक प्रतीक के रूप में लिया है, क्योंकि अस्पतालों को मानवीयता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता है। उनके आते ही अस्पताल में हड़कंप मच जाता है। वीवीआईपी पेशेंट होने के कारण सब उनकी तीमारदारी में लग जाते हैं। इस तीमारदारी में पाखंड ज्यादा दिखाई पड़ता है। लेकिन जैसा कि पांच सितारा अस्पतालों में होता है, उन्हें बचाए जाने से ज्यादा उन्हें लूटने के तरीके खोजे जाते हैं। लेकिन एक न्यूरो सर्जन डॉक्टर तापड़िया पेशेंट के रिवाइवल को लेकर आशान्वित हैं। अस्पताल में नर्सें हैं, इन्टर्न डॉक्टर हैं। इन्टर्न शुभम और स्वीटी के बीच आधुनिक समय के ‘प्रेम’ की झलकियां भी साथ-साथ चलती हैं। लेखक ने अतीत और वर्तमान के बीच उपन्यास को किसी फिल्म की तरह चलाया है। एक तरफ मौजूदा समय और समाज उपन्यास में दिखाई पड़ता है, रघुनंदन का पुत्र आकाश, उसकी पत्नी-सुरभि का रघुनंदन के प्रति व्यवहार, जो कहीं न कहीं धनी होने से ही संचालित होता है, अस्पतालों में होने वाली बेइमानियां और अनैतिकताएं हैं तो दूसरी तरफ रघुनंदन के धनी और ‘बड़ा आदमी’ बनने की कहानी समानांतर चलती है। रघु का बचपन, उसकी किशोरावस्था, बहन के प्रति उसका व्यवहार, दादी के प्रति उसका स्नेह बहुत व्यवस्थित तरीके से उपन्यास में चित्रित हुआ है। रघु पढ़ाई में होशियार है। वह इंजीनियरिंग के तीसरे साल में पहुंच जाता है। पड़ोस में रहने वाली गायत्री रघु के प्रति आकर्षित हो जाती है। गायत्री बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही है। रघु भी उसके प्रति प्रेम भाव रखता है। इस प्रेम का पटाक्षेप त्रिवेणी घाट पर तब हो जाता है, जब वह गायत्री से कहता है कि वह ‘अनकल्चर्ड’ लोगों के बीच नहीं रह सकता। इन ‘अनकल्चर्ड’ लोगों में वह अपने अड़ोस-पड़ोस और अपने मां-बाप को भी शामिल करता है। गायत्री को झटका लगता है, वह उठकर चली जाती है और दोबारा रघु से कभी मुलाकात नहीं करती। रघु को कभी यह समझ नहीं आता कि आखिर गायत्री उससे क्यों नाराज हुई। वह अपने दोस्त राजा से भी इस प्रेम प्रसंग का जिक्र करता है। राजा भी उससे यह कहता है कि वह दरअसल किसी से प्रेम नहीं करता। यहां भी रघुनंदन राजा को ही गलत मानने लगता है। लेखक सुनील चतुर्वेदी की बदलती प्राथमिकताओं को लगातार दिखाते हैं। एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी की मालकिन इंद्रा से उसका विवाह हो जाता है। वह ‘विकास’ के रास्ते पर सरपट दौड़ने लगता है। गायत्री की यादें भी इसके जेहन से मिटने लगती हैं। उपन्यास में जगह-जगह सुनील चतुर्वेदी ने यह दिखाया है कि किस तरह रघुनंदन के लिए पैसा और करियर ही महत्व रखने लगा है। वह अपने पिता और मां की मृत्यु को भी गंभीरता से नहीं लेता। वह यह भी नहीं चाहता कि उसकी पत्नी बेटे के स्वयं देखभाल करे। पैसा और प्रतिष्ठा उसके भीतर भावनाओं के स्रोत को पूरी तरह सुखा देते हैं।
इधर अस्पताल में रघुनंदन को गंभीरता से बचाने का प्रयास केवल डॉक्टर तापड़िया कर रहे हैं। वह रघुनंदन के कानों में लगातार कहते हैं कि क्या आप मुझे सुन रहे हैं, आप कैसे हैं। वह रघुनंदन से ऐसे बात करते हैं, जैसे वह पूरी तरह ठीक हों। अस्पताल का स्टाफ उन्हें पागल समझने लगता है। अस्पताल में सभी डॉक्टर तापड़िया से चिढ़ने लगते हैं। सभी डॉक्टरों का एक ही मकसद है कि पेशेंट से मोटी रकम वसूल की जाए। डॉक्टर तापड़िया को एक दिन लगता है कि रघुनंदन इंप्रूव कर रहे हैं।
एक दिन डॉक्टर तापड़िया रघुनंदन का हाथ पकड़कर कहते हैं, एकोर्डिंग टू मेडिकल साइंस यू फिट। रघुनंदन कहते हैं, थैंक्स डॉक्टर…बट मैं चाहता हूं कि आप थोड़ा समय और दें मुझे, मैं अभी अपनी उस दुनिया में लौटना नहीं चाहता। मुझे सोचकर ही घबराहट होती है। रघुनंदन यह भी कहते हैं, डॉक्टर मैं दुनिया की नजर में एक मिलेनियर और एक सक्सेफुल बिजनेसमेन हूं, लेकिन आज मैं सोचता हूं कि जिÞंदगी का हासिल क्या है? अंत में रघुनंदन अपने कमरे से गायब पाए जाते हैं। पूरा अस्पताल चिंतित हो उठता है। उनकी चिंता रघुनंदन को लेकर नहीं है बल्कि इस बात को लेकर है कि इससे अस्पताल की कितनी  बदनामी होगी। रघुनंदन की खोज होती है। डॉक्टर तापड़िया को फोन किया जाता है, लेकिन उनका फोन आॅफ आता है। उनके घर भी जाकर भी उनकी तलाश की जाती है लेकिन उनके घर का ताला लगा मिलता है।
उपन्यास के अंतिम दृश्य में डॉक्टर तापड़िया मुंबई एयरपोर्ट पर बोस्टन जाने वाली फ्लाइट का इंतजार कर रहे हैं। छोटा सा यह उपन्यास जीवन के मूल प्रश्नों को सहजता से उठाता है। नितांत पठनीय यह उपन्यास कहता है कि आप समाज के प्रति गाफिल (बेसुध) नहीं रह सकते और गाफिल रहने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं।
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