
उन दिनों सिकंदर भारत में था। अपने गुरु के कहने पर वह यहां के साधु-संतों के जीवन का अध्ययन कर रहा था। एक बार जाड़े के दिनों में सिकंदर ने देखा कि अधिकांश साधु नाममात्र के वस्त्र पहने हुए हैं। सिकंदर ने सोचा कि शायद इनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं, इसलिए वे पूरे कपड़े नहीं पहने हुए हैं। सिकंदर ने उनमें से कुछ को कपड़े देने का निश्चय किया। एक दिन उसने नौकरों के सिर पर कपड़ों की गठरी लदवाई और साधुओं के आश्रमों की ओर चल पड़ा। वहां पहुंचने पर एक वृद्व महात्मा ने उससे प्रश्न किया, तुम कौन हो? सिकंदर ने परिचय दिया, मैं विश्व विजेता सिकंदर हूं। महात्मा ने पूछा, क्यों आए हो यहां? सिकंदर बोला, आप लोगों को कुछ गरम कपड़े देना चाहता हूं। महात्मा ने कटाक्ष करते हुए कहा, उससे क्या लें, जिसके पास कुछ भी नहीं है। सिकंदर ने महात्मा का यह अटपटा कथन सुना, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने प्रश्न किया, मैं आपका मतलब नहीं समझा। महात्मा ने उसे समझाते हुए सरलतापूर्वक कहा, अरे नादान, क्या तू नहीं जानता कि लूटमार कौन करता है? इतनी सी बात क्या तुझे नहीं मालूम कि लूट-खसोट वही करता है, जिसके पास कुछ नहीं होता? तू तो लुटेरा है, लुटेरा, जो दूसरों को लूटता फिर रहा है। जा, तेरे वस्त्र लेकर हम क्या करेंगे? तू अपनी कमाई का नहीं, बल्कि लूट का माल हमें देने आया है। यह लूट का सामान हमारे किस काम का? तू कहता तो अपने को विश्व-विजेता है, लेकिन तू ही सोच कि असल में तू राजा है या रंक? महात्मा की भेद भरी बातें सुनकर सिकंदर को बड़ी ग्लानि हुई। वह उदास होकर वहां से सारा सामान साधुओं को बांटे बिना वापस लौट गया।


