
नई पीढ़ी के अधिकतर नेता और अधिकारी अब मर्यादाओं और संस्कारों को बोझ समझने लगे हैं। ऐसे लोगों की वजह से अब मर्यादाएं खत्म सी होने लगी हैं। अगर हम यह कहें कि यह दौर मर्यादाओं की खुदकुशी का है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मर्यादाओं को धनलोलुपता ने आत्महत्या के लिए विवश किया है या फिर न्यायिक और प्रशासनिक तंत्र में काम करते-करते ‘चाटी’ गई ‘चापलूसी’ की ‘चाट’ से बलवती हुई ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ ने मर्यादाओं के गले फंदा डाला है? यह फंदा नए और भटके हुए युवाओं के हाथों से, स्तरहीन नेताओं के हाथों से कई तरीकों से डाला जा रहा है। सवाल यह है कि क्यों आज मर्यादाओं के साथ-साथ देश और देश के आम आदमी की गरिमा तार-तार करने पर वो चंद लोग तुले हुए हैं, जो न सिर्फ लालची हैं, बल्कि गलत भी हैं?