Thursday, October 21, 2021
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Homeसंवादनजरिया: लॉकडाउन में कितनी साफ हुई गंगा ?

नजरिया: लॉकडाउन में कितनी साफ हुई गंगा ?

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सुरेश भाई

मोक्षदायिनी गंगा गौमुख से चलकर 2550 किलोमीटर दूर गंगासागर में समुद्र (बंगाल की खाडी) से मिल जाती हैं। वहां गंगा का ऐसा अनुपम दृश्य है कि समुद्र के बीच लगभग 500 मीटर दूर तक गंगा की लहरें देखने को मिलती हैं। पुराणों में गंगा के धरती पर पहुंचने की कहानी बहुत ही दिलचस्प है, लेकिन आज के समय में मान सकते हैं कि उस समय धरती-पुत्रों के रूप में जन्मे मानवों ने कुछ ऐसा किया होगा कि उनकी आत्मा को स्वर्ग में स्थापित करने के लिये भगीरथ प्रयास से ही मोक्ष मिले। कालान्तर में यह आस्था बन गयी, जिसमें दुनियाभर के लोग गंगाजल को माथे पर रखकर पूजा करते हैं।

अब जिस तरह से मनुष्य अपनी भोगवादी जीवनशैली को जल, जंगल, जमीन की कीमत पर खड़ा कर रहा है और बेपरवाह होकर इसके शोषण पर ही अपने को संपन्ने समझने लगा है, उससे बहुत कम समय में गंगा और अन्य नदियां अपना पवित्र जल तक देने से इंकार करने वाली हैं।

वैसे गंगा का स्रोत हिमालय में है, जहां से गंगा विशुद्ध रूप में केवल आंखों से देखी जा सकती हैं, लेकिन आधुनिक विकास के नाम पर हो रहे भारी निर्माण कार्य से उद्गम की जैव-विविधता खतरे में पड़ गई है। इसके दुष्परिणामों को जानते हुए भी कुछ समय की सुख-सुविधाओं की खातिर गंगा की छाती पर सुरंग-बांध, सड़कों का मलवा, पेड़ों का कटान, दुर्लभ वन्य-प्रजातियो का शिकार, क्षमता से अधिक मनुष्यों की आवाजाही और इस नाम पर बन रहे कूड़े के ढेर बेहिचक नदियों में डाले जाते हैं। फिर कोई आकर सांकेतिक रूप में इसकी सफाई करके अपनी फोटो फेसबुक, वाटसऐप आदि में डाल देते हैं। दूसरे दिन पता चलता है कि जो कूडेÞ का ढेर और निर्माण का मलवा एक किनारे पर एकत्रित हुआ था वह थोड़ी दूर, आगे ले जाकर गंगा में ही विसर्जित कर दिया गया है। इसके बाद यहां जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बैठक हुई जिसमें आदेश दिया गया कि भागीरथी में गिर रहे गंदे नाले व सीवर की निकासी रोकी जाए। वर्तमान में दुनियां में आयी महामारियों की तरह कोविड-19 ने भारत में अपने पैर पसार दिए हैं। मरीजों की संख्या लाखों में हो रही है और लोग 24 मार्च से अब तक कई लॉकडाउन पूरे कर चुके है। इसके बाद, जून से अनलॉक भी प्रारम्भ हो गया है। कई लोगों ने बयान दिया है कि लॉकडाउन चलता रहे, तो गंगा साफ हो जाएगी। लेकिन इस दौरान गंगा कितनी साफ हुई, यह जानना जरूरी है।

उत्तराखंड की बात कहूं तो गंगा और इसकी सहायक नदियों के किनारे भारी निर्माण कार्यों से निकला लाखों टन मलवा गंगा में बेहिचक डाला गया है। निर्माण मजदूरों के लिए शौचालय कहीं दिखाई नहीं देते। उत्तरकाशी शहर में लॉकडाउन के दौरान शौचालय के गड्ढों में जमा भारी मलमूत्र को गंगा में उडेला गया था। इसकी फोटो और वीडियो ‘गंगा विचार मंच’ से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता लोकंद्र बिष्टस ने सोशल मीडिया पर डाली है। इसमें देखा गया है कि भागीरथी का रंग घंटों तक मलमूत्र जैसा दिखाई दिया है, जो आगे मनेरी भाली के बैराज में एकत्रित हुआ। बाद में इसको साफ करने के लिये बांध का गेट खोलकर आगे बहाया गया। अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी घनी जैव-विविधता के लिये मशहूर है। यहां पर भी जल-विद्युत परियोजनाओं के लिए पौने तीन लाख से अधिक हरे पेड़ों को काटने की स्वीकृति दी जा रही है। इस घाटी में लगभग 1150 हेक्टेयर वनभूमि खत्म हो जाएगी, जिसमें रहने वाले जीव-जंतु, पेड़-पौधे, तितलियां, स्पॉइडर, सांप, स्तनधारी आदि की सैकड़ों प्रजातियां अपना अस्तित्व खो देंगी। यहां आसपास के दो दर्जन गांव में रहने वाले लगभग 14 हजार आदिवासी बेजमीन हो जाएंगे। यह क्षेत्र भूकंप और बाढ़ के लिए संवेदनशील है।

लॉकडाउन के समय लोगों ने जो भी कचरा बनाया है वह जैसा-का-तैसा गंगा में विसर्जित हुआ है। इस दौरान सफाई कर्मियों को संक्रमण से बचाना था, इसलिए जगह-जगह गंदगी के ढेरों को गंगा में ही डाला गया। यह इसलिए भी हुआ कि गंगा के किनारे बसे शहरों व गांवों के पास अपना कूड़ा फेंकने की कोई जगह ही नहीं थी। इसलिए सार्वजनिक स्थान, जो बैठकों और रामलीला के उपयोग में आते हैं, में लंबे समय तक कूडेÞ को जमा किया जाता रहा है। यह स्थिति अभी कई स्थानों पर बरकरार है। लॉकडाउन के दौरान पहाड़ों में बारिश बहुत हुई है। इसलिए इस समय जंगल आग से बच गए हैं, लेकिन प्रथम लॉकडाउन तक गंगा के किनारे वनों का कटान और खनन बहुत तेजी से चल रहा था।

इस भुलावे में रहकर कि महामारी के चलते गंगा साफ हो जाएगी, यह सवाल नागरिकों के जिंदा रहने व न रहने पर भी खड़ा है। मनुष्य और जीवधारियों की मौजूदगी को ही पर्यावरण का सुखद अहसास होता है। लॉकडाउन का सबक यह है कि घरों में मानवबंदी के कारण शहरों में कचरा पैदा करने वाले कारखाने भी बंद रहे हैं। अब इससे सबक लिया जाना चाहिए कि गंगा की सफाई के लिए बजट आवंटन करने की बजाए प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर नियंत्रण करना होगा, मलमूत्र और जैविक कचरा जल संरचनाओं में डालने से रोकना होगा।

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