- कुपोषण को मिटाने में जी-जान से जुटी रहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ममतेश
- केंद्र को मिला ए ग्रेड, आदर्श है ममतेश की पोषण वाटिका
जनवाणी संवाददाता |
सहारनपुर: कहते हैं कि स्त्री एक ऐसी गुरु होती है जो शर्ट के टूटे बटन से लेकर किसी व्यक्ति अथवा समूह के टूटे आत्मविश्वास तक को जोड़ने की कला जानती है। इस कला में माहिर हैं साढ़ौली कदीम विकास खंड के हरिपुर कलां आंगनबाड़ी केंद्र की कार्यकर्ता ममतेश। ममतेश ने करीब एक दर्जन ऐसे माता-पिता के होठों पर मुस्कान बिखेर दी, जिनके लख्त-ए-जिगर कुपोषण की मार से कराहते हुए जिंदगी की के लिएजंग लड़ रहे थे। ममतेश ने ऐसी कई गर्भवती महिलाओं को गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाया, जिनका अपनी सेहत को लेकर आत्मविश्वास डगमगा गया था।
हरिपुर कलां के आंगनबाड़ी केंद्र को अगर ग्रेड-1 मिला तो ममतेश की बदौलत। बकौल, ममतेश-यही उनकी सबसे बड़ी दौलत है। कोरोना काल में इस आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने जान जोखिम में डालकर जनता-जनार्दन को जागरूक किया। वैक्सीनेशन भी कराया तो शत-प्रतिशत। वह नित्य और निरंतर अपने दायित्वों का निर्वाह करती हुई घर-गृहस्थी की गाड़ी भी खींच रही हैं। ममतेश के केंद्र की पोषण वाटिका फल-फूलों से लदी है। साग-सब्जियों से हरी-भरी है। हरिपुर कलां आदर्श आंगनबाड़ी केंद्र शायद इसीलिए बन सका है।
ममतेश ने हरिपुर कलां गांव के आंगनबाड़ी केंद्र का दायित्व सन 2007 में ही संभल लिया था। समाज शास्त्र में परास्नातक की शिक्षा लेने वाली ममतेश बनना तो चाहती थीं शिक्षिका। लेकिन, बन गईं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता। लगन ऐसी कि उन्होंने इसी को अपना सब कुछ मान लिया। बचपन से ही सेवा भाव से लवरेज ममतेश को आंगनबाड़ी केंद्र के बच्चों की परवरिश की फिक्र रहने लगी। उनकीके शिक्षा-दीक्षा की और उनकीके सेहत को लेकर ममतेश शुरू से ही संजीदा रहीं। इनके केंद्र से जुड़े गांव के दर्जनों बच्चे कुपोषण के शिकार थे,। इसलिए क्योंकि उनके माता-पिता पोषण के प्रति जागरूक नहीं थे। सरकार की योजनाओं से मिलने वाले लाभ से भी अनभिज्ञे थे।
ममतेश ने इनके उनके घर जाकर संपर्क साधा। पिछले तीन सालों में जी-जान से जुटी ममतेश ने अब हरिपुर कलां को कुपोषण से पूरी तरह मुक्त करा दिया है। यह सब उनकी मेहनत और निष्ठा का परिणाम था। है। अब हरिपुर में कोई भी बच्चा कुपोषित नहीं है। पोषण स्तर को सुधारने में उन्हें मानो महारत हासिल है। जिला कार्यक्रम अधिकारी आशा त्रिपाठी कहती हैं कि ममतेश ने हरिपुर कलां की गर्भवती महिलाओं को पोषण के प्रति जागरूक कियाकरती हैं। उन्हें पोषण आहार समय से उपलब्ध कराती हैंराए। उनका टीकाकरण कराती हैंया। एनीमिक महिलाओं को पोषण के गुर बताए। बताती हैं। खान-पान पर जोर दिया। इसी का नतीजा रहा हैकि यहां सभी गर्भवती महिलाओं का पोषण स्तर दुरुस्त पाया गया है। अब एक भी गर्भवती महिला यहां कुपोषित नहीं है। अब अगर बात करें आंगनबाÞड़ी केंद्र की पोषण वाटिका की बात करें तो वह अपने आप में उल्लेखनीय है। ममतेश ने बताया और दिखाया कि किस तरह उनकी पोषण वाटिका हरी-भरी है। इस पोषण वाटिका में लौकी, पपीता, सहजन, आंवला, अमरूद, चना, मेथी, मिर्च, धनिया की उपजाया गया है।
पोषण वाटिका के फल-फूल केंद्र में आने वाले बच्चों के काम आते हैं। यही नहीं, अन्नप्राशन से लेकर गोधभराई तक में उनका केंद्र उल्लेखनीय रहा है। गर्भवती महिलाओं को समूह में पोषण के प्रति आगाह करना हो तो ममतेश कोई कोताही नहीं करतीं। टीकाकरण में भी वह काफी संजीदा रही हैं। डीपीओ के स्तर से उन्हें कई बार सम्मानित भी किया गया है। ममतेश कहती हैं कि बच्चों को कुपोषण की काली छाया से मुक्ति दिलाने, गर्भवती महिलाओं को सेहतमंद कराने में उन्हें अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। यही नहीं, दायित्वों को ईमानदारी से निर्वहन करने से भी उन्हें बहुत सुखद अनुभूति मिलती है। ममतेश सामाजिक कार्यों में भी हिस्सा लेती हैं। अपने गांव की दो बच्चियों प्रियांशी व दीपांशी की शिक्षा के लिए उन्होंने लोगों से सहयोग लेकर मदद की। चूंकि इन दोनों बच्चियों के माता-पिता नहीं हैं। ऐसे में कन्या सुमंगला योजना का लाभ दिलाने का भी उन्होंने उपक्रम किया है। कुल मिलाकर ममतेश के लिए एक शेर काफी मौजूं लगता है कि-तुम्हारे आगे मिसालों की आबरू क्या है।

