- दिन ढलते लगता है डर, चीखों का होता अहसास
- सभी की जुबां पर एक ही सवाल आखिर ऐसी भी क्या जल्दी थी अफसरों को
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: दोपहर के करीब एक बजे का वक्त। कुछ देर पहले ही मेरठ के लोहियानगर के एम ब्लॉक में स्थित सत्यकाम स्कूल की छुट्टी हुई है। स्कूल के गेट से छोटे बच्चे एक दूसरे से हंसी ठिठोली करते हुए निकल रहे हैं। ज्यादातर बच्चे कंधे पर बस्ता लादे स्कूल के दोनों ओर जा रहे रास्ते से होकर घर की ओर निकल रहे हैं। कुछ बच्चे गोल चक्कर की ओर जाने वाले रास्ते से होकर जा रहे हैं।

इनमें से दो बच्चे उबड़-खाबड़ सुनसान प्लाट के सामने रुकते हैं। तभी उन पीछे से तेजी से चलती हुई उनकी बहन आती है और दोनों को खींचती हुई आगे की ओर धकेलते हुए लेकर जाती है। वो डांट लगाती है तेरा दिमाग खराब हो गया है जो यहां रुका। भूल गया मम्मी ने क्या कहा था? चल आज तेरी शिकायत करती हूं।
संवाददाता तेजी से इन बच्चों की ओर लपका, उनसे बात करनी चाही, लेकिन बच्चे नहीं रुके। चंद कदम दूरी पर सामने ही होम्योपेथी एक डाक्टर का क्लीनिक हैं। इनका नाम डा. शमशाद है। उन्होंने इशारे से अपने क्लीनिक पर बुला लिया। वहां कुछ मरीज भी बैठे थे। दुआ सलाम के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

डाक्टर: कहां से आएं जनाब? मैने अपना परिचय दिया और साथ ही आने की वजह भी उन्हें बतायी। क्लीनिक पर कुछ लोग बैठे थे। इनमें महिला मरीजों की संख्या ज्यादा थी। इनसे बात करने का काफी प्रयास किया, लेकिन कोई बोलने को तैयार नहीं था। उन्होंने साफ कह दिया कि मसले पर कोई बात नहीं। डाक्टर: भाई साहब कोई कुछ नहीं बताएगा। यहां के हालात बहुत खराब हैं। आसपास की तो बात छोड़िये पूरे लोहिया नगर के लोग खासकर महिला और बच्चे इस ओर आने से डरते हैं।
मंजर याद कर आज भी कांप उठता है कलेजा
बुर्खा ओढ़े वहां मौजूद तभी एक बुजुर्ग महिला अचानक बोल उठी, जहां धमाका हुआ था, उससे दस कदम की दूरी ही उसका मकान है। वो मंजर याद कर आज भी कलेजा कांप उठता है। उसने अपने मकान की ओर इशार करते हुए कहा कि 20 दिन से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है। उस वाक्यात को, लेकिन शाम ढलते ही इस ओर से आते-जाते हुए भी डर लगता है।

देर रात यदि अचानक नींद खुल जाती है तो घर की छत पर जाते या फिर घर से बाहर निकलने में बच्चों की तो बात ही छोड़िये बड़ों को भी डर लगता है। एक अन्य शख्स बोल उठा भाई साहब हमने देखा है वो खौफनाक मंजर। ये जो आप बराबर वाला प्लाट देख रहे हैं न इसमें बनी तीन मंजिला बिल्डिंग धमाके के साथ बिखर गयी थी।
सड़क तक मलबा था। हवा में बारूद की गंद थी और सड़क जो पड़े थे, उनके जिस्म के चिथड़े हो गए थे। वो मदद के लिए हाथ उठाते थे, लेकिन खौफ ऐसा कि शुरू में कोई मदद के लिए आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। बातचीत का सिलसिला लंबा होने लगा।
मलबा दे रहा आज भी गवाही
क्लीनिक से सटा हुआ ही वो प्लाट है, जहां तीन मंजिला धमाका हुआ था। इससे सटा हुआ जिम और जिम के बराबर से जा रही गली के कौने वाला मकान एक मौलाना का है। उस मकान पर पहुंचे। दुआ सलाम हुई। ये मालौना पहचान गए थे, जिस दिन वाक्या हुआ था, उस दिन इनसे मुलाकत हुई थी।
मौलाना खुद ही बोले-भाई साहब हमारा काफी नुकसान हुआ था। मकान का बड़ा हिस्सा टूट गया था। दीवारें तो खड़ी करा ली हैं, लेकिन काम काफी बाकी है। इनके मकान के बाहर धमाके के दौरान जो दीवार गिरी थी, उसका मलबा आज भी वहीं पड़ा है।
शोर के बीच मरघट-सा सन्नाटा
कुछ और लोगों से बात की। उनका कहना था कि लोहिया नगर के एम पॉकेट में आपको शोर शराब सुनने को मिलेगा, लेकिन जब आप इस ओर कदम बढ़ाएंगे तो मरघट-सा सन्नाटा नजर आएगा। उनकी बात बिलकुल ठीक थी। प्लाट पर काफी देर खड़े रहने के बाद यह साफ हो गया था कि जिन्हें इस धमाके का इलम है, वो यहां से तेजी से निकलते हैं।
सैकड़ों सवाल, मगर जवाब नहीं
जिनसे बात की, उनके जहन में कुछ सवाल भी थे। किसी ने पूछा कि ऐसी भी क्या जल्दी थी जो हादसे के बा यहां बुलडोजर चलवा दिया गया। एक अन्य ने सवाल किया कि रात के अंधेरे में ही मलबा क्यों हटाया गया। दिन में भी यह काम हो सकता था। जब बिल्डिंग रिहायशी थी तो यहां नौ किलोवाट का बिजली का कामर्शियल कनेक्शन कैसे दे दिया गया। रिहायशी मकान वो भी बगैर नक्शा पास कराए

और उसमें तीन-तीन फैक्ट्रियों का चलना अफसर क्यों सोए रहे। सबसे बड़ा सवाल वो कौन लोग थे जो रात में यहां चलने वाली पटाखा फैक्ट्री मे काम करने के लिए आते थे और दिन निकलने से पहले चले जाते थे। उनको केवल आते और जाते ही देखते थे, दिन के उजाले में वो कभी नजर नहीं आते थे।
कौन देगा जवाब?
लोगों के सवाल इतने थे कि उनको गिना नहीं जा सकता था, लेकिन इन सवालों का उत्तर मेरे पास नहीं था। सवाल भले ही मुझसे किए थे, लेकिन उनका उत्तर उन्हें देना है जो सिस्टम चला रहे हैं।

