
एक मूर्तिकार एक रास्ते से गुजरा और उसने संगमरमर के पत्थर की दुकान के पास एक संगमरमर का पत्थर पड़ा देखा। उसने दुकानदार से पूछा, ये पत्थर बाहर क्यों डाला है? उसने कहा, ये पत्थर बेकार है। इसे कोई मूर्तिकार खरीदने को राजी नहीं है। मूर्तिकार ने कहा, मेरी रुचि है इस पत्थर में। दुकानदार ने कहा, आप इसको मुफ्त ले जाएं। ये दस वर्ष से यहां पड़ा है।
दो वर्ष बाद मूर्तिकार ने दुकानदार को अपने घर एक मूर्ति दिखाने के लिए आमंत्रित किया। दुकानदार उस पत्थर की बात भूल चुका था। मूर्ति देख कर उसकी आंखे खुली की खुली रह गईं। ऐसी मूर्ति शायद ही कभी बनाई गई हो। भगवान श्री कृष्ण का बाल रूप मईया यशोदा के साथ उस मूर्तिकार ने तराशा। इतनी जीवंत कि उसे भरोसा नहीं आया। दुकानदार ने पूछा, ये अद्भुत पत्थर तुम कहां से लाए?
मूर्तिकार ने हंसते हुए कहा, ये वही पत्थर है, जो तुमने व्यर्थ समझ कर मुझे मुफ्त में दे दिया था। उसने पूछा, उसको तो कोई लेने को भी तैयार नहीं था। तुमने उस पत्थर को इतना खूबसूरत रूप दे दिया। तुम्हें पता कैसे चला कि इस पत्थर से इतनी सुंदर प्रतिमा बन सकता है? मूर्तिकार ने कहा, आंखें चाहिए पत्थरों के भीतर देखने वाली। अधिकतर लोगों के जीवन उनके अपने कारण अनगढ़े रह जाते हैं। क्योंकि उन्होंने कभी छैनी नहीं उठाई।
हमने कभी सोचा ही नहीं कि ये मेरा जीवन भी अनगढ़ पत्थर है और इसमें छिपा हुआ भगवान प्रकट हो सकता है। मूर्तिकार ने कहा, मैं जब रास्ते से निकला था। इस पत्थर के भीतर बैठे भगवान ने मुझे पुकारा कि मूर्तिकार मुझे मुक्त करो। मैंने कुछ किया नहीं है, भगवान तो इसमें पहले से थे। प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा को अपने भीतर ही बैठा है। जरूरत थोड़े से पत्थर छांटने हैं। थोड़ी छैनी उठाने की है। उस छैनी उठाने का नाम ही भक्ति है।
प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


