Wednesday, May 29, 2024
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दुनिया के लिए चुनौती बनता मानसिक अवसाद

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Ravivani 28


सीमा अग्रवाल |

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी न होना और शारीरिक सेहत से नहीं होता। बल्कि स्वास्थ्य सामाजिक, मानसिक और शारीरिक तीनों से जुड़ा है। इन तीनों में जहां भी व्यक्ति कमजोर है वहां वो अस्वस्थ माना जाता है। उसे सेहतमंद नहीं कह सकते। अच्छी सेहत वाला व्यक्ति वो है जो इन सभी मानकों पर खुश है और हर स्तर पर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। जो जीवन में सामान्य तनावों का सामना करने में सक्षम है। उत्पादक तरीके से काम करता है। अपने समुदाय में योगदान देने में तैयार है। दरअसल मानसिक स्वास्थ्य का संबंध इंसान के भावनात्मक पहलू से है जो उसके सोचने, समझने, कार्य करने की शक्ति को प्रभावित करता है। यूं तो मानसिक विकार कई तरह के होते हैं। मसलन डिमेंशिया, तनाव, चिंता, भूलना, अवसाद, डिस्लेसिया आदि। लेकिन इन सभी में अवसाद ऐसा मनोविकार है जिससे पूरी दुनिया त्रस्त है। हर आयु, वर्ग का व्यक्ति आज मानसिक अवसाद के दौर से गुजर रहा है। इस अवसाद के तमाम कारण सामने आ रहे हैं।

डब्लूएचओ के अनुसार पिछले एक दशक में तनाव और अवसाद के मामले में 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। भारत की करीब 6.5 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत आबादी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी मेंटल हेल्थ के मुद्दे के प्रति न्यायपालिका को संवेदनशील होने पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को वनसाइज फिट फॉर आॅल के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। अच्छी मेंटल हेल्थ हर व्यक्ति का मानवाधिकार है। जिससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि मेंटल स्ट्रेस आनुवांशिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक हर तरह की हो सकती है। इस अवस्था से किसी इंसान को बाहर निकालना आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती है। जिससे डॉक्टर और एक्सपर्ट्स भी परेशान हैं। देखा गया है कि कई बार प्रारंभिक जीवन के बुरे अनुभव, हादसे और घटनाएं मन को इतना इफेक्ट करती हैं कि उनके असर से इंसान मेंटली इल हो जाता है। एक प्रकार के मनोविकारों का शिकार हो जाता है। ये मनोविकार और नकारात्मकता उसके मन और सेहत दोनों को खराब करती जाती है।
मानसिक अवसाद का बड़ा कारण बेरोजगारी और गरीबी भी है। 2011 की जनगणना के अनुसार देखें तो आंकड़े बताते हैं कि मानसिक रोगों से ग्रस्त करीब 78.62प्रतिशत लोग बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। आज युवाओं में बढ़ते आत्महत्या के मामले भी इसकी पुष्टि करते हैं। कि बेरोजगारी से परेशान युवा इस कदर मानसिक नकारात्मकता के दौर से गुजर रहे हैं कि वो सुसाइड जैसा गंभीर कदम उठाने को मजबूर हैं। ये आंकड़े इशारा करते हैं कि युवाओं में तेजी से मानसिक अवसाद फैल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी देश की आर्थिक हालत गंभीर होती है तो वहां मानसिक अवसाद भी बढ़ जाता है।

डब्लूएचओ ने 2013 में मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर महत्व देते हुए वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली में एक व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्ययोजना को मंजूरी दी थी। जो 2013-2020 तक के लिए थी। इस कार्ययोजना में सभी देशों ने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की कसम खाई थी। भारत ने भी इस कार्ययोजना को अपने यहां लागू किया था। लेकिन आज भी भारत में मेंटल हेल्थ के हालात भयावह हैं। इसके पीछे तमाम कारण है। इसमें बड़ा कारण मेंटल हेल्थ पर खर्च होने वाला बजट है। आज भी भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर किया जाने वाला व्यय बहुत कम है। भारत अपने कुल सरकारी स्वास्थ्य व्यय का मात्र 1.3 प्रतिशत ही मेंटल हेल्थ पर खर्च करता है। 2011 की जनगणना के अनुसार 1.5 मिलियन लोग बौद्धिक अक्षमता और तकरीबन 722826 लोग मनोसामाजिक दिव्यांगता का शिकार हुए थे। यह संख्या पिछले दस सालों में करीब दोगुनी हो गई है। लेकिन उस पर खर्च होने वाला बजट आज भी कम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है।

डब्लूएचओ के अनुसार साल 2011 में भारत में मेंटल इलनेस से पीड़ित प्रत्येक एक लाख रोगियों के लिए 0.301 मनोचिकित्सक और 0.07 मनोवैज्ञानिक थे। यह हालत पिछले दस सालों में बहुत बेहतर नहीं हुई है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2017 में भारत की विशाल जनसंख्या के लिए मात्र 5 हजार मनोचिकित्सक और 2000 से भी कम मनोवैज्ञानिक थे।
वहीं कॉमनवेल्थ देशों के नियमानुसार प्रति दस हजार पर पांच मनोचिकित्सक होना चाहिए। हाल में जारी वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक के आंकड़े दशार्ते हैं कि भारत में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कम प्रसन्न और तनावग्रस्त अधिक होती हैं। इसलिए यहां महिला आत्महत्या दर पुरुषों से कहीं ज्यादा है। दरअसल भारत में घरेलू हिंसा, कम उम्र में शादी, युवा मातृत्व, लैंगिक भेदभाव काफी है। जो महिलाओं में मानसिक अवसाद और मनोविकारों का प्रमुख कारण है। महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती हैं। लेकिन समाज में इस तथ्य की अनदेखी महिलाओं को मानसकि रोगी बना रही है। पिछले दिनों डब्लूएचओ ने आगाह किया कि 2024 तक भारत की 20 प्रतिशत से भी अधिक आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित होगी।

आज भी मानसकि स्वास्थ्य की पूरी तरह उपेक्षा की जाती है। इसे काल्पनिक माना जाता है। मानसिक विकारों के प्रति भारत में जागरुकता की बहुत कमी है। जागरुकता के इसी अभाव और अज्ञानता के कारण लोगों द्वारा किसी भी प्रकार के मानसिक स्वास्थ्य विकार से पीड़ित व्यक्ति को मंदबुद्धि मान लिया जाता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियां भी एक बड़ी चुनौती है। भारत में यदि कोई व्यक्ति एक बार किसी मानसिक रोग से ग्रसित हो जाता है तो जीवनभर उसे समाज में बड़े मुश्किल माहौल, हालातो में जीना पड़ता है। उसका समाज की मुख्यधारा में जुड़ना बहुत कठिन हो जाता है।


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