उषा जैन ‘शीरीं’
बच्चों का अधिकतम समय शिक्षा ग्रहण करते हुए क्लास में ही गुजरता है जहां उसका अपने क्लासमेट्स से इंटर एक्शन लंबे समय तक चलता है। हर बच्चा अपने जींस और संस्कारों के अनुरूप ढलता है लेकिन वातावरण का उनकी मानसिकता पर जितना इमीजिएट प्रभाव पड़ता है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। सभी इस बात को जानते हैं कि सिनेमा टीवी का बच्चों पर आज कितना गलत असर पड़ रहा है। ग्लैमर की चकाचौंध, ऐशपूर्ण जिन्दगी, स्वच्छंदता, उद्दडंता बड़ों की सीख की अवहेलना और अपनी मनमर्जी चलाना आज का नॉर्म है। आज के बच्चों में धैर्य नहीं बल्कि यूं कहें कि आज की कल्चर में ही धैर्य नहीं है तो गलत न होगा। जब बड़ों में ही यह गुण नहीं है तो बच्चों से इस गुण की उम्मीद कैसे की जा सकती है। रोड रेज के किस्से बढ़ गए हैं। कुछ यही हाल क्लास रेज का भी है।
क्लास में बुली करने, दादागिरी दिखाने के किस्से तो टॉम जोंस, चार्ल्स डिंकस के जमाने से चले आ रहे हैं लेकिन आज इनका स्वरूप हद पार कर गया है। गर्लफे्रंड को लेकर या पैसों को लेकर आज लड़के साथ पढ़ने वाले दोस्त की जान तक ले रहे है। कभी कोई मामूली सी कहासुनी ही बड़े झगड़े को जन्म दे देती है। इस समय लड़कों में परिपक्वता की कमी होती है और खून गर्म होता है जोश में वे होश खो बैठते हैं और ऐसा कुछ कर गुजरते हैं जिसमें कई जिन्दगियां एक साथ बर्बाद हो जाती हैं। स्वयं का भविष्य तो अंधकार में डूबता ही है।
मां बाप पर ही अगर उंगली उठती है तो यह सही नहीं है। कई बार स्थिति मां बाप के नियंत्राण में नहीं रहती। लाख कोशिशों, सेक्रिफाइसेज के बावजूद बच्चा उनके कहने में नहीं रहता, उनकी बात नहीं सुनता। उसकी लाइफ बिगड़ जाती है। वे फिजूल अपने को दोषी मान सिर धुनते पछताते रह जाते हैं। पीयर प्रैशर, आज के माहौल, बदलती सोच, फैशन के प्रति दीवानगी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं से बच्चों को कैसे महफूज रखा जाए?
सबसे जरूरी बात है बच्चों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना, अपने प्रति उनमें विश्वास बनाए रखना ताकि वे अपनी सब बातें आपसे शेयर करते रहें। उन्हें समझना जरूरी है और उससे ज्यादा जरूरी है उनमें यह विश्वास जगाए रखना कि आप उन्हें समझते हैं। उनकी गलतियों पर बजाय तूफान खड़ा कर उन्हें डांटने मारने-जलील करने के उन्हें माफ करते हुए ये सोचें कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? बच्चे को समझाया जाए कि इससे उसे कितना नुकसान हुआ है हो सकता या होने वाला है।
बचपन से ही बच्चे को आक्रामकता के बुरे परिणामों के बारे में सचेत करायें। ‘टिट फॉर टेट’ अर्थात जैसे को तैसा का पाठ न पढ़ाते हुए उसे इस तरह की स्थिति को सही तरीके से हैंडल करना सिखलाएं। टीचर से प्रिंसिपल से पेरेंट्स से शिकायत करने की राय दें, बजाय स्वयं मारपीट कर के हिसाब बराबर करने के क्योंकि ये हिसाब मारपीट से कभी बराबर नहीं होते। बच्चे पर शुरू से लगातार ‘वॉच’ रखें। अगर आप को वो नॉर्मल बर्ताव से हटकर बर्ताव करता हुआ लगे तो सावधान हो जाएं। बच्चे का आक्रामक होना चिंता का विषय है। समझाने पर भी अगर वो नहीं समझता तो स्कूल में काउंसलर से क्लास टीचर से बात करें जानने की कोशिश करें कि क्लास में, स्कूल में कोई आपके बच्चे को बुली तो नहीं कर रहा है। बच्चा जो पढ़ता है, जो टीवी पर देखता है, उससे वाकिफ रहें। इसी तरह इंटरनेट पर जो सर्च करता है, जो वीडियो गेम्स खेलता है, उसकी नॉलेज भी रखें। हिंसा और सैक्स से भरपूर फिल्में बच्चे को न देखने दें।
अगर आपके पास रिवॉल्वर है तो उसे बच्चे की पहुंच से दूर रखें। कभी भी भरी हुई पिस्तौल घर में न रखें। बच्चे का स्कूल बैग चैक करते रहें। उसके पास कोई भी इस तरह की चीज जिसे हथियार बना के इस्तेमाल किया जा सके, बरामद होने पर संभल जाएं। इस पर उचित एक्शन समय से ले लेंगे तो होने वाली मुसीबतों को टाला जा सकता है। पेरेंट्स टीचर्स मीट में जरूर जाएं। यहां आपको बच्चे के बारे में फीडबैक मिलता है। बच्चे की जो भी शिकायतें आपके सामने रखी जाएं, उस पर बजाय भड़कने के ठंडे दिमाग से गौर करें। बच्चे के लिये रेज की अभिव्यक्ति जरूरी है। उन्हें अपने क्रोध को पहचानना तथा साथ ही स्वीकारना सिखायें।
आप स्वयं रोल मॉडल बनें। विपरीत पस्थितियों में आप स्वयं कैसे रिएक्ट करते हैं, आपका अपने पर कितना नियंत्राण रहता है। उस व्यवहार का बच्चे पर गहरा असर पड़ता है जो उसकी बाद की जिन्दगी में भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। आप कूल रहेंगे तो बच्चा भी हॉट होकर क्लास में उत्पात मचाये, ऐसे चांसेस कम होंगे।

