Friday, February 13, 2026
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हार का गठबंधन बनाते मोदी

Samvad 1


vishnu hari sarawatiनरेंद्र मोदी क्या जीत का गठबंधन बना रहे है या हार का गठबंधन बना रहे हैं? पहले जीतन राम मांझी जो दिन-प्रतिदिन नहीं, बल्कि पल-पल में रंग बदलते हैं। कभी लालू को महान बताते हैं, कभी नीतीश कुमार को महान बताते हैं। भाजपा को सरेआम गालियां बकते थे। जीतन राम मांझी अब एनडीए का सदस्य और भाजपा के लिए वंदनीय हो गए। मांझी के बाद ओमप्रकाश राजभर भी एनडीए का सदस्य हो गए। ओमप्रकाश राजभर पिछले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के पहले ही अखिलेश यादव की गोद में जा बैठे थे। नीतीश कुमार को गले लगाने के हश्र के बाद भी भाजपा की ऐसी नीति क्या कही जाएगी? कहा यह जा रहा है कि पसमंदा मुसलमानों को नजदीक लाने के लिए मुसलमान समर्थक पार्टियों और नेताओं की चरणवंदना की जा रही है।

जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुसलमानों की बात कही थी और उन्हें विकास की योजनाओं से जोड़ने, उनके हितों की रक्षा करने, उन्हें सम्मान दिलाने आदि की प्रेरणा दिखायी थी उसी दिन यह तय हो गया था कि अब उग्र हिंदुत्व के दिन लद गए।

भाजपा भी कांग्रेस की बी टीम की तरह अपनी राजनीतिक पहचान बनाएगी। एकाएक मुसलमानों के लिए नयी-नयी बातें होंगी और उनके लिए कई घोषणाएं भी होंगी। इसी कारण बहुत सारे वैसे प्रश्नों को छोड़ दिया गया है, जो वोट के समय बहुत ही उग्र माने जाते थे। लोकसभा चुनावों की उल्टी गिनती भी शुरू हो गई है।

इसी कारण देश की राजनीति में शह-मात का खेल जारी है। नरेंद्र मोदी एक तरफ तो दूसरी तरफ कांग्रेस का मोर्चा सामने हैं। दोनों के बीच में कुश्ती जारी है। पर घोर आश्चर्य की बात और रणनीति ओमप्रकाश राजभर को लेकर सामने आई है। ओमप्रकाश राजभर ने घोषणा भी की है कि उनके आने से पिछडों और मुसलमानों का झुकाव भाजपा की ओर बढेगा।

इसके पीछे तर्क उन्होंने यह दिया है कि वे खुद पिछडों और मुसलमानों के रखवाले हैं और मसीहा है। इसलिए उनके कहने पर पिछडों और मुसलमानों का वोट भाजपा को मिलेगा। ओमप्रकाश राजभर कभी एनडीए का ही हिस्सा थे और उनकी पार्टी भाजपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लडी थी। 2017 से लेकर 2019 तक वे भाजपा के साथ थे और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी थे।

फिर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं लक्ष्मण रेखा लांघने लगी। दुष्परिणाम यह हुआ कि अनुशासन और सम्मान खतरे में पड़ गया। 2019 में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद उन्होंने भाजपा को ब्लैक मेल करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इतना ही नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के संबंध में ऐसी-ऐसी बातें कहने लगे थे जो अशोभनीय होती थी और अपमानजनक भी होती थीं।

पिछले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में ओमप्राकश राजभर ने योगी सरकार को दफन करने की कसमें खार्इं थीं। कोई चत्मकार नहीं हो सका। योगी आदित्यनाथ फिर से मुख्यमंत्री बन गए। ओमप्रकाश राजभर अपने स्वभाव के अनुसार रंग बदलने लगे। जिस अखिलेश यादव का वह गुनगान करने से नहीं चुकते थे, उसी अखिलेश यादव के खिलाफ बागी हो गए।

वास्तव में ओमप्रकाश राजभर को लगने लगा कि अखिलेश यादव तो सत्ता में तो अब आएंगे नहीं, फिर उनके साथ क्यों रहना? ओमप्रकाश राजभर को भाजपा ने अपने साथ क्यों जोड़ा? उन्हें एनडीए के सदस्य होने से अधिक लाभार्थी कौन होगा? राजनीति में कड़ियों को जोड़-जोड़ कर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। राजनीतिक कडियों की गौर से अध्ययन करेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसके पीछे पसमांदा चिंतन है।

उत्तर प्रदेश में दो घटनाएं महत्वपूर्ण हैं। एक मुख्तार अंसारी को कानून के शिकंजे में कैद करना और कानूनी हिंसाब-किताब करना। दूसरी घटना है अतीक अहमद का हश्र। ये दोनों घटनाओं से मुस्लिम वर्ग भाजपा से नाराज है। इधर मुख्मार अंसारी भी पसमांदी जाति से आते हैं।

मुख्तार अंसारी के ओमप्रकाश राजभर से अच्छे संबंध हैं। जब अखिलेश यादव और मायावती ने हिंदुओं की प्रंचड उत्थान के डर से मुख्तार अंसारी के बेटे को विधान सभा का टिकट देने से इनकार कर दिया था, तब ओमप्रकाश राजभर ने ही अपनी पार्टी से मुख्तार के बेटे को टिकट दिया था।

मुख्तार का बेटा चुनाव जीतकर विधायक भी है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि ओमप्रकाश राजभर की मुख्तार अंसारी ने भाजपा से दोस्ती करायी है। इसका सर्वाधिक लाभ मुख्तार अंसारी को होगा। मुख्तार अंसारी के परिवार पर चल रहे कानूनी अभियान शिथिल हो जाएंगे।

कानूनी प्रक्रियाएं धीमी हो जाएंगी, गवाहों को सुरक्षा और भरोसा दिलाने का काम बंद हो जाएंगे। इसका दुष्परिणाम होगा कि कोर्ट से सबूत के अभाव में मुख्तार अंसारी बरी होता चला जाएगा। नरेंद्र मोदी की सोच है कि पसमांदा मुसलमानों से अपनी किस्मत चमकायी जाए और बनायी जाए। पसमांदा मुसलमान उन मुसलमानों को कहा जाता है कि जो निम्न जाति कही जाती हैं।

पसमांदा को लेकर भ्रांतियां भी बहुत हैं। ये कहते हैं कि हमारे साथ जाति को लेकर ज्यादतियां हुई हैं। पर इस्लाम में जातिवाद है नहीं। अगर इस्लाम में जातिवाद है तो फिर इन्हें इस्लाम से विरोध व बगावत करना चाहिए। जिस प्रकार से दलित हिंदू धर्म से विरोध करते हैं, बगावत करते हैं, उसी प्रकार से पसमांदा मुसलमान इस्लाम से विरोध और बगावत क्यों नहीं करते हैं?

पसमांदा के अंदर से कोई भीमराव अंबेडकर जन्म क्यों नहीं लेता है। कभी पासमांदा मुसलमान दलित एक्टिविस्टों की तरह जातिवाद के लिए इस्लाम को जिम्मेदार क्यों नहीं मानते हैं? पसमांदा भी इस्लाम के आधार पर वोट करते हैं और उसी पार्टी को अपना वोट करते हैं, जो भाजपा को हराने की शक्ति रखता है। इसका उदाहरण असम का पिछला विधान सभा चुनाव है।

जिन मुस्लिम एकाधिकार वाले बूथों पर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के दर्जनों सदस्य थे, उन बूथों पर भाजपा को एक भी वोट नहीं मिले थे। असम के मुख्यमंत्री हेमंता विस्व शर्मा ने इस प्रसंग पर अपनी बात कह कर अपनी ही पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा को बेनकाब कर दिया था।

बिना मुस्लिम चिंता और समर्थन के कोई एक बार नहीं, बल्कि दो बार नरेंद्र मोदी अपनी सरकार और किस्मत बना चुके हैं। नरेंद्र मोदी को कांग्रेस की बी टीम बनने की जरूरत नहीं है, मोदी को कांग्रेस के फोटो कॉपी बनने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस की गठबंधन राजनीति से भी डरने की जरूरत नहीं है।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन का कोई अस्तित्व नहीं होगा। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में आपसी समझौते होने की काफी कम संभावनाएं हैं। इसलिए मोदी को आत्मघाती गठबंधन बनाने से बचना चाहिए। रंगबदलुओं और ब्लैकमैलरों से बचना चाहिए।


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