जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: नेपाल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जेनरेशन-Z के आंदोलन ने विकराल रूप ले लिया है। राजधानी काठमांडू समेत कई प्रमुख शहरों में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं बढ़ने के बाद अब नेपाल सरकार ने नियंत्रण पूरी तरह सेना के हवाले कर दिया है। हालात की गंभीरता को देखते हुए नेपाली सेना ने देशभर में कर्फ्यू लागू कर दिया है।
सेना को मिला “Shoot at Sight” का अधिकार!
सूत्रों के मुताबिक, जिन इलाकों में हिंसा चरम पर है, वहां सेना को “देखते ही गोली मारने” का आदेश दिया गया है। काठमांडू, पोखरा, बुटवल, बीरगंज और धनगढ़ी जैसे शहरों में सड़कों पर सेना के बख्तरबंद वाहन गश्त कर रहे हैं।
प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे
सोमवार से शुरू हुए Gen-Z आंदोलन ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है।
सिंह दरबार, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, और कई राजनीतिक नेताओं के घरों को प्रदर्शनकारियों ने निशाना बनाया।
सरकारी दस्तावेज, फाइलें और संवेदनशील रिकॉर्ड जलकर राख हो चुके हैं।
PM ओली ने दिया इस्तीफा
जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग को लेकर उग्र हो रहे इस आंदोलन के दबाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। इसके बावजूद प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहे।
सोशल मीडिया पर अब भी बैन
सरकार ने फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी है।
लोगों का आरोप है कि सरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचल रही है।
भारत ने जारी की एडवाइजरी
भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल में रह रहे भारतीय नागरिकों से सतर्क रहने और अनावश्यक बाहर न निकलने की अपील की है।
काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास लगातार संपर्क में है और सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए हैं।
कर्फ्यू के क्या मायने?
सभी सार्वजनिक सभा, स्कूल, कॉलेज, बाजार, दफ्तर बंद कर दिए गए हैं।
कर्फ्यू तोड़ने वालों पर सीधे गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
जमीनी हालात
सड़कें वीरान हैं, केवल सेना और पुलिस के जवान ही नजर आ रहे हैं।
कई इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क बाधित कर दिए गए हैं।
क्या आगे और बिगड़ेंगे हालात?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द राजनीतिक समाधान नहीं निकाला गया, तो नेपाल गृह युद्ध जैसे हालात की ओर बढ़ सकता है। सेना की सख्ती फिलहाल शांति तो ला सकती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए संवाद और जवाबदेही जरूरी है।
नेपाल की सड़कों पर इन दिनों लोकतंत्र, अधिकार और गुस्सा आमने-सामने खड़े हैं। सेना की तैनाती और देशव्यापी कर्फ्यू से हालात अस्थायी रूप से काबू में हैं, लेकिन असली लड़ाई अब भी बाकी है – एक पारदर्शी और जवाबदेह शासन व्यवस्था के लिए।

