- एक पार्टी अस्तित्व खड़ा करने के नजरिये से तोल रही आंदोलन को
- गौरव टिकैत के कदम कहीं किसान आंदोलन को पथ भ्रमित न कर दे
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कृषि कानून के खिलाफ देशभर का किसान भारतीय किसान यूनियन के झंडे के नीचे एकजुट हो रहा है। भाकियू किसानों का अराजनीतिक संगठन है, लेकिन इसी बीच एक राजनीतिक दल वेस्ट यूपी में अपना राजनीतिक अस्तित्व खड़ा करने के लिए महापंचायतों के मंच को साझा करने का कृत्य कर रहा है।
यह ऐसा मौका है, जब किसान सड़क पर हैं, लेकिन यह राजनीतिक दल किसान आंदोलन में अपना अस्तित्व तलाश रहा है। नमक व लौटे की राजनीति की भर्त्सना हो रही है। फिर महापंचायतों में यह घृणित कृत्य की कोशिश से सत्तारुढ़ दल को भी किसानों के इस आंदोलन पर उंगली उठाने का मौका दिया जा रहा है।
33 वर्ष पहले भाकियू का करमूखेड़ी (मुजफ्फरनगर) के आंदोलन से जन्म हुआ था। बड़े-बड़े आंदोलन का भाकियू गवाह रहा हैं, लेकिन तमाम आंदोलन अराजनीतिक ही रहे। गाजीपुर बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन के समर्थन में वेस्ट यूपी में खापों की महापंचायत हो रही है, लेकिन महापंचायत के मंच को जिस तरह से बिजनौर में गौरव टिकैत के साथ रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने मंच साझा किया हैं, वह एक बार फिर सवालों में आ गया है। इससे आंदोलन के राजनीतिकरण को लेकर उंगली उठना लाजिमी है।
मंच पर गौरव टिकैत व जयंत चौधरी की युगल बंदी कहीं इस आंदोलन को दूसरा मोड नहीं दे दे। एक तरह से रालोद वेंटीलेटर पर चल रहा है तथा खिच-खिचकर सांसें आ रही हैं, लेकिन किसानों के इस आंदोलन को रालोद ने एक मौके के रूप में लेकर फिर से राजनीतिक अस्तित्व खड़ा करने की कोशिश हो रही है। मुजफ्फरनगर की महापंचायत में नमक व लौटे की घिनौनी राजनीति की गई। यह तब हुआ, जब पूरे देश का किसान कृषि कानून के खिलाफ खड़ा हो रहा है।
ऐसे माहौल में जयंत चौधरी ने नमक व लौटा उठाकर पूरे आंदोलन को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की, जो अमर्यादित है। बात आंदोलन की होनी चाहिए थी, मगर वहां पर लौटा नमक डालने की गई। महापंचायत कोई राजनीतिक नहीं थी, बल्कि अराजनीतिक मंच पर लौटा व नमक की बात करके राजनीतिक रूप देने की कोशिश हुई है। यही नहीं, महापंचायतों के बीच राजनीतिक वातावरण तैयार किया जा रहा है। ऐसे में रालोद नेता इस आंदोलन के जरिये संजीवनी की तलाश में लगे हैं।
यही वजह है कि महापंचायतों के मंच साझा कर रहे हैं। किसानों के आंदोलन को कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, सुखबीर सिंह बादल व इंडियन नेशनल लोकदल नेता अभय चौटाला सरीखे बड़े नेता भी समर्थन देने का ऐलान कर चुके हैं, लेकिन उनको भी मंच से दूरी बनाकर रखा गया है। बड़े मंच पर किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं को नहीं बैठाया जा रहा है, क्योंकि भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत सत्तारूढ़ दल को कोई भी मौका देना नहीं चाहते। बिजनौर में हुई महापंचायत में मंच पर गौरव टिकैत ने जयंत चौधरी को बुलाकर मंच साझा कराया, जो आंदोलन को राजनीतिक रंग में रंगता हुआ नजर आ रहा है।
भाकियू के इतिहास पर दृष्टि डाली जाए तो उसके तमाम आंदोलन अराजनीतिक ही रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा रहे हो या फिर पूर्व मुख्यमंत्री वीर बाहदुर, इन्हें भी भाकियू के मंच पर जगह नहीं दी गई थी। तब पूरी तरह से आंदोलन अराजनीतिक ही रहे, लेकिन वर्तमान में आंदोलन का रूवरुप राजनीति के रंग में रंगता हुआ दिखाई दे रहा हैं। इस तरह से सत्तारुढ़ पार्टी को फिर से एक मुद्दा बोलने के लिए भाकियू ने थमा दिया है। क्योंकि महापंचायत खापों की हो रही है, राजनीतिक दलों की मीटिंग नहीं।
आंदोलन का मुद्दो कृषि कानून हैं। यदि राजनीतिक दलों को कृषि कानून का विरोध ही करना है तो राजनीतिक मीटिंग करके सरकार के साथ दो-दो हाथ करें तो समझ में आता है, लेकिन राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी भाकियू के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही है, जो आंदोलन का अहित कर सकती है। इसको लेकर भाकियू नेताओं को मंथन करने की आवश्यकता है।
वहीं, अन्य विपक्षी दल भी भाकियू का मंच साझा करने की कोशिश कर रहे हैं। यह भी संदेश जनता में जा रहा है कि लगातार राजनीतिक नेता भाकियू के मंच पर आकर आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं। पहले ही भाजपा के शीर्ष नेता कह चुके हैं कि विपक्षी दलों के नेता किसानों के आंदोलन को पर्दा के पीछे से अपना समर्थन दे रहे हैं। जिससे किसानों का आंदोलन कहीं भटक न जाए।

