
हम चाहें या ना चाहें, इंसानियत को बचाए रखने के लिए अहिंसक, लोकतांत्रिक और मानवीय प्रयासों की ही जरूरत पड़ती है। ये प्रयास सामूहिक हों तो और बेहतर। ऐसे प्रयासों को कारगर बनाने के लिए उन्हें लगातार याद करते रहना भी जरूरी है।
भारत डोगरा
महात्मा गांधी की विरासत स्वतंत्र भारत में अनेक अहिंसक आंदोलनों के रूप में फलती-फूलती रही है। इससे कई सार्थक परिणाम प्राप्त हुए हैं। इसके बावजूद इस समय देश में निरंतरता से सार्थक बदलाव को आगे बढ़ाने वाले किसी बडे़ व व्यापक प्रयास का अभाव है। वास्तव में पूरे विश्व स्तर पर ही बढ़ते अनिश्चय व गंभीर होती समस्याओं के बीच वैचारिक संकट है व परिपक्व माने जाने वाले लोकतंत्रों में भी मनमानी के निर्णय लिए जा रहे हैं।
इस स्थिति में यदि भारत में कोई ऐसा अहिंसक राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन उभरता है जिसकी सोच देश के साथ पूरे विश्व की भलाई की सोच हो, जो इसके लिए निरंतरता से व्यापक स्तर पर लोगों को जोड़ सकता है व जो बुनियादी बदलाव की राह पर चलते हुए साथ में बहुत से लोगों के दुख-दर्द को कम करते हुए आगे बढ़ता है तो यह एक ऐसी उपलब्धि होगी जिसका लाभ देश के साथ विश्व स्तर पर भी मिल सकेगा।
इसके पहले कदम के रूप में जरूरी है कि दुनिया और देश के स्तर पर जो आगे की उचित राह होनी चाहिए उसके बारे में एक दस्तावेज तैयार किया जाए। इतना तो मानकर चला जा सकता है कि इसके मुख्य सिद्धान्त हैं – न्याय व समता, अमन-शांति व अहिंसा, पर्यावरण व जैव-विविधता की रक्षा, लोकतंत्र व पारदर्शिता, विकेंद्रीकरण व बढ़ता आपसी सहयोग तथा बेहतर सामाजिक संबंध।
इन सिद्धांतों के आधार पर देश और दुनिया की भावी राह तय करने के साथ इन्हें अधिक से अधिक लोगों तक ले जाना जरूरी है। विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए इन सिद्धांतों का कैसे उपयोग किया जाए? अपना, आसपास का जीवन, देश व दुनिया की स्थिति बेहतर करने के लिए इन सिद्धांतों के आधार पर क्या राह निकाली जाए? यह सवाल बहुत जरूरी है व सही शिक्षा की प्राप्ति और प्रसार तो ऐसे सवालों के उत्तर खोजने में ही निहित है।
एक ओर ऐसे आंदोलन को इन सिद्धांतों के आधार पर देश और दुनिया की आज से कहीं बेहतर व्यवस्था की पहचान बनानी होगी। यह कुछ इस तरह किया जाएगा कि एक ओर लोगों का दुख-दर्द बहुत कम किया जा सके तथा दूसरी ओर धरती की जो जीवन क्षमताएं संकटग्रस्त हो गई हैं, उन्हें समय रहते बचा लिया जाए तथा इस तरह भावी पीढ़ियों का जीवन भी सुरक्षित किया जाए। इस विमर्श व नियोजन में जरूरी है कि जो समाधान सामने आएं वे एक-दूसरे से मेल रखने वाले हों तथा सभी मनुष्यों के साथ अन्य जीवन-रूपों की भलाई पर भी समुचित ध्यान दिया जाए। दूसरी ओर, इस आंदोलन को चाहिए कि वह ऐसी राह अपनाए जिस पर चलते हुए बहुत से लोग अपने दुख-दर्द को कम कर सकें। अन्याय व विषमता कम होने से तो दुख-दर्द कम होते ही हैं, साथ में तरह-तरह के नशे, दैनिक जीवन में हिंसा, टूटते बिखरते सामाजिक संबंधों जैसी समस्याओं के कम होने से भी दुख-दर्द कम होता है। अत: आंदोलन की बुनियादी बदलाव की ओर बढ़ते हुए ऐसे सतत् रचनात्मक प्रयास करने चाहिए जिससे कि सभी तरह के दुख-दर्द कम होते जाएं व इस आधार पर अनेक लोग आंदोलन से जुड़ते रहें।
अन्याय व विषमता के विरुद्ध संघर्ष करने के साथ-साथ ऐसे बहुत से रचनात्मक कार्य जरूरी हैं जिनसे टिकाऊ रोजगार बढ़ते हैं, किसानों व दस्तकारों की आजीविका मजबूत होती है, गांवों की आत्म-निर्भरता बढ़ती है और आपसी सहयोग से समस्याएं कम होती हैं। इस तरह के रचनात्मक प्रयासों को निरंतरता से बढ़ाना चाहिए। समता व पर्यावरण रक्षा आधारित सामुदायिक जीवन के अनेक प्रयोग करने चाहिए जो वैकल्पिक जीवन की राह प्रस्तुत करें। ऐसे आंदोलन का एक चुनावी राजनीतिक पक्ष भी होना चाहिए। इसके अन्तर्गत पहले स्थानीय और फिर राज्य व राष्ट्रीय स्तर के चुनावों में राजनीतिक दल बनाकर उम्मीदवार खड़े किए जा सकते हैं या स्वतंत्र उम्मीदवारों को समर्थन दिया जा सकता है। आंदोलन अपनी राह पर चलता रहेगा व चुनावी राजनीति के लिए कोई समझौते नहीं किए जाएंगे। अपनी राह पर चलते हुए जितनी चुनावी सफलता मिले या न मिले, उसे स्वीकार करते हुए आंदोलन अपनी राह पर बना रहेगा।
इस आंदोलन को अहिंसक होने के साथ-साथ लोकतांत्रिक तौर-तरीके व पारदर्शिता अपनाना चाहिए। उसकी सभी गतिविधियां गुप्त न होकर सार्वजनिक व पारदर्शी हों। धन प्राप्त करने के स्रोत, हिसाब-किताब सभी पारदर्शी होने चाहिए। यदि कोई सदस्य आंदोलन से एक होते हुए कुछ मुद्दों पर अलग राय रखता है, तो उस पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए। ऐसे आंदोलन की अपनी राह और अपने विकल्पों को आगे ले जाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए व दूसरों की या विरोधियों की कटु आलोचना पर अपनी शक्ति नहीं लगानी चाहिए। जहां आलोचना जरूरी हो वहां वह मर्यादित व शालीन रहे।


