बहुत पुरानी बात है। ऊंटों के कुछ व्यापारी अपने ऊंट लेकर किसी मेले में जा रहे थे। वे बीस आदमी थे और सभी के पास एक ऊंट। यानी कुल मिलाकर बीस ऊंट। उन्होंने चलते हुए शाम को एक स्थान पर पड़ाव डाला तो सबने सोचा, पहले ऊंटों की गिनती कर ली जाए। एक ने गिनना शुरू किया। एक ओर से उन्नीस पर पहुंचकर उसकी संख्या समाप्त हो गई। अपने साथियों को गिना तो वे भी उन्नीस ही निकले। उसने घोषणा कर दी कि एक आदमी और एक ऊंट कम है। दूसरे ने गिना। संख्या उन्नीस ही निकली। ऐसे में उनमें घबराहट बढ़ गई। उन्होंने पास में गुजरते हुए एक आदमी को आवाज देकर बुलाया और कहा, क्या आपने रास्ते में कोई आदमी और ऊंट देखा है। आदमी ने कहा, हमने तो कहीं नहीं देखा। व्यापारियों ने कहा कि हम लोगों ने जब यात्रा शुरू की तो बीस आदमी थे और बीस ऊंट। एक आदमी और एक ऊंट कम हो गया है। व्यक्ति ने उनकी ओर ध्यान दे देखा और मन ही मन सबकी गिनती कर डाली। आदमी और ऊंटों की संख्या बराबर थी। यानी बीस आदमी थे, और बीस ही ऊंट थे। उसने आदेश दिया, मेरे सामने गिनो। उसके आदेश पर एक व्यक्ति ने अपने को छोड़कर सबको गिनना शुरू किया और उन्नीस पर रुक गया। व्यक्ति ने सबको क्रमबद्ध खड़ा कर गिनना शुरू किया, संख्या बीस हो गई। ऊंटों के लिए भी यही प्रक्रिया दोहराई गई। बात व्यापारियों की समझ में आ गई। कहने का मतलब यह कि आदमी खुद को भूल जाता है और दूसरों के विश्लेषण में लग जाता है। दूसरों के विश्लेषण से पहले खुद को पहचान लेना चाहिए।
खुद को न जानना
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