Tuesday, April 7, 2026
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केवल जाट नेता नहीं, सभी मानते थे मसीहा

  • पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह सभी के दिलों में बसते थे, लोगों के दिलों पर था उनका राज

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने के एलान को केवल जाटों के सम्मान के रूप में प्रचारित किए जाने से उनके अनुयायी खासी खिन्न हैं। उनका कहना है कि चौधरी साहब केवल जाटों के नेता नहीं थे, वो समाज के हर उस शख्स के मसीहा था जो दबा कुचला और शोषित था।

इसलिए उन्हें केवल जाटों तक संकुचित नहीं रखा जाए और जहां तक भारत रत्न का प्रश्न है है तो चौधरी साहव का कद उससे काफी ऊंचा है। वो दिलों में बसते थे, लोगों के दिलों पर उनका राज था। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने पर संवाददाता ने कुछ लोगों से बात की। जिसके अंश नीचे दिए हैं।

जेल से शिष्टाचार पर पुस्तक

1940 में कांग्रेस बड़ी ऊहापोह में थी कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ें कि नहीं, छोटे स्तर पर व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत हुई, चौधरी चरण सिंह इसमें भी शामिल हुए। जेल गए, फिर छूटे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में चरण सिंह को फिर मौका मिला। वे अंडरग्राउंड हो गए और एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन तैयार किया। पुलिस का आदेश था कि देखते ही गोली मार दी जाए पर चौधरी चरण सिंह सभा करके हर जगह से निकल जाते थे।

अंत में गिरफ्तार हो गए। इसके बाद डेढ़ साल की सजा हुई, जेल में ही उन्होंने शिष्टाचार किताब लिखी। चौधरी चरण सिंह 1952, 1962 और 1967 की विधानसभा में जीते थे। गोविंद वल्लभ पंत की सरकार में पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी रहे। रेवेन्यू, लॉ, इनफॉर्मेशन, हेल्थ कई मिनिस्ट्री में भी रहे, संपूणार्नंद और चंद्रभानु गुप्ता की सरकार में भी मंत्री रहे। 1967 में चरण सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़कर भारतीय क्रांति दल नाम से अपनी पार्टी बना ली।

राम मनोहर लोहिया का इनके ऊपर हाथ था। उत्तर प्रदेश में पहली बार कांग्रेस हारी और चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह 1967 और 1970 में मुख्यमंत्री बने। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तब देश में माहौल गड़बड़ हो गया था, 1975 में इंदिरा ने विवादास्पद डिसीजन लिया और इमरजेंसी लगा दी। चौधरी चरण सिंह भी जेल में डाल दिए गए। जेल में विरोधी पक्ष लामबंद हो गया और 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए।

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इंदिरा बुरी तरह हारीं और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, चौधरी चरण सिंह इस सरकार में उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री रहे। वित्तमंत्री भी बने। जनता पार्टी को बनाने में उनका ही आधार और किसान शक्ति सबसे अधिक काम आई। जनता पार्टी के नेताओं, जिसमें आज की भाजपा और तबका जनसंघ भी शामिल था।

उसने चौधरी चरण सिंह की पार्टी के चुनाव चिह्न पर ही लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन बड़े आधार के बावजूद चौधरी साहब की जगह मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। चौधरी साहब इस सरकार में केंद्रीय गृह मंत्री बने। 1979 में वित्त मंत्री और उप-प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना कराई और वित्त मंत्री रहते हुए ही खाद और डीजल के दामों को कंट्रोल किया। खेती की मशीनों पर टैक्स कम किया।

इनके अलावा कृषि जिंसों की अन्तर्राज्यीय आवाजाही पर लगी रोक हटा दी, लेकिन इसी वजह से जनता पार्टी में कलह हुई और मोरार जी की सरकार गिर गई। बाद में कांग्रेस के ही सपोर्ट से 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था। इंदिरा ने 19 अगस्त को समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई। संसद का बगैर एक दिन सामना किए चरण सिंह को रिजाइन करना पड़ा था। प्रधानमंत्री रहते हुए चरण सिंह ने ग्रामीण पुनरुत्थान मंत्रालय की स्थापना की।

चौधरी साहब मानते थे गांव में बसता है असली भारत

चौधरी साहब मानते थे कि असली भारत गांवों में रहता है। अगर देश को उठाना है तो पुरुषार्थ करना होगा हम सब को पुरुषार्थ करना होगा मैं भी अपने आपको उसमें शामिल करता हूं मेरे सहयोगी मिनिस्टरों को, सबको शामिल करता हूं। हमको अनवरत परिश्रम करना पड़ेगा तब जाके देश की तरक्की होगी। राष्ट्र तभी संपन्न हो सकता है जब उसके ग्रामीण क्षेत्र का उन्नयन किया गया हो तथा ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति अधिक हो।

जीवन परिचय

  • नाम-चौधरी चरण सिंह
  • जन्मतिथि-23 दिसंबर, 1902
  • मृत्यु-29 मई, 1987 (85 वर्ष)
  • मृत्यु स्थल-दिल्ली भारत
  • पिता का नाम-चौधरी मीर सिंह
  • पत्नी का नाम-गायत्री देवी
  • शिक्षा-विज्ञान स्नातक, कला स्नातकोत्तर और विधि स्नातक।
  • विद्यालय-सरकारी उच्च विद्यालय, विश्वविद्यालय मेरठ।
  • भाषा-हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू।
  • कार्यक्षेत्र-स्वाधीनता संग्राम, राजनीति।
  • राजनीतिक दल-कांग्रेस और लोक दल।
  • उपलब्धियां-विशेष योगदान लेखन, स्वाधीनता संग्राम, भारत के पांचवें प्रधानमंत्री
  • प्रधानमंत्री कार्यकाल-28 जुलाई, 1979-14 जनवरी, 1980

चौधरी साहब का बूढ़पुर परिवार से अत्यधिक घनिष्ठ संबंध

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह का व बूढ़पुर परिवार का अत्यधिक निकट का संबंध रहा है। उनके अनन्य मित्र स्व. पूर्णानंद सरस्वती (पूर्व नाम पूर्ण चंद्र आर्य) बागपत क्षेत्र के ही नहीं पूरे उत्तर भारत के प्रसिद्ध आर्य विद्वान रहे।
चौधरी साहब सेवा मित्रता का सन 1930 से है। डा. वीरोत्तम तोमर ने बताया कि उनके दादाजी व चौधरी साहब आर्य समाज के कई आंदोलन में तथा क्षेत्र में सामाजिक तौर पर कार्य करते रहे तथा चौधरी चरण सिंह को बागपत क्षेत्र में स्थापित करने में बूढ़पुर परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

चौधरी साहब परिवार के प्रत्येक सुख व दुख के पलों पर शामिल होते रहे। उपरोक्त चित्र सन 1960 का है, जब उनके मित्र पूर्ण चंद्र आर्य ने उन्हें बागपत क्षेत्र के बूढ़पुर ग्राम में सम्मानित करने के लिए बुलाया। सन 1971 में 18 जुलाई को स्वामी पूर्णानंद सरस्वती के सन्यास ग्रहण के अवसर पर उनके पुत्र डा. शिवराज सिंह ने एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया। जिसमें चौधरी चरण सिंह मुख्य अतिथि के रूप में पूरे 6 घंटे इसमें विद्यमान रहे तथा सन्यास दीक्षा दे रहे गुरुकुल घरौंडा के स्वामी रामेश्वरानंद ने जब चौधरी चरण सिंह से संन्यास के बारे में पूछा तब उनका यह कथन की मैं अभी संन्यास कैसे लूं, मेरे सपने अभी अधूरे हैं, काफी विख्यात रहा।

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डा. तोमर ने अपना संस्मरण बताते हुए बताया कि स उन्होंने चौधरी चरण सिंह को उनके प्रधानमंत्री बनने की आज बड़ौत केसी फील्ड में प्रथम जनसभा में स्वयं घर से गेंदे की माला बनाकर उनको पहनाई तो उन्होंने उन्हे आशीर्वाद दिया। उनकी अंतिम जनसभा जॉकी उनकी पुत्री स्व. सरोज के छपरौली चुनाव की थी में भी वह चौधरी चरण सिंह के साथ ही रहे। उनकी मृत्यु पर संस्मरण बताते हुए डा. तोमर ने बताया कि किस प्रकार वह 23 दिसंबर को 12 तुगलक रोड से भारी वर्षा के बीच 15 किलोमीटर दूर किसान घाट पर उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुए।

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