Wednesday, March 4, 2026
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चीन पर शतुरमुर्ग जैसी नीति

Samvad 51


jaiprakashदक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स नेताओं की शिखर बैठक में नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की भेंटवार्ता के महज चार दिन बाद ही चीन के आॅफिशियल मैप में अक्साई चीन तथा अरुणाचल प्रदेश को चीनी क्षेत्र के रूप में प्रदर्शित करने से भारतीयों में गहरा रोष व्याप्त है। चीन का यह आचरण अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं दूसरे देश की संप्रभुता की अवहेलना करता है। लेकिन चीन की विदेश नीति मूलत: उसकी घरेलू नीति का ही विस्तार है जो ‘राजनीतिक शक्ति बंदूक की नली से निकलने’ की संकल्पना पर आधारित है। माओ का तथाकथित पांच उंगलियों का सिद्धांत वर्तमान चीनी साम्राज्यवाद के विस्तार की प्रस्तावना है।

माओ कहते थे कि तिब्बत चीन के दाहिने हाथ की हथेली है और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान एवं अरुणाचल इसकी पांच उंगलियां है। इन हिमालयी क्षेत्र को मुक्त कराना चीन का कर्तव्य है। शी जिनपिंग की समूची कसरत माओ के सपने को साकार करने की है। दुनिया की दूसरी आर्थिक, सैनिक ताकत बन चुका चीन एशिया में अपने वर्चस्व के बरअक्स भारत को एक प्रतिरोध की दीवार के रूप में देखता है।

भारत महान एशियाई वृत्त चाप की केंद्र में स्थिति के कारण भू सामरिक एव व्यापारिक दृष्टि से विशिष्ट है। इसकी प्रायद्वीपीय तट रेखा हिंद महासागर में दखल का पृष्ठाधार निर्मित करती है। पूर्वी एशिया व्यापारिक जल मार्ग का प्रवेश द्वारा मल्लका स्ट्रेट भारतीय नौसेना के मुख्यालय की अत्यंत निकट स्थित है। चीन के विदेश व्यापार का 60 प्रतिशत माल परिवहन मल्लका स्ट्रेट से होकर गुजरता है। हिंद महासागर में भारत के वर्चस्व सीमित करने के लिए चीन ‘स्ट्रिंग आफ पर्ल’ नीति पर अग्रसर है।

इस मोतियों की श्रृंखला वाली नीति के तहत ड्रैगन म्यांमार के कोको द्वीप, बांग्लादेश के चटगांव, श्रीलंका के हंबनटोटा, पाकिस्तान के ग्वागर, मालदीव तथा जिबूती में अपने सैन्य अड्डे का निर्माण कर रहा है। चीन अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड के तहत भूमिबद्ध मध्य एशिया एवं पूर्वी यूरोप को सड़क मार्ग तथा रेल रूट से जोड़ने का काम कर रहा है, जिसे वह न्यू सिल्क का रूट भी कहता है।

चीन पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर (सीपेक)भी इसी परियोजना का एक हिस्सा है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गुजरने के कारण सीपेक भारतीय प्रतिरक्षा के लिए एक चुनौती है। नेहरू युग में भारत की रक्षा-विदेश नीति अंतरराष्ट्रीय न्याय के सिद्धांतों पर आधारित थी। लेकिन समकालीन चीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं एवं पड़ोसी देशों की संप्रभुता के प्रति अवहेलनापूर्ण आचरण किया।

चीन के सैन्यवाद एवं छल का पहला शिकार तिब्बत (1950) हुआ। चीन की चालों से अनभिज्ञ भारत ने 1954 के पंचशील समझौते में तिब्बत की गुलामी पर मुहर लगा दी। जाहिर है ब्रिटिश दौर में 1912 से 1950 तक तिब्बत के आजाद देश की हैसियत में था। गुटनिरपेक्ष देशों के अगुआ के रूप में नेहरू की बढ़ती प्रतिष्ठा से कुंठित चीन ने 1962 में अचानक हमला कर भारत को परास्त कर दिया।

हमलावर ड्रैगन ने अक्साई चीन 38000 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जा भी कर लिया। 1965 के भारत-पाक युद्ध में चीन के शत्रुतापूर्ण आचरण से क्षुब्ध होकर लाल बहादुर शास्त्री ने दलाई लामा के नेतृत्व में भारत में निर्वासित तिब्बत सरकार को मान्यता देने की सार्वजनिक घोषणा की। यह भारतीय विदेश नीति में एक निर्णायक मोड़ था, जिसने इंदिरा युग(1966-84) की पृष्ठभूमि निर्मित की। आयरन लेडी-इंदिरा का दौर ‘रक्त और लौह नीति’ पर आधारित था।

उन्होंने एक ओर चीन से राजनयिक एवं व्यापारिक संबंध विच्छेद कर लिया। दूसरी ओर भारत में हरित क्रांति पूर्ण कर खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल की। बैंकों और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण आदि से औद्योगीकरण की प्रक्रिया तीव्र की। तलवार के बल पर आयरन लेडी ने 1971 में पाकिस्तान को शिकस्त देकर बांग्लादेश को आजाद कराया।

1974 में परमाणु परीक्षण कर इंदिरा गांधी ने सैन्य संतुलन चीन के बरअक्स भारत के पक्ष में कर दिया। 1967 में सिक्किम के पास नाथुला दर्रा से चीनी सैनिकों को खदेड़ कर इंदिरा ने अपने तेवर पहले ही दिखा दिए थे। आयरन लेडी ने एक सैन्य अभियान कर सिक्किम का विलय (1975) कर लिया। सिक्किम का विलय मूलत: पांच उंगलियों के सिद्धांत मे वर्णित मध्यमा उंगली को काट लेना था।

आर्किटेक्ट आॅफ मॉडर्न चीन डेंग श्याओ पिंग ने ‘सोशलिज्म विद मार्केट इकोनामी’ के नारे के साथ चीन के आर्थिक विकास पर बल दिया। भारत की सीमा विवाद के संदर्भ में डेंग श्याओ पिंग का मानना था कि यह इतिहास की देन है। इसे हमें भविष्य की पीढ़ी के लिए छोड़ देना चाहिए और व्यापारिक एवं राजनयिक रिश्ते मजबूत करने चाहिए।

1988 की राजीव गांधी की बीजिंग यात्रा के बाद भारत चीन संबंध कमोबेश इसी सिद्धांत पर आगे बढ़ रहा है। दरअसल, सरहद पर चीन क्रीपिंग पॉलिसी (रेंगते हुए आगे बढ़ने की नीति) अपनाता है। पहले दो कदम घुसपैठ करना फिर भारतीय प्रतिरोध होने पर एक कदम वापस आकर वही स्थाई रूप से कैंप बना लेने की नीति से चीन ने अरुणाचल और लद्दाख में हमारी सैकड़ों किलोमीटर जमीन छीन ली है।

चीन के संदर्भ में मोदी सरकार रेत में सिर देने वाले शुतुरमुर्गी रक्षा-विदेश नीति पर चल रही है। गलवान घाटी में हिंसक सैन्य झड़प के बावजूद चीन ने पैंगोंग सो लेक पर भारत के पेट्रोलियम प्वाइंट को अवरुद्ध कर रखा है। लद्दाख के चारागाह भूमि पर उसने कब्जा किया है। अरुणाचल में गांव बसा लिया है।

पिछले 5 वर्षों में ही अरुणाचल के 32 जगह के नाम बदल दिए हैं। फिर भी हमारे प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि ‘न कोई आया है न आएगा’ तो अनजाने में चीन के विस्तारवाद को सर्टिफिकेट दे देते हैं! वहीं विदेश मंत्री जयशंकर राष्ट्रीय हितों का अनायास आत्मसमर्पण करते हुए जब यह कहते हैं कि चीन हमसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसलिए उससे लड़ा नहीं जा सकता तो निश्चित रूप से और जनता का मनोबल कमजोर होता है। गलवान घटना के बाद चीन से व्यापार 60 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रहा है। अब हमारा व्यापार घाटा चीन के साथ सौ अरब डॉलर पार कर गया है।

हमारे पास चीन से बड़ा कृषि क्षेत्र है। यदि सरकार कुछ औद्योगिक समूहों के हितवर्धन के बजाय कृषि और लघु कुटीर उद्योग के संरक्षण पर इंदिरा जैसे कड़े फैसले ले पाती तो हमारी फसलों की पैदावार एवं कुटीर उद्योगों के उत्पादों की लागत एवं गुणवत्ता चीन के समक्ष पहुंच जाती। तिब्बत चीन की दुखती रग है। लाल बहादुर शास्त्री की तर्ज पर हमें उसे आजाद देश की मान्यता देकर ड्रैगन पर राजनयिक दबाव पैदा करना चाहिए।

भारत को भी अपने आॅफिशियल मानचित्र में तिब्बत को स्वतंत्र देश की तरह दर्शाना चाहिए। तानाशाह चीन नेतृत्व शिखर वार्ताओं या संधिपत्रों की पवित्र भावनाओं पर अमल करने वाला नहीं है। उसे रक्त और लौह नीति की भाषा ही समझ में आती है। इसलिए हमारे देश की सामान्य जनता और सशस्त्र बल एक बार फिर चीन के बरअक्स दूसरी इंदिरा की प्रतीक्षा में हैं।


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