Tuesday, March 3, 2026
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दल बदलना नेताओं का प्रिय शगल

जैसे बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होता है वैसे ही व्यक्ति का बुढ़ापा भी धीरे-धीरे स्वस्थ शरीर में घुसपैठ मचाने लगता है। पहले घुटने दांत आंख एक-एक करके अपना रंग दिखाने लगते हैं। वैसे ही राजनीति में भी कोई नेता एक दल से दूसरे दल में जाने का मन बनता है तो, पहले क्या कुछ करना है इसका चिंतन मन ही मन करने लगता है। फिर समय आने पर अनुकूल वातावरण में अपनी पार्टी की खामियां उजागर करता हुआ नई पार्टी का दुपट्टा पहन लेता है। जब कोई कद्दावर नेता अपनी ही पार्टी को अपने अंतर्मन की आवाज से सीख देने लगता है तो आलाकमान चिंतित होने लगता है। पर वह भी एकदम ऐसी वैसी अनुशासन की कार्रवाई करने से पहले उसकी गुडविल व लोकप्रियता को देख चुप्पी साध लेता है।

इसके चलते दल बदलने का सोच रखने वाले निडर होकर नेता विपक्षी पार्टी की संगठनात्मक रीति-नीति की प्रशंसा करने लगता है। यदि फिर उसे अपने ऊपर होने वाले संभावित अनुशासन की भनक लगने लगती है और ऐसे में उसे लगता है कि कोई बात तो है। और जब तब मीडिया में चर्चे होने लगते हैं। दोनों पार्टियों में झील में पत्थर की तरह लहरें उठने लगती हैं। लेकिन जब पार्टी में अनुशासन का सबक सिखाने के लिए उन्हें किनारे लगाने को सोच बनने लगता है, तो वह अपनी अनुभवी निगाह से स्थिति को पहचान उस पर गहराई से चिंतन करने लगता हैं। यदि उसे पार्टी में ही रहना हो तो वह पार्टी के समर्थन में स्टेटमेंट देगा कि पार्टी ने मुझे बहुत कुछ दिया है। मीडिया मेरे वक्तव्य को गलत ढंग से ले रहा है। जनता में फिर विश्वास बनाए रखने की बात करने लगता हैं। लेकिन इससे उलट यदि उसे नई पार्टी में जाने के लिए अनुकूल स्थिति दिखती है तो वह पलटी मार कर नहीं, पार्टी का दुपट्टा ग्रहण कर लेता है और फिर अपनी मूल पार्टी की खामियां गिनाने लगता है। कहने लगेगा पार्टी में अनुशासन के नाम पर दम घुट रहा था। जो मान सम्मान पिछली पार्टी में नहीं मिला, वह नए दल में तलाशने लगता है।

दल बदल कर आया नेता नई पार्टी में सहज ही अच्छा स्थान बना लेता है और जल्द ही पार्टी की रीति नीति के अनुसार अपने को ढाल लेता है। वह जनता को प्रभावित करने वाली अपनी भाषण कला के चलते पार्टी के अंदर भी सम्मानजनक स्थान पा लेता है। वैसे तो दल बदल की परंपरा मुख्यत: चुनावों के समय होती है, क्योंकि यही वह अवसर होता है, जब पार्टी बदलने वाले नेता को भी पार्टी का टिकट मिलने की संभावना बनी रहती है। कई पार्टी अपने बंद दरवाजे भी खुले रखती हैं, ताकि दूसरी पार्टी के जन आधार वाले नेता आकर पार्टी के लिए उपयोगी साबित हों और एक अच्छा संबल दे सकें। आजकल प्राय: वही नेता सहज दल बदलते हैं, जिनकी अपनी कोई नीति सिद्धांत न हो। जहां जाए, वहां वैसा ही रंग रूप धारण कर लेते हैं। दल बदलने का मुख्य आधार उनका अपना सुखद राजनीतिक भविष्य होता है। अपने हित को सर्वोपरि मानकर पार्टी में अपना प्रिय स्थान बनाए रखते हैं। फिर भी ऐसे नेताओं का कोई भरोसा नहीं कि वह फिर से कब घर वापसी कर लें।

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