
कृष्ण कल्पित एक ऐसा कवि है, जिनके पास साहस है (दुस्साहस की हद तक), असहमतियां हैं, सत्ता को ठेंगा दिखाने का बल है, जो पॉलिटिकली करेक्ट हो या न हो पोएटिकली करेक्ट होता है, जो किसी भी तरह के विवादों से गुरेज नहीं करता, जिसकी कविता नैतिकता को कठघरे में खड़ा करती है, जिसके पास इतिहास, संस्कृति और साहित्य का अपार ज्ञान है, जो स्वयं को विलुप्त परंपरा का कवि मानता है, जिसके पास भाषा का आडंबर नहीं है, जिसकी कविता की उपमाएं सहज और सरल हैं, जिसकी लगभग हर कविता दर्शन की बात करती है, जो प्रयोग करने से नहीं चूकता। कृष्ण कल्पित का पहला कविता संग्रह 1980 में आया था। यानी उनका सृजन चार दशकों से अधिक में फैला है। जो अपनी प्रस्तावना में बेखौफ लिखते हैं, यदि देश के सभी कविता संग्रहों में, आग लगा दी जाए, तो दो चार साल तक आग न बुझे! इसके बाद 1990 में ‘बढ़ई का बेटा’ कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। कविताएं वह लिखते रहे और निरंतर छपती भी रहीं।
लेकिन अब तीस साल बाद उनका कविता संग्रह आया है-रेख़्ता के बीज और अन्य कविताएं (राजकमल पेपरबैक्स)। यह संग्रह पढ़ते हुए बार-बार जावेद अख्तर की एक लाइन याद आती रही-जो बात कहते डरते हैं सब तू वो बात लिख। हालांकि कृष्ण कल्पित वो बात कहते हुए भी नहीं डरते और लिखते हुए तो बिल्कुल ही नहीं डरते। उनका साफतौर पर मानना है कि कवि को मानवीय आधार पर सही होना चाहिए। शायद यही वजह है कि उनकी बहुत-सी कविताएं पढ़कर लगता है कि यह आपके ही मन की बात है। इस बात को महसूस सब करते हैं लेकिन लिखता कोई नहीं, इसलिए नहीं लिखता कि कोई ‘नाराज’ न हो जाए, आपके खिलाफ न हो जाए, कहीं आपको मिलने वाला कोई ‘पुरस्कार’ न छिन जाए। कृष्ण कल्पित वह सब लिखते हैं, जिसे लिखने से सब डरते हैं।
इसलिए कृष्ण कल्पित महत्वपूर्ण कवि हैं। जाहिर है इसीलिए वह विवादास्पद भी हैं। संग्रह की पहली ही कविता में वह कविता के वर्तमान परिदृश्य पर बात करते हैं। कविता का शीर्षक है-एकल कविता पाठ: हार्डबाउंड पेपरबैक/क्राउन डिमाई पॉकेट-साइज/लगभग सभी तरह के संस्करण थे/यहां तक कि प्रेम के संस्करण अलग थे/घृणा के अलग…कलात्मक थे निमंत्रण पत्र/जिसमें शाम की शराब और डिनर का/छिपा हुआ संकेत था/सब कुछ था वहां पर सब कुछ/सिर्फ कविता को छोड़कर! (पृष्ठ 11-12)
जाहिर है इस कविता को पढ़कर आपके मन में बहुत कुछ तैरने लगा होगा। कृष्ण कल्पित ‘शब्दों के पिटारे’ में शब्द निकालकर कविता नहीं लिखते बल्कि उनकी कविताओं में बदल रही, बदल चुकी दुनिया दिखाई देती है, पूरे परिवेश के साथ। जमुना पार, चिराग दिल्ली, कोलकाता 1999, चिराग दिल्ली, रेगिस्तान और कई अन्य ऐसी ही कविताएं हैं। इन कविताओं में भी आपको सिर्फ परिवेश नहीं, बदलाव का पूरा दर्शन दिखाई देगा। उनकी कविताओं में वंचितों और हाशिये पर रह रहे लोग भी मौजूद हैं। आखिरी चुंबन कविता (पृष्ठ 28-29) में वह लिखते हैं-एक बढ़ई एक मेज बना रहा है/इससे बेहतर क्या है दुनिया में/एक कुम्हार चाक पर घड़े रच रहा है/इससे सुन्दर कुछ नहीं है शायद/एक बच्चा नींद में हंस रहा है/इससे पवित्र क्या हो सकता है।
प्रेम कृष्ण कल्पित की कविताओं में ठोस रूप-बाजारू रूप में नहीं आता बल्कि वायवीय ढंग से आता है। यही उनकी प्रेम कविताओं की खूबूसरती है। मेरी ‘प्रेम कथाएं’ कविता में (पृष्ठ 98-99) वह राजपूत प्रेमिका, ब्राह्मण प्रेमिका, दलित प्रेमिका, बनिया प्रेमिका, सुनारन प्रेमिका, बंगाली प्रेमिका, कायस्थ प्रेमिका और कई अन्य प्रेमिकाओं का जिक्र करते हैं। लेकिन यह कविता कहती है कि प्रेम ही समाज में समता और समानता ला सकता है। अकेला नहीं सोया (पृष्ठ 74-75) में वह लिखते हैं-स्त्रियों के साथ कम, अधिकतर मैं अपनी बर्बादियों के साथ सोया, कविता की अंतिम पंक्तियां हैं-जब भी सोया, किसी के साथ सोया, मैं अकेला कभी नहीं सोया, एक अदृश्य चादर मुझ पर हमेश तनी रही! दरअसल यह अदृश्य चादर कभी वंचितों के दुख-दर्द को ढंकने की चादर बन जाती है, कभी प्रेम की चादर, कभी समाज में हो रहे बदलावों की चादर और कभी राजनीति की चादर।
कृष्ण कल्पित का यह भी मानना है कि कविता राजनीति की दासी नहीं है। राजनीति कविता को नहीं जांच सकती, कविता ही राजनीति को जांच सकती है। 2004 में लिखी उनकी कविता ‘आपातकाल’ (पृष्ठ 49) में वह यही जांच करते दिखाई देते हैं।
तीस साल पहले
आपातकाल का विरोध करने वालों के हाथ
आज खून से रंगे हुए हैं
दूसरे हुए घोटालों में लिप्त
सत्ता के भूखे कम्बख़्त
जेपी लोकतंत्र की आँख से
ढलका हुआ आंसू था जो अब सूख चला है
‘कि जनता आती है’ वाले
विशाल गांधी मैदान में अब
बाजीगार और रंडियां घूमती हैं
दरअसल
सम्पूर्ण क्रान्ति अब एक रेल गाड़ी का नाम है!
2014 के बाद लिखी कृष्ण कल्पित की अनेक कविताओं में आप राजनीति के नये मुहावरे देख सकते हैं। हालांकि वह यहां भी मनुष्यता का ही बचाव करते दिखाई पड़ते हैं। 2014 से 2020 तक लिखी कविताएं इस संग्रह में हैं। इनमें आपको अच्छे दिन दिखाई देंगे, नया भारत दिखाई देगा…और भी बहुत कुछ है इस कालखंड में लिखी गई कविताओं में । कुछ लंबी कविताएं भी हैं। शीर्षक कविता ‘रेख़्ता के बीज’ (पृष्ठ 56-60) सवा पांच पेज की कविता है। यह कविता एक ही अधूरा वाक्य के रूप में है। शीर्षक के नीचे लिखा है-उर्दू हिन्दी शब्दकोश पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य। उर्दू हिंदी शब्दकोश पर लिखा गया यह एक लंबा आख्यान है, जो प्रार्थना की शक्ल में पाठक के सामने आता है।
इस लंबे अधूरे वाक्य की अंतिम पंक्तियां इस प्रकार हैं-इस शब्दकोश से हम बूढ़े नाविक की तरह एक प्रार्थना बना सकते हैं, एक जीर्णशीर्ण शब्दकोश इससे अधिक क्या कर सकता है कि वह मुसीबत के दिनों में मनुष्यता के लिए एक प्रार्थना बन जाए, भले ही वह अनसुनी रहती आई हो! यह कविता सभ्यता और इतिहास की करई परतें खोलती ती है। इसे उत्तर आधुनिकता की एक एक अहम रचना माना जाना चाहिए। और भी कई लम्बी कविताएँ इस संग्रह में हैं।
‘रेख़्ता के बीज और अन्य कविताएं’ संग्रह को पढ़ना दुनिया को देखने और समझने की नजर को पहचानना है। यह पूरा संग्रह मनुष्यता की पैरवी करता दिखाई देता है।
सुधांशु गुप्त


