
इसमें कोई दो मत नहीं कि इस समय आम आदमी अपने और अपने परिवार के जीविकोपार्जन के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। लगातार बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के चलते पहले ही से उसका बजट बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। फिर भी वह जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहा है। इसके चलते उसे देश की जीडीपी की गहराई में उतरने की न तो कोई समझ है और न ही उसके लिए यह जरूरी है। उसे तो केवल और केवल अपने और अपने आश्रितों के पालन-पोषण और शिक्षा एवं स्वास्थ्य के मामले में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की ही चिंता है। निश्चित रूप से जब आम आदमी पर इतनी जिम्मेदारियों का बोझा हो, उसका अन्य किसी विषय को लेकर उलझने का सामर्थ्य ही नहीं है।
लेकिन देश-प्रदेश में हो यह रहा है कि व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका के साथ-साथ अब न्यायपालिका भी अपने आचरण और व्यवहार को लेकर जन चर्चा का विषय बन रही है। हमारे यहां लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के अंतर्गत जनकल्याण के निमित्त व्यवस्थापिका अपनी रीति-नीति सुनिश्चित करती है। कार्यपालिका की जिम्मेदारी कानून और व्यवस्था के साथ-साथ शासन के नीति-नियमों का क्रियान्वयन करते हुए व्यापक जनहित में समर्पित भूमिका का निर्वहन करना है। इसके अतिरिक्त देश-प्रदेश में विधि का शासन विधि के अनुरूप माना जाता है। न्यायपालिका की सर्वोच्चता संविधान सम्मत है। हर एक व्यक्ति एवं वर्ग के लिए जब ” न्याय ” अपेक्षित हो, वह न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकता है। अब यह अलग बात है कि विलंबित न्याय भी अन्याय का ही प्रतिरूप होता है। यही नहीं अपितु यह आम आदमी के लिए सस्ता सौदा तो कतई नहीं है। लेकिन फिर भी यह सबके लिए एक सहारा है। जिस पर आम आदमी आंख मूंदकर आज भी पक्का विश्वास रखता है।
जहां तक व्यवस्थापिका की बात है, तो राजनीति के नजारें तो किसी से भी छुपे हुए नहीं हैं। और कार्यपालिका का तो कहना ही क्या? हर कोई जानता है कि अधिकांश अवसरों पर बिना ‘वजन’ के कोई बात या कोई मुद्दा अधिक वजन नहीं रखता। काफी हद तक आम आदमी में यह मानसिकता घर कर गई है कि आजकल के दौर में भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार का पर्याय बन गया है। इसलिए उसको समय के साथ चलना होगा।
इन तमाम परिस्थितियों के बीच आम आदमी जब प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से माध्यम से देश-प्रदेश के तमाम तरह के नकारात्मक समाचारों को पढ़ता या सुनता है। सच कहूं, सिंहृर कर रह जाता है। मन ही मन इतना आंदोलित हो जाता है कि इसका सीधा असर उसकी शारीरिक और मानसिक श्रम शक्ति पर प्रतिकूल दबाव डालता है। एक तो आम आदमी अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के बोझ से पहले ही दबा हुआ है और विसंगतियों का प्रतिकार करने का उसका सामर्थ्य नहीं है। न ही समय है और न ही समझ। ऐसी स्थिति में कुलबुला कर रह जाना ही उसकी नियति है। अब कहने को तो आम आदमी को ‘मुल्क के मालिक’ के रूप में विभूषित किया जाता है। लेकिन मतदान के बाद वह कटे हाथ का हो जाता है। वैसे उसकी आवाज अलग-अलग मंच पर बुलंद करने वाले नीचे से ऊपर तक निर्वाचित जनप्रतिनिधि होते हैं।
लेकिन उनका निर्वाचन भी तब ही संभव हुआ होगा जब कि तगड़ा निवेश हुआ होगा। ऐसे में लागत के साथ-साथ ब्याज और मुनाफा भी जोड़ना उनके लिए शायद जरूरी है। हालांकि इस मामले में अपवाद भी मिलते हैं, लेकिन अपवाद सिर्फ अपवाद होते हैं, सामान्य नियम नहीं होते। मजे की बात यह है कि कोई भी शख्सियत उक्त तथ्य से अनजान नहीं है। लेकिन सबके सब नीति और सिद्धांत का मुलम्मा लगाएं विचरण कर रहे हैं। यदि कहीं कोई इन तमाम विसंगतियों के विरुद्ध आंदोलन होता भी है तो भी इसका सीधा-सीधा राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है।
बीते दौर में आम आदमी को देश और दुनिया की ज्यादा खबर नहीं थी। उस दौर के राजनेता भी सेवा और समर्पण के भाव से अपनी राजनीति को अंजाम देते रहे थे। बिना व्यापार व्यवसाय के भी राजनेता आर्थिक प्रगति में कीर्तिमान स्थापित करने लग गए हैं।
आम आदमी देख रहा है कि कौन राजनेता कल तक क्या थे? और देखते ही देखते अब क्या से क्या हो गए है! प्रशासन तंत्र के पुरजों की स्वाभाविक आय और कुल मिलाकर जमा संपत्ति के अनुपात में भारी अंतर आखिर क्या सिद्ध करता है? न्यायिक व्यवस्था पर आम आदमी का भरपूर विश्वास था, लेकिन हाल ही के ताजा घटनाक्रम के चलते तो उसका मन और भी व्यथित होने लगा है। जहां तक लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बात है, तो उसमें भी इस राह पर चलने पर ‘ऐसा’ करार दिया जाता है और उस राह पर चलने पर ‘वैसा’ करार दिया जाता है। ऐसे में आम आदमी के सामने अपने आप को परिस्थितियों के हवाले करने के अलावा कोई चारा शेष नहीं रहता।

