
जब प्रीबोर्ड परीक्षाओं की तैयारी का प्रश्न उठता है तो स्टूडेंट्स प्राय: एक बहुत बड़ी गलती करते हैं। वे सभी विषयों को समान रूप से ट्रीट करते हैं और सच पूछिए तो इससे बड़ी और कोई गलती नहीं हो सकती है। सभी विषयों के कंटेन्ट और उनका डिफिकल्टी लेवल बिल्कुल एक समान नहीं होता है। किसी स्टूडेंट के लिए गणित आसान हो सकता है तो किसी के लिए इंग्लिश। कोई विद्यार्थी साइंस में माहिर होता है तो कोई ईकनोमिक्स में। किसी को अकाउन्टेन्सी अच्छी लग सकती है तो किसी को हिंदी से परेशानी हो सकती है। ऐसी स्थिति में सभी विषयों की समान रणनीति से तैयारी करने से समस्या कभी भी सॉल्व नहीं हो पाती है। इसलिए स्टूडेंट्स के लिए यह जरूरी है कि वे अपने सभी सबजेक्ट्स को अपनी स्ट्रेंगथ और वीकनेस के आधार पर आसान और डिफकल्ट विषयों में कैटगराइज कर लें। फिर जो कठिन विषय हैं उनकी अच्छी तैयारी के लिए अधिक समय और संसाधन दिया जा सकता है।
दिसम्बर महीने के आने के साथ ही बोर्ड कक्षाओं की परीक्षाओं की सरगर्मियां तेज हो जाती हैं। दसवीं और बारहवीं कक्षाओं के स्टूडेंट्स की प्रीबोर्ड परीक्षाएं इसी महीने के फर्स्ट या सेकंड वीक में शुरू होनेवाली होती हैं। वैसे तो स्टूडेंट लाइफ में सभी परीक्षाओं का साइकॉलजिकाल प्रेशर तो होता ही है लेकिन प्रीबोर्ड की परीक्षाओं का स्ट्रेस थोड़ा अधिक ही होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि ये परीक्षाएं आनेवाले फाइनल या बोर्ड परीक्षाओं के लिये ड्रेस रिहर्सल के रूप में देखा जाता है। विषय शिक्षकों के अनुभव और पूर्व के बोर्ड कक्षाओं के रिजल्ट्स की बात करें तो एक अहम निष्कर्ष जो सामने आता है वह यह है कि प्रीबोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट्स से प्राय: दस प्रतिशत अधिक और कम ही बोर्ड परीक्षों के परिणाम होते हैं। इस लिहाज से प्रीबोर्ड परीक्षाओं में अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत अपने आप स्पष्ट हो जाती है।
लेकिन इस सत्य से इनकार करना आसान नहीं होगा कि प्रीबोर्ड परीक्षाओं को स्टूडेंट्स बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं। यही कारण है कि बोर्ड परीक्षाओं के लिए उनकी तैयारी मुकम्मल नहीं हो पाती हैं और वे इन परीक्षाओं में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाते हैं। ऐसा नहीं है कि इन परीक्षाओं के परिणाम के प्रभाव सीमित रहते हैं। हकीकत तो यह है कि प्रीबोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट्स फाइनल इग्जैमिनैशन की तैयारी को काफी अधिक प्रभावित करते हैं। प्रीबोर्ड परीक्षाओं में अच्छा नहीं करने की वजह से स्टूडेंट्स का कॉन्फिडन्स कम हो जाता है और फिर फाइनल परीक्षाओं की तैयारी की स्पीड भी अपनी रफ्तार नहीं पकड़ पाती है। यदि प्रीबोर्ड परीक्षाएं इतनी अहम होती हैं और इसके रिजल्ट्स आगे आनेवाली परीक्षाओं के लिए कैटलिस्ट का कार्य करते हैं तो प्रश्न यह उठता है कि आखिर प्रीबोर्ड परीक्षाओं की तैयारी की रणनीति कैसी हो ताकि हम इन परीक्षाओं में उत्कृष्ट परिणाम हासिल कर पाएं और आगामी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आवश्यक सेल्फ कॉन्फिडन्स को मैन्टैन रख पाएं।
हल्के में लेने की गलती नहीं करें
प्रीबोर्ड परीक्षाओं के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि स्टूडेंट्स इस परीक्षा को गंभीरता से नहीं लेते हैं। उनको यह लगता है कि ये परीक्षाएं अन्य परीक्षाओं की तरह ही सामान्य और आसान है। चूंकि इस परीक्षा के परिणाम प्रत्यक्ष रूप से बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी और उनके रिजल्ट्स को काफी प्रभावित करते हैं, इसलिए स्टूडेंट्स के लिए यह आवश्यक है कि वे इसे कभी भी हल्के में लेने की कोशिश नहीं करें।
सभी विषयों के सिलेबस को अच्छी तरह से समझें, रटें नहीं
प्रीबोर्ड परीक्षाओं में अच्छा करने के लिए सभी विषयों की तैयारी उनके लिए निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार करना जरूरी है। प्रीबोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए विषय के अनुसार कंटेन्ट को समझना जरूरी है। उसे रट कर याद करना अच्छी रणनीति नहीं मानी जाती है। क्योंकि रटी हुई चीजें दिमाग में स्थायी रूप से टिक कर नहीं रह पाती हैं।
किसी विषय की उत्कृष्ट तैयारी के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना जरूरी होता है-
* सबसे पहले पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित सभी चैप्टर के लिए अलॉटेड मार्क्स की जानकारी जरूरी है।
* प्रत्येक चैप्टर में प्रश्नों के प्रकार अर्थात लॉंग आंसर टाइप, शॉर्ट आंसर टाइप, न्यूमेरिकल और मल्टिपल चॉइस के प्रश्नों और उनकी संख्या को भी अच्छी तरह से जानिए। इसके साथ ही सभी प्रकार के प्रश्नों के लिए निर्धारित मार्क्स को जानने से भी किसी सब्जेक्ट को अच्छी तरीके से तैयार करने में काफी सहायता प्राप्त होती है।
* इसके अतिरिक्त प्रत्येक सब्जेक्ट में ऐसे कुछ चैप्टर होते हैं जिससे डाइग्राम, डाटा अनालीसिस, डेरिवैशन और ग्राफ के प्रश्न पूछे जाते हैं। इन सभी चैप्टर के बारे में अच्छी तरह से जान लेने से उन विषयों की तैयारी अच्छी हो जाती है।
खुद से बनाए गए नोट्स से पढ़ना होता है अधिक लाभदायक
किसी सब्जेक्ट का नोट उस सब्जेक्ट की परीक्षा में पेरफॉर्मेन्स को काफी अधिक प्रभावित करता है। विद्यार्थियों के द्वारा तैयार किए गए नोट्स से बढ़कर विश्वसनीय दूसरा और कोई रेफ्रन्स बुक और गाइड नहीं हो सकता है। यह नोट उस विषय के रेडी रेकनर के रूप में कार्य करता है। इसीलिए किसी विषय की तैयारी के लिए उस विषय के बनाए गए नोट्स का गंभीरता से स्टडी अनिवार्य है।
नोट को पढ़ते समय प्रत्येक चैप्टर में निम्न महत्वपूर्ण बिंदुओं को ध्यान में रखना जरूरी होता है-
* कॉन्सेप्टस की परिभाषा, थ्योरी और नियम
* महत्वपूर्ण जानकारियों को हाइलाइट कर देने से कंटेन्ट को जल्दी से ढूँढ़ने और समझने में मदद मिलती है।
* सभी फॉमूर्ले को अच्छी तरह से नोट बुक में लिख लें। संभव हो तो उन सूत्रों के डेरिवैशन को भी स्टेपवाइज नोट कर लें।
* किसी विषय के प्रत्येक चैप्टर में प्रयुक्त डाइग्राम को भी उनके विभिन्न भागों के नाम के साथ तैयारी कर लेना अच्छा माना जाता है।
* महत्वपूर्ण सूचनायें जो फैक्टस और फिगर्स, वर्ष, मात्रा, पुस्तकों, देशों और व्यक्तित्व के नाम इत्यादि के रूप में हो सकते हैं और जो मल्टिपल चॉइस क्वेस्चनस के रूप में पूछे जा सकते हैं, की भी अच्छी तरह से नोट बुक से पढ़कर तैयारी कर लें।
* किसी विशेष चैप्टर से पूछे जानेवाले न्यूमेरिकल प्रश्नों को सॉल्व करने के लिए विभिन्न स्टेप्स और प्रसीजर्स को भी स्पष्ट रूप से नोट बुक में लिख लेने से और उन्हें अच्छी तरह से दुहराते रहने से प्रीबोर्ड परीक्षा मंं अच्छा किया जा सकता है।
रीविजन के महत्व को नहीं कर सकते हैं नजरअंदाज
पढ़े गए चैप्टर्स और उससे संबंधित तैयार नोट्स के कंटेन्ट को आत्मसात करना प्रीबोर्ड परीक्षाओं में अहम कार्य माना जाता है। किसी भी कंटेन्ट को आत्मसात करने के लिए उसे नियमित अंतराल पर दुहराना ही रीविजन कहलाता है। इसलिए जब आप प्रीबोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं तो किसी पर्टिकुलर सब्जेक्ट के बनाए गए नोट बुक को योजनाबद्ध तरीके से दुहराते रहना चाहिए। इसके बिना नोट बुक चाहे कितनी ही मिहनत से और कितनी ही अच्छी क्वालिटी की क्यों न बनायी जाए वे परीक्षा में अच्छे और मनचाहा मार्क्स दिलाने में कभी भी मदद नहीं कर पाते हैं।
योजना के बिना कार्य की पूर्णता संभव नहीं
जीवन के किसी भी क्षेत्र में कामयाबी के लिए योजना बनाने की जरूरत को हम झुठला नहीं सकते हैं। तभी ऐसा कहा जाता है कि यदि आप किसी मुकाम तक पहुँचने के लिए योजना बनाने में असफल रहते हैं तो आप असफल होने की योजना बना रहे होते हैं। सबजेक्ट्स के डिफिकल्टी लेवल से लेकर उपलब्ध समय को योजना बनाने के समय अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। हमेशा ध्यान रखें कि योजना वास्तविक और व्यावहारिक हो। क्योंकि फांतासी की योजना कभी भी सफल नहीं होती है।
प्रैक्टिस और मॉक टेस्ट ही आपको बना सकते हैं परफेक्ट
किसी भी विधा में परफेक्ट होने के लिए प्रैक्टिस के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। परीक्षा की तैयारी में परफेक्शन के लिए तो अभ्यास का महत्व और भी बढ़ जाता है। डिफिकल्ट विषय के कंटेन्ट का नियमित रूप से अभ्यास करने से उसमें पूर्णता हासिल होती है और फिर इस प्रकार वह विषय डिफिकल्ट नहीं रह जाता है। इसलिए जो टॉपिक या चैप्टर कठिन प्रतीत हो उसके लिए निरंतर प्रैक्टिस करना जरूरी होता है।
इतना ही नहीं परीक्षाओं की तैयारी को पूर्ण करने में मॉक टेस्ट की अहमियत कम नहीं होती है। मॉक टेस्ट को सच्चे दिल से स्कूल में इनविजिलेटर्स की उपस्थिति में दिए गए परीक्षाओं जैसे ही पवित्र मानकर ईमानदारी से देना चाहिए। फिर टेस्ट के बाद खुद की कमी का पूरी सच्चाई से आकलन करना चाहिए। एक बार अपनी कमियों का पता लग जाए तो उसे दूर करने का कार्य आसान हो जाता है। लेकिन इसके लिए धैर्य के साथ कठिन मिहनत की आवश्यकता होती है।
श्रीप्रकाश शर्मा


