Thursday, March 5, 2026
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पुतिन की बहुआयामी यात्रा

भारत और रूस के वार्षिक शिखर सम्मेलन के अवसर पर राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा से भारत और रूस के मध्य एक नए कूटनीतिक युग का सूत्रपात हो चुका है। अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के जबरदस्त और विकट कूटनीतिक दबाव के बावजूद भारत द्वारा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का खैरमकदम रैड कारपेट बिछाकर किया गया है। राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से पहले रूस की संसद ड्यूमा द्वारा इंडिया-रशिया रैसीप्रोकल एक्चेंज आॅफ लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट का पारित कर दिया गया है। इस इंडिया-रशियन एग्रीमेंट के तहत दोनों देशों को एक दूसरे के देश में अपनी सेनाओं को भेजने, इंडिया और रशिया के युद्धपोतों को एक दूसरे देश के बंदरगाहों में प्रवेश करने, एयर स्पेस, और एयर फील्डस को इस्तेमाल करने की अनुमति प्रदान की गई है।

भारत की आजादी के बाद से ही वस्तुत: सोवियत रूस का भारत एक अत्यंत निकट व्यापारिक और रणनीतिक साझीदार देश रहा। पब्लिक सैक्टर में बड़े बड़े बुनियादी उद्योगों को स्थापित करने में सोवियत रूस ने भारत को जबरदस्त सहयोग किया गया था। वर्ष1991 में सोवियत रूस के राजनीतिक विघटन के तत्पश्चात भी भारत और रूस के मध्य स्थापित हुए ऐतिहासिक ताल्लुकात में रणनीतिक निकटता और आर्थिक सहयोग बाकायदा बरकरार बना रहा। एक ऐसा ऐतिहासिक दौर भी था, जबकि भारत के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन से जन्म लिए मुल्क पाकिस्तान का अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों की शक्तियां प्रबल तौर से सैन्य समर्थन कर रही थी। अमेरिका के नेतृत्व में पाकिस्तान को सैन्य संगठन सेंट्रल मिलिट्री ट्रिटी आॅर्गनाइजेशन (सैंटो) का सक्रिय सदस्य बनाया गया था। तत्कालीन सोवियत रूस द्वारा कामरेड निकिता खुरुश्चोव के शासन काल से ही भारत को प्रबल आर्थिक सहयोग और सैन्य समर्थन प्रदान किया गया। पाकिस्तान और भारत के मध्य अक्तूबर वर्ष1947 से पाक फौज के आकमण से प्रारम्भ हुए रक्तरंजीत रहे कश्मीर विवाद पर संयुक्त राष्ट्र सिक्योरिटी काउंसिल में भारत के समर्थन में पश्चिमी देशों के प्रस्तावों के विरुद्ध सोवियत रूस द्वारा छह दफा वीटो अंजाम दिया गया।

भारत के लिए संकटपूर्ण आर्थिक दौर में जबकि अमेरिका से परस्पर व्व्यापार खतरे में है और अमेरिका के कूटनीतिक दबाव में भारत ने रूस से तेल का आयात तीस प्रतिशत तक कम कर दिया गया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन द्वारा भारत के समक्ष प्रबल रणनीतिक और आर्थिक सहयोग स्थापित करने की कूटनीतिक पेशकश की गई हैं। राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पस्कोव ने बयान में कहा कि देखना है कि भारत और रूस के मध्य सहयोग को शिखर बिंदु पर ले जाए जाने की राष्ट्रपति पुतिन की पेशकश को भारत किस अंदाज से स्वीकार करता है। राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने आगे फरमाया कि भारत के साथ रूस अपना आर्थिक और रणनीतिक सहयोग कूटनीतिक सरहदों से कहीं अधिक उपर जाकर स्थापित करने के लिए तत्पर है। दिमित्री पैस्कोव ने अपने कूटनीतिक अंदाज में कहा कि भारत जिस हद तक रूस के साथ सहयोग के लिए अपने कदमों को आगे बढ़ाएगा, निश्चित तौर पर रूस भी भारत के साथ उसी गति से अधिकाधिक सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार हो जाएगा।

भारत की अपनी यात्रा प्रारंभकरने से ठीक पहले रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी अपने बयान में कहा कि रूस की सरकार भारत के साथ अपने संबंधों को एक उच्च शिखर तक ले जाना चाहती हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारणवश रूस अनेक वर्षों से अमेरीका और यूरोपियन यूनियन द्वारा आयद किए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का निरंतर सामना कर रहा है। इस कारण से रूस की आर्थिक और सैन्य निर्भरता चीन के ऊपर बहुत अधिक बढ़ गई है। चीन पर रूस की बढ़ती हुई निर्भरता को संतुलित करने की खातिर रूस के राष्ट्रपति पुतिन को भारत के रणनातिक और आर्थिक सहयोग की प्रबल आवश्यकता प्रतीत हो रही है। अत: राष्ट्रपति पुतिन भारत को चीन के समकक्ष रणनीतिक दर्जा प्रदान करने के लिए तैयार हो गए हैं और चीन पर निरंतर बढ़ती हुई रूस की निर्भरता को भारत के साथ मिलकर संतुलित करने का जोरदार प्रयास कर रहे हैं।

सर्वविदित है कि विश्व पटल पर शीत युद्ध का एक बार फिर से आगाज हो चुका है और दुनिया दो सैन्य गुटों में विभाजित होती हुई नजर आने लगी है। जहाँ एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व में नाटो सैन्य शक्तियां विद्यामान हैं, तो दूसरी तरफ रूस चीन और ईरान आदि अनेक देशों का सैन्य गुट सन्नद हैं। आजादी के संपूर्ण दौर में भारत परंपरागत तौर पर नेहरू युग से ही एक गुटनिरपेक्ष देश रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में भी स्वतंत्र विदेश नीति पर बाकायदा गतिशील रहते हुए, भारत ने पं.जवाहर लाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का उनके नाम से बाकयदा परहेज करते हुए सदैव अनुसरण किया है। पं. नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का ही परिणाम रहा कि 1962 में आक्रमणकारी चीन को युद्ध विराम करके पीछे हटना पड़ा था, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति जान एफ कनैडी और सोवियत रुस के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता खुरूश्चोव द्वारा चीन आक्रमण की प्रबल भर्त्सना करते हुए भारत का समर्थन किया गया था। अत्यंत निकट रणनीतिक सहयोगी देश होते हुए भी सोवियत रूस की खातिर, पं. नेहरू काल से ही गुटनिरपेक्ष भारत द्वारा अमेरिका का कदाचित परित्याग नहीं किया गया।

1971 जबकि बांग्लादेश युद्ध करते हुए भारत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सोवियत रूस के साथ एक 20 वर्षीय सैन्य संधि पर हस्ताक्षर किए थे, तब भी अपनी स्वतंत्र गुटनिरपेक्ष नीति पर भारत बाकायदा कायम बना रहा और अपने संबंधों को किसी भी तौर पर पाकिस्तान का सैन्य समर्थन करने वाले अमेरिका के साथ कदाचित शिथिल नहीं होने दिया था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भयानक तौर पर किए जा रहे टैरिफ आक्रमणों के बावजूद भी भारत ने अभी तक अमेरिका के विरुद्ध कोई प्रतिशोधनात्मक कार्यवाही नहीं की है।

भारत की निर्भरता रक्षा क्षेत्र में रूस से निरंतर आयात की जाती रही सैनिक सैन्य सामग्री पर सदैव से रही है। भारत के रक्षा क्षेत्र में तकरीबन 70 फीसदी आधुनिकतम हथियार रूस द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं। इन आधुनिकतम हथियार में लड़ाकू सुखोई जेट, टी-90 टैंक, एस-400 एयर डिफेंस आदि शुमार रहे हैं। इंडिया रशिया रैसीप्रोकल एक्चेंज आफ लॉजिस्टिक नेटवर्क से जुड़कर भारत को बेहद फायदा होगा। भारत द्वारा विगत कुछ वर्षों से बहुत बड़े पैमाने पर रूस से कच्चे तेल का आयत किया जाता रहा है। रूस से कच्चा तेल आया करने में फिलहाल30 फीसदी की कटौती कर दी गई है। भारत और रूस के मध्य व्यापार संतुलन वस्तुत: रूस के पक्ष में कायम बना रहा है। राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरानभारत और रूस के परस्पर व्यापार संतुलन पर भी एक समझौता अंजाम दिया गया है, ताकि व्यापार संतुलन को स्थिर करने के लिए भारत से रूस को इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल, रसायन, कृषि सामान का निर्यात बढ़ाया जाएगा।

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