
एक निर्धन व्यक्ति भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी परम भक्त था। उसकी आराधना से मां लक्ष्मी प्रसन्न हुईं तथा उसे एक अंगूठी भेंट देकर अदृश्य हो गईं। अंगूठी सामान्य नहीं थी। उसे पहनकर जैसे ही अगले दिन उसने धन पाने की कामना की, उसके सामने धन का ढेर लग गया। अंगूठी का चमत्कार मालूम पड़ते ही उसने अपने लिए आलीशान बंगला, नौकर-चाकर आदि तमाम सुविधाएं प्राप्त कर लीं। एक दिन उस नगर में जोरदार तूफान के साथ बारिश होने लगी। कई निर्धन लोगों के मकानों के छप्पर उड़ गए।
लोग इधर-उधर भागने लगे। एक बुढ़िया उसके बंगले में आ गई। उसे देख वह व्यक्ति गरजकर बोला, ऐ बुढ़िया कहां चली आ रही है बिना पूछे। बुढ़िया ने कहा, बारिश बहुत तेज है, कुछ देर के लिए तुम्हारे यहां रहना चाहती हूं। लेकिन उसने उसे बुरी तरह डांट-डपट दिया। बूढ़ी महिला की किसी भी बात का असर उस व्यक्ति पर नहीं पड़ा।
जैसे ही सेवकों ने उसे द्वार से बाहर किया, वैसे ही जोरदार बिजली कौंधी। देखते ही देखते उस व्यक्ति का मकान जलकर खाक हो गया। उसके हाथों की अंगूठी भी गायब हो गई। सारा वैभव पलभर में राख के ढेर में बदल गया। उसने बुढिया के स्थान पर लक्ष्मी जी को अपने सामने पाया। वह समझ गया उसने बुढ़िया को नहीं, साक्षात लक्ष्मीजी को घर से निकाल दिया है।
वह भगवती के चरणों में गिर पड़ा। देवी बोलीं, तुम इस योग्य नहीं हो। जहां निर्धनों का सम्मान नहीं होता, मैं वहां निवास नहीं कर सकती। यह कहकर लक्ष्मीजी उसकी आंखों से ओझल हो गईं।
प्रस्तुति : राजेंद्र्र कुमार शर्मा


