
अब मैं चैन से मर सकती हूं, देश सुरक्षित हाथों में है! देश को एक सच्चा नेता मिल गया है! मेरा आशीर्वाद पहुंचा देना!’ इन पंक्तियों के लेखक को फोन करके रूंधे स्वर में यह बात एक पूर्व महिला प्रशासनिक अधिकारी ने कही थी। उन्होंने 10 मई को लखनऊ में आयोजित सामाजिक न्याय सम्मेलन में राहुल गांधी का भाषण सुना था, जिस पर उनकी ये प्रतिक्रिया थी। निश्चित ही नतीजों ने उन्हें और भी राहत पहुंचाई होगी। 2024 के चुनाव में तकनीकी रूप से जीत चाहे नरेंद्र मोदी की हुई हो, लेकिन वास्तव में जननायक बनकर अगर कोई उभरा है तो वे हैं राहुल गांधी। ऐसे नेता के लिए भारत न जाने कितने समय से तरस रहा था, जिसका कोई निजी स्वार्थ न हो, यहां तक कि पार्टी का हित भी प्राथमिक न हो। प्राथमिक हो तो भारत की जनता। भारत नाम का वह विचार जिसका आधार स्वतंत्रता आंदोलन और उसके संकल्प हों, जिसकी भाषा में कबीर, नानक, रैदास से लेकर गांधी और डा.आंबेडकर के सपने मुस्कराते हों।
एक ऐसे दौर में जब सत्ता के शीर्ष से घृणा की बारिश हो रही हो, ‘नफरत के बाजार में मुहब्बत की दुकान खोलने’ की शायराना बात को राजनीतिक नारे में बदल देना एक ऐतिहासिक परिघटना है। पहले चार हजार किलोमीटर की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और फिर ‘छह हजार किलोमीटर’ की न्याय यात्रा ने राहुल की नैतिक आभा में ऐसी नई चमक भरी कि तमाम संसाधनों और शक्ति से लैस प्रधानमंत्री मोदी उसके सामने धूमिल नजर आने लगे। इस चुनाव में ग्रामीण भारत की हर दूसरी सीट पर विपक्ष जीता है। यही नहीं, देश के दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय मोदी नहीं, राहुल गांधी की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। यह प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी की नैतिक हार है।
इस हैसियत को हासिल करने के पीछे राहुल गांधी का एक दशक से जारी समझौताहीन संघर्ष है। कांग्रेस के इतिहास में कोई नेता ऐसा नहीं रहा, जिसे इतनी विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ा हो। प्रधानमंत्री मोदी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ दरअसल, नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ झूठ और घृणा फैलाने का अभूतपूर्व प्रोजेक्ट है जिसे कॉरपोरेट मीडिया को हथियार बनाकर चलाया गया। लेकिन राहुल गांधी की मेहनत, सच्चाई और सांप्रदायिक शक्तियों से तीखे संघर्ष की रणनीति की वजह से कांग्रेस की संसद में सीटें दोगुनी हो गर्इं हैं।
मोदी सरकार ने चुनाव के पहले कांग्रेस को पूरी तरह निहत्था करने की कोशिश की थी। उसके बैंक खाते सील कर दिए गए। चुनाव आयोग भी सीधे तौर पर सरकार की योजनाओं के हिसाब से काम करता नजर आया। जाहिर है, राहुल गांधी ने ये चुनावी मैच बिना जूता पहने खेला था। यही नहीं, उनके पांव में छाले ही छाले थे, लेकिन उन्होंने गोल कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी जिस भाषा और भंगिमा के लिए जाने जाते हैं, चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जैसी ध्रुवीकरण की रणनीति अपनायी, वह उनके तीसरे बार प्रधानमंत्री बनने के बावजूद जारी नहीं रह सकती। देश का एक बड़ा वर्ग ये महसूस कर रहा है कि उसकी गर्दन पर पड़ा शिकंजा ढीला पड़ गया है और इसे तोड़ा भी जा सकता है। इंडिया गठबंधन सरकार बनाने में सफल नहीं हुआ लेकिन सम्राट और अवतार की भूमिका अख्तियार कर चुके महाबली मोदी अकेले बहुमत से पीछे रह कर जिस तरह एनडीए की छतरी तानने को मजबूर हुए हैं, उसने लोकतंत्र पर नजर आ रहे संकट के बादलों को हिंद महासागर की ओर ढकेल दिया है। यह तय है कि आने वाले कई सालों तक भारत की राजनीति उन्हीं मुद्दों के इर्दगिर्द घूमेगी जिन्हें राहुल गांधी केंद्र में ले आए हैं। जैसे-जाति जनगणना, सामाजिक न्याय, आबादी के अनुपात में भागीदारी, सार्वजनिक उपक्रमों की बहाली, राज्य की कल्याणकारी भूमिका और सबसे बढ़कर हिंदू समाज को नफरती तालाब में डुबोने के प्रोजेक्ट पर विराम।
राहुल गांधी की सबसे शानदार उपलब्धि सांप्रदायिक उन्माद के नशे का शिकार हो गए हिंदुओं के एक बड़े हिस्से को नींद से जगाना है। इस ‘जागृत हिंदू’ को मुस्लिमों को ‘पराया’ बनाने और उन पर सरकारी तंत्र की ओर से अत्याचार करने की बीजेपी की रणनीति अब शर्मिंदा कर रही है। उसे कोरोना जैसे वायरस के तब्लीगी जमात की ताबीज से जन्म लेने की मोदी सरकार की थ्योरी पर यकीन करने और इसे भगाने के लिए ताली-थाली बजाने की हरकत पर भी शर्मिंदगी हो रही है।
यूपी में अयोध्या, प्रयागराज, और चित्रकूट जैसे धार्मिक महत्व के शहरों में बीजेपी की हार और काशी में प्रधानमंत्री मोदी की घिसट-घिसटकर मिली जीत, इसी जागृत हिंदू का पश्चाताप है। उसने काशी की गलियों में ‘हर-हर महादेव’ को ‘हर-हर मोदी’ होते देखा तो नालियों में टूटे विग्रह और सैकड़ों मंदिरों के शिखर भी देखे! उसने ये भी देखा कि मोदी-योगी सरकार की इस अधर्म-नीति का विरोध करने वाले शंकराचार्य को दुत्कारने वाला ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का तमगा अपने सीने पर टंकवा रहा है। जिस अयोध्या में यह हिंदू नवाबों की बनवाई हनुमान गढ़ी पर मत्था टेक के तमाम मंदिरों में दर्शन के लिए जाता था, वहां उसने राममंदिर के नाम पर लूट होते देखी। कौड़ियों के मोल में जमीन खरीदकर करोड़ों में रामंदिर ट्रस्ट को बेचने वाले बीजेपी नेताओं को देखा। ये भी देखा कि तमाम घर, मंदिर और दुकानें उस राम के नाम पर बनाए जा रहे रामपथ के लिए तोड़े गए जो तुलसी के शब्दों में ‘गरीबनवाज’ है। कुल मिलाकर भगवा-वेश में सत्ता-हरण की कोशिशों की पोल खुल गई है। जागृत हिंदू को याद आ गया है कि रावण ने भी भगवा पहन कर सीता-हरण किया था और हनुमान को भटकाने के लिए कालनेमि ने भी साधु वेश ही धारण किया था। उसने अंतत: इस छद्म को समझ लिया जैसा कि तुलसीदास लिख गए हैं- ‘उघरहिं अंत न होय निबाहूं। कालनेमि जिमि रावन राहूं।।’
नरेंद्र मोदी के दस साल के शासन में सबसे ज्यादा जो चीज प्रभावित हुई थी वह है ‘लिबर्टी’ यानी व्यक्ति स्वातंत्र्य। भारत का लोकतंत्र सड़कों पर जिÞंदा नजर आता था जब तमाम वर्ग अपनी मांगों को लेकर बेखौफ धरना-प्रदर्शन करते थे। सरकार के खिलाफ बोलना-लिखना एक सामान्य बात थी। लेकिन उन्हें एक अभियान के तहत ‘देशद्रोही’ साबित किया गया। तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार और शिक्षक जेल में डाले गए। उनके कंप्यूटर में ऐसी सामग्री प्लांट की गई, जिससे उन्हें षड्यंत्रकारी बताकर जेल में डाला जा सके। 2024 के चुनाव नतीजे ने उस लुप्त हो चुके लोकतांत्रिक माहौल के लौटने का रास्ता खोला है। अब तमाम संवैधानिक संस्थाएं भी अपनी जिÞम्मेदारी बिना किसी दबाव के निभा पाएंगी। यह सब तब हुआ है, जब तमाम लोग नाउम्मीद हो चुके थे। इसके पीछे राहुल गांधी की ऐतिहासिक भूमिका है, जिसे इतिहास बाकायदा दर्ज करेगा।
दुष्यंत कुमार के एक शेर को थोड़ा बदलकर कहें तो-एक सच्चा आदमी है मुल्क में या यूं कहो, इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है..!


