Monday, January 24, 2022
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बेचैन करती है रायल इंडियन नेवी में हुई बगावत!

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किताबों में दर्ज देश की आजादी का जो इतिहास हमने पढ़ा है वह तरफदार इतिहास है? क्या इस इतिहास के समानांतर कोई ऐसा इतिहास भी है, जिसमें सत्ताधारियों ने आम जीवट संघर्षों को परदे में ढंक कर उसे सिरे से गायब कर दिया? क्या अपने हितों के मुताबिक तैयार किए गए इतिहास को प्रचारित-प्रसारित करके, एक समूच कालखण्ड का रुख मोड़ा जा सकता है? क्या इस प्रायोजित इतिहास से इतर भी कोई इतिहास हो सकता है? क्या कोई मौखिक इतिहास भी हो सकता है? अगर हां, तो उसे क्यों शब्दबद्ध किया जाना जरूरी है? इस तरह के इतिहास तक पहुंचने की यात्रा कितनी रोमांचक, बीहड़ और तकलीफदेह हो सकती है? इस इतिहास के किरदारों तक पहुंचना कितना जटिल रहा होगा, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।

चर्चित कथाकार और ‘अहमद अल हलो, कहां हो’ जैसे यादगार संस्मरण लिखने वाले सुरेन्द्र मनन ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ रॉयल इंडियन नेवी में हुई बगावत और बागी हिंदुस्तानी सेलर्स की अनकही महागाथा तलाशने की कोशिश की है। उनकी यह सफल कोशिश ‘हिल्लोल’ (प्रलेक प्रकाशन) पुस्तक के रूप में सामने आई है। सुरेंद्र मनन की इस बीहड़ यात्रा की शुरुआत उस वक्त हुई जब वह 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवी में फरवरी 1946 में हुई बगावत पर केंद्रित फिल्म बनाने के लिए शोधकार्य कर रहे थे। इसी दौरान उनके हाथ बीसी दत्त द्वारा लिखी ‘म्यूटिनी आॅफ द इनोसेंट्स’ पुस्तक की फोटोकॉपी हाथ लगी। वह बगावत से संबंधित सामग्री जुटाने के लिए इतिहास की पुस्तकें खंगालते रहे, लेकिन इस बगावत का जिक्र उन्हें किताबों में सरसरी तौर पर ही मिला। लेकिन 1946 के फरवरी मार्च के बहुत से अखबारों में बगावत की छपी खबरों ने उन्हें आगे का रास्ता दिखाया। वह खोज करते हुए बीसी दत्त उर्फ बिलई मास्टर के घर, तारा गांव पहुंचते हैं। दत्त बताते हैं कि फरवरी 1946 के उन पांच दिनों में किस तरह बगावत फैली। दत्त ने बताया, हमने यह सपना देखा कि रॉयल इंडियन नेवी में कब्जा करके उसे देश के नेताओं के सुपुर्द कर दें और इस तरह आजादी की जंग में अपना योगदान दें। 19 फरवरी की सुबह रॉयल इंडियन नेवी के रेटिंग्स (नौसेनिकों) ब्रिटिश राज के खिलाफ जंग का ऐलान किया तो सारा देश चौंक उठा था। सिग्नल स्कूल एचएमआईएस तलवार से उठी बगावत की चिंगारी एक जहाज से दूसरे जहाज तक फैलती चली गई और देखते ही देखते रॉयल इंडियन नेवी के अधिकांश जहाज उसकी चपेट में आ चुके थे।

देश की जनता भी रेटिंग्स के साथ थी। लेकिन देश के नेता इस बगावत के साथ नहीं थे। वे या तो चुप थे या राजनीतिक चालें सोच रहे थे। इस बगावत में शामिल होने वाले सभी रेटिंग्स को सरेंडर करना पड़ा। नेहरू ने जरूर रेटिंग्स की इस हड़ताल का राजनीतिक महत्व रेखांकित किया। झांसी में एक भाषण में उन्होंने कहा था कि ऐसी घटनाओं ने दर्शाया है कि हिंदुस्तानी सेना और हिंदुस्तानी अवाम का दिलो दिमाग किस दिशा में अग्रसर है।

लेकिन हिल्लोल में दर्ज इतिहास यहीं समाप्त नहीं होता। बीसी दत्त से सुरेंद्र मनन को आगे की कड़ियां मिलती गर्इं। शलिल घोष, जेएल रेड्डी, एके चटर्जी, एडमिरल सैमसन। सुरेंद्र मनन ने इनसे मिलने के लिए तारा गांव, कोलाबा, नाना चौक, वसंत विहार, बांद्रा, पाली माली रोड़ की यात्रा की। ताकि रॉयल इंडियन नेवी की बगावत का कोई पक्ष छूट न जाए। इन सबके घरों का, इन सबके रहन-सहन का और इन सबके भीतर के जज्बे का मनन ने मान्यूट वर्णन किया है।
अनेक लोगों ने बगावत के महत्व को स्वीकार किया है। एडमिरल चटर्जी ने भी यह बात स्वीकार की कि इस म्यूटिनी ने हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में योगदान जरूर दिया। एडमिरल सैम्सन ने कहा कि इस बगावत की वजह से आजादी कुछ जल्दी मिल गई। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ‘फोर्सेस मस्ट बी लॉयल टू स्टेट, लॉयल टू द स्टेट ओनली।’ सुरेंद्र मनन उस समय नेवी में कार्यरत और भी लोगों से मिले और संबंधित जानकारियां एकत्रित कीं।

दरअसल, वह इस बगावत का कोई भी पक्ष छोड़ना नहीं चाहते थे। चरित्र अभिनेता और कम्यूनिस्ट पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता रहे एके हंगल से मनन ने मुलाकात की। उनकी इस बातचीत से रॉयल इंडियन नेवी की बगावत के कुछ नए आयाम सामने आए। हंगल ने बताया, रॉयल इंडियन नेवी में जो बगावत हुई, उसे कांग्रेस या मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने, आम जनता ने खुलकर समर्थन दिया, अपना खून बहाया, लेकिन नेताओं ने उस बगावत का समर्थन नहीं किया। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि नेवी की बगावत हो या दूसरे आंदोलन-यह सब एक राष्ट्रीय संघर्ष तो था ही लेकिन साथ-साथ वर्ग संघर्ष भी था। अलग-अलग जगहों पर हो रहे इन आंदोलनों की बागडोर कामगार वर्ग के हाथों में आती जा रही थी। कम्युनिस्ट ताकतों के हाथों में जा रही थी। हो सकता था कि इंकलाब आ जाता। हंगल ने भी यह स्वीकार किया कि हिंदुस्तान को आजादी दिलवाने में रॉयल इंडियन नेवी की बगावत का बडा योगदान रहा।
सुरेंद्र मनन तत्कालीन युवा कम्युनिस्ट नेता एम फारुकी से भी मिले। उन्होंने कहा कि नेवल अपराइजिंग के बाद ब्रिटिश यह जान चुके थे कि हिंदुस्तान में ब्रिटिश राज का आखिरी दौर आ चुका है। दुखद यह था कि भारत में नई सरकार ने रॉयल इंडियन नेवी के रेटिंग्स की शौर्यगाथा के निशान पोंछ दिए बल्कि उनकी बगावत को न सिर्फ निरर्थक, बल्कि सेनाओं में अनुशासन की दृष्टि से निंदनीय बना दिया था। रॉयल इंडियन नेवी के सैकड़ों रेटिंग्स को बर्खास्त कर दिया गया। सर्विस के बाद मिलने वाली सारी सुविधाएं उनसे छीन ली गर्इं। इन रेटिंग्स ने कभी इस बात की कल्पना नहीं की थी कि वे अपने आजाद देश में अजाने, अमान्य और अवांछित हो जाएंगे। किसी तरह का सम्मान तो दूर की बात थी, वे तो स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर स्वीकृति पाने के लिए दूर दराज से मंत्रालयों को पत्र लिखते रहे। लेकिन उन्हें कभी कोई जवाब नहीं मिला। विस्मृत कर दिए गए इस इतिहास को सुरेंद्र मनन ने पूरी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ खोजा है। पूरी किताब और उसकी रचना प्रक्रिया एक बीहड़ यात्रा है। यह यात्रा समाप्त होने के बाद आपके मन में अनेक प्रश्न छोड़ती है। यह पूछती है कि आखिर रॉयल इंडियन नेवी के रेटिंग्स के साथ यह अन्याय और भेदभाव क्यों किया गया? क्यों उन्हें भुला दिया गया? हिल्लोल एक बेचैन कर देने वाली किताब है और मनन ने इसे पूरी शिद्दत से लिखा है।


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