पिछले तीन वर्षों में पति-पत्नी के बीच तलाक के मामलों में तीन गुना वृद्धि हुई है। ‘एडजुआ लीगल्स गूगल एनालिटिक 2025’ की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, लखनऊ और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में हाल के वर्षों में तलाक के अर्ज़ियों की संख्या तीन गुना बढ़ी है। यह शोध ‘कम्प्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
मच्छिंद्र ऐनापुरे
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। दोस्तों से संवाद करना, जानकारी प्राप्त करना और मनोरंजन करना-इन सबके लिए लोग अपने जीवन का अधिकांश समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं। किंतु, सोशल मीडिया के अतिरेक के कारण रिश्तों में गलतफहमियां, अविश्वास और मानसिक तनाव उत्पन्न होकर बढ़ते तलाक के मामलों की वजह से यह एक सामाजिक समस्या के रूप में उभरकर सामने आई है। दुनिया को जोड़ने वाले सोशल मीडिया के कारण तलाक की दर बढ़ गई है।
फेसबुक, इंस्टाग्राम और ओटीपी पर उपलब्ध जानकारी रिश्तों में दूरी पैदा करने का कारण बन रही है। आयु वर्गों का आकलन किया गया जिसमें 25 से 34 वर्ष की उम्र के व्यक्तियों में तलाक की दर 35 प्रतिशत पाई गई, जबकि 18 से 25 वर्ष की उम्र के वर्ग में यह दर 27 प्रतिशत है। महाराष्ट्र में 18% तलाक का कारण सोशल मीडिया ठहराया गया है। यह अनुपात दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है, जबकि कर्नाटक में यह 11 प्रतिशत और दिल्ली में 8 प्रतिशत है।
सोशल मीडिया से होने वाले तलाक के कारण
तुलनात्मक मानसिकता: ‘दूसरों का जीवन कितना सुंदर है झ्र उसका/उसका रहन-सहन कितना अच्छा है।’ सोशल मीडिया पर हम लगातार अन्य दंपतियों के ‘खुशहाल जीवन के पल’ देखते हैं। सैर-सपाटे, आकर्षक तरीके से मनाए गए त्यौहार, रोमांटिक डिनर आदि कई बेहतरीन क्षण जब साझा किए जाते हैं, तो दूसरे के जीवन के सुखद क्षण देखकर व्यक्ति को लगता है कि उसके अपने जीवन में कुछ कमी है। जीवनसाथी के प्रति नाराजगी, असंतोष और अपेक्षाभंग की भावना पनपने लगती है। ‘वह इतना रोमांटिक है, तुम क्यों नहीं हो’ या ‘उसने ऐसा गहना लिया या ड्रेस लिया, मुझे भी वैसा चाहिए’- इस तरह की तुलनाओं से विवाद होने लगते हैं।
भावनात्मक उपेक्षा: एक ही कमरे में होने पर भी दोनों मन से बहुत दूर हो सकते हैं। इसका कारण यह है कि दोनों ही मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। न तो आपस में कोई संवाद होता है, न शारीरिक निकटता झ्र सिर्फ डिजिटल व्यस्तता। इससे रिश्तों का भावनात्मक अपनापन समाप्त हो जाता है।
विश्वासघात: सोशल मीडिया पर पुराने दोस्तों से पुराने संबंध फिर से स्थापित करना या नए विवाहेतर संबंध बनाना आसान हो गया है। चैटिंग ऐप्स, डेटिंग साइट्स और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के कारण ऐसे संबंध छुपाना संभव हो गया है, जिससे विश्वासघात और तलाक के मामले बढ़े हैं। दूसरों के साथ सोशल मीडिया पर की गई दोस्ती, फोटो टैग, कमेंट्स झ्र यह सब जीवनसाथी को संदिग्ध लगने लगता है।
संवाद का अभाव: पहले संवाद प्रत्यक्ष मुलाकातों से, पत्रों द्वारा या फोन पर होता था। अब मैसेज, चैट, स्टेटस, इमोजी, व्हॉट्सऐप कॉल्स या वीडियो कॉल्स का उपयोग बढ़ गया है। इन माध्यमों की सहज सुविधा अच्छी है; लेकिन गलतफहमी, संदेशों या चैट का गलत संदर्भ, और इन बातों का आसानी से व्हॉट्सऐप ग्रुप्स पर प्रसारित होना झ्र ये सब ट्रोलिंग, अफवाहें और दूसरे लोगों की प्रतिक्रियाएँ पैदा करके रिश्तों में गलतफहमियों को जन्म देते हैं। वास्तविक व्यक्तिगत संवाद की जगह सोशल मीडिया पर बढ़ते संपर्क ने जीवनसाथी के प्रति गलतफहमी, अविश्वास और असंतोष को वैवाहिक जीवन में बढ़ा दिया है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सीमाएं:आज के दंपतियों को व्यक्तिगत स्पेस और स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। सोशल मीडिया पर खुलकर व्यक्त होने की आजादी होती है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मयार्दा लांघता है तो यह रिश्ते पर दबाव डाल सकता है।
निजी जीवन का सार्वजनिक प्रदर्शन: कुछ लोग अपने निजी जीवन की हर बात सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। इससे जीवनसाथी को ऐसा लगता है कि उसकी गोपनीयता भंग हो रही है। वैवाहिक जीवन के छोटे-छोटे झगड़े या तकरार को सोशल मीडिया पर, विशेषकर यूट्यूब पर पोस्ट करना भी रिश्तों के लिए हानिकारक सिद्ध होता है।
वैवाहिक रिश्तों पर होने वाले प्रभाव
तलाक के कारण परिवार बिखर जाता है। इसका सबसे बड़ा आघात बच्चों को सहना पड़ता है। उन्हें दोनों माता-पिता का प्यार और मार्गदर्शन नहीं मिलता, जिसका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर होता है। रिश्तेदारों के दबाव के बजाय आजकल दंपति स्वयं निर्णय लेते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन कभी-कभी ‘तलाक’ बहुत आसान विकल्प लगने लगता है। ‘निभा नहीं तो ले लो तलाक’ – ऐसी स्थिति बन जाती है। आपस में बातचीत किए बिना सोशल मीडिया पर ‘ब्रेकअप पोस्ट’ साझा की जाती हैं। सोशल मीडिया पर तलाक की चचार्ओं से रिश्तों में संदेह का माहौल बनता है। इसका नतीजा यह है कि कई लोगों का विवाह संस्था पर से विश्वास उठ गया है और आज समाज में अविवाहित व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है।
तलाक की प्रक्रिया अत्यंत तनावपूर्ण होती है। सोशल मीडिया पर आने वाली नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ और चचार्एँ मानसिक दबाव को और बढ़ा देती हैं। इसके कारण व्यक्ति अवसाद, चिंता और अन्य मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हो जाता है। महिलाओं में आत्मग्लानि, हीनभावना और आर्थिक असुरक्षा का डर पैदा होता है, जबकि पुरुषों में उदासीनता, क्रोध या नशे की लत की ओर झुकाव बढ़ता है। बच्चों पर मानसिक दबाव आता है और ‘स्प्लिट पैरेंटिंग’ के कारण वे मानसिक स्थिरता खो बैठते हैं। आगे चलकर उनके भविष्य में रिश्तों का यह टूटापन उनके स्वयं के वैवाहिक जीवन में भी अधिक गहराई से अनुभव होने की संभावना बढ़ जाती है।
कानूनी प्रक्रिया का खर्च
तलाक की प्रक्रिया बहुत महंगी होती है। वकीलों की फीस, न्यायालय का खर्च, संपत्ति का बंटवारा- इन सबके कारण आर्थिक दबाव बढ़ जाता है। भरण-पोषण का खर्च और बच्चे की जिÞम्मेदारी केवल एक व्यक्ति पर आने से उस पर मानसिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक बोझ पड़ता है और एकल अभिभावकत्व के कारण उसके जीवन का संतुलन बिगड़ सकता है। ‘परिवार’ न्यायालय के वकीलों के अनुसार व्हॉट्सऐप, फेसबुक चैटिंग, मैसेज आदि का गलत उपयोग अक्सर तलाक की ‘बीजभूमि’ बनता है। तलाक के लिए सोशल मीडिया की खामियों को प्रमाणित करने हेतु मैसेज, चैट इतिहास, फोटो और वीडियो पर विचार किया जाता है। न्यायालय में इसकी वास्तविक जाँच, गोपनीयता के अधिकार और धोखाधड़ी के खतरे पर भी विचार किया जाता है।
क्या करें?
’ पति-पत्नी को आपस में चर्चा करके सोशल मीडिया के उपयोग के लिए निश्चित सीमाएं तय करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, भोजन के समय मोबाइल का उपयोग न करें। साथ में समय बिताएँ और यह भी तय करें कि सोशल मीडिया पर क्या साझा करना है और क्या नहीं, साथ ही रिश्तों की निजी जानकारी उजागर न करें। यदि जीवनसाथी को यह अच्छा नहीं लगता कि उसका निजी जीवन ‘ओपन बुक’ की तरह सोशल मीडिया पर दिखाया जाए, तो इसका ध्यान रखना चाहिए। हर हफ्ते एक दिन तय करें जब आप मोबाइल को पूरी तरह से अलग रखकर केवल एक-दूसरे से संवाद करें झ्र एक-दूसरे से संबंधित शिकायतें, प्रशंसा, इच्छाएं और भविष्य की योजनाओं पर खुलकर बात करें।
’ विवाह परामर्शदाता की मदद लें। वे निष्पक्ष होकर सुनते हैं और वैवाहिक जीवन में संवाद स्थापित करने के विभिन्न तरीके सुझाते हैं।
’ ‘सोशल मीडिया डिटॉक्स’ नियमित रूप से सप्ताह में एक बार करें। महीने में एक रविवार पूरी तरह मोबाइल के बिना बिताएं। इससे जीवनसाथी के साथ का ‘रिश्ता’ नए सिरे से मजबूत होता है।
’ बच्चों के साथ स्पष्ट लेकिन संवेदनशील संवाद करें। यदि तलाक अपरिहार्य हो, तो बच्चे को उचित उम्र में यह समझाना आवश्यक है कि दोनों माता-पिता उससे बहुत प्यार करते हैं और उसके भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए दोनों ही प्रतिबद्ध हैं।
’ सामाजिक और पारिवारिक सहयोग भी जरूरी है। व्यक्ति के आस-पास का समाज मानसिक परिपक्वता दिखाए और तलाकशुदा माता-पिता के बच्चे से इस विषय में बार-बार प्रश्न पूछकर उसे परेशान न करे। साथ ही, परिवार को चाहिए कि वह तलाक के निर्णय का सम्मान करे और बच्चों के पालन-पोषण में उस व्यक्ति की सकारात्मक व्यवहार और विचारों से मदद करे।

