
हिंदी के लेखक-प्रकाशक कहते हैं कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे कहां से, जब संभावित पाठकों की पूरी पीढ़ी को ही व्यवस्थित तरीके से उसके साहित्य, भाषा और समाज से दूर कर दिया जाता है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिंदी में ज्यादा विकट है। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘कोई भी राष्ट्र नकल करके बहुत ऊपर नहीं उठ सकता है और न ही महान बन सकता है’। लेकिन हम इन बातों को भूलकर दूसरों की सभ्यता, पहनावा, भाषा का अंधानुकरण करने में लगे हुए हैं। नकल की इस बेमानी रफ्तार में कौन सिरमौर बनता है, इसके लिए भी प्रतियोगिता का दौर जारी है। इस अंधी रफ्तार में हम साहित्य-संस्कृति, आचार-विचार, शैली, पहनावा, खान-पान, नीति-सिद्धांत यहां तक कि अपने लोगों को और उनके बीच की आत्मीयता को भूलते जा रहे हैं। हम पर विदेशी संस्कृति हावी होती जा रही है बल्कि हो चुकी है। लार्ड मैकाले का मानना था कि जब तक संस्कृति और भाषा के स्तर पर गुलाम नहीं बनाया जाएगा तब तक भारतवर्ष को पूरी तरह से गुलाम बना पाना असंभव है। उनके अनुसार हिंदुस्तानियों को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही गुलाम बनाया जा सकता है। 14 सितंबर, देशभर में हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है। जाने-माने हिंदी के विद्वान मंचों पर भाषण देते हैं। तमाम आयोजनों में हिंदी के उत्थान की बात होती है। असलियत में होता कुछ नहीं है। हिंदी जहां है, वहां से टस की मस भी नहीं हो पाती है। हिंदी दिवस पर आयोजन महज खानापूर्ति बनकर रह गया है और हिंदी तथा हिंदी दिवस दोनों हाशिए पर पड़ी एक औपचारिकता बनकर रह जाते है। अगर इस पर अमल हो तो इससे हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं दोनों का ही विकास हो सकता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।’ हिंदी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों को नौकरी में कठिनाइयां आती हैं। उन्हें आज भी हीनभावना से देखा जाता है। उन्हें अव्वल दर्जे का मूर्ख समझा जाता है। ऐसा इसलिए कि हमारी मानसिकता पर अंग्रेजी हावी है। इसी वजह से देश दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक अंग्रेजी वाला इंडिया और दूसरा हिंदी वाला हिन्दुस्तान।
यदि आप दिल्ली और मुंबई से बाहर सफर पर हैं तो आपको कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो बात तो हिंदी में करते हैं लेकिन बीच-बीच में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल खूब करते हैं। अंग्रेजी शब्दों के व्यापक पैमाने पर चलन में आने के कई खास कारण हैं। भारतीय समाज में अंग्रेजी बोलने वाले को आधुनिक और सम्मानित व्यक्ति समझा जाता है। भले ही आप धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलना नहीं जानते हों, लेकिन यदि बातचीत में बीच-बीच में अंग्रेजी शब्द बोलें तो पड़ोसी पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। भारतीय काफी मौलिक भी हैं। यदि ‘टेंशन’ शब्द लें तो इसका उपयोग संज्ञा और क्रिया ही नहीं विशेषण के रूप में भी होने लगा है। संज्ञा- ‘मुझे टेंशन मत दो’ (डोंट गिव मी टेंशन), क्रिया- ‘मुझे परेशान मत करो’ (डोंट टेंशन मी) और विशेषण- ‘परीक्षा काफी तनावपूर्ण रही’ (दैट वाज ए वेरी टेंशन इक्जाम)।
बहुत सारे हिंदीवालों को यह गुमान है कि हिंदी अब इंटरनेट में पसर गयी है, कई देशों में पढ़ायी जाती है, टीवी चैनलों और अखबारों में नजर आती है और अब तो इसमें हॉलीवुड की बड़ी-बड़ी़ फिल्में भी डब करके दिखायी जाती हैं। इससे उन्हें लगता है कि हिंदी का संसार फैल रहा है। शायद दूसरी भाषाओं को भी यही लगता हो। लेकिन सच्चाई यह है कि यह हिंदी बस एक बोली की तरह बची हुई है जिसका बाजार इस्तेमाल करता है। तीन-चार दशक पहले बच्चे घर पर मगही, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी वगैरह बोलते थे और स्कूल में हिंदी। आज बच्चे घर पर हिंदी बोलते हैं और स्कूल में अंगरेजी। और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे औपचारिक वातार्लाप अंग्रेजी में करें। वैसे एक भाषा के तौर पर अंग्रेजी से हमें कोई परहेज नहीं होना चाहिए लेकिन अंग्रेजियत जो हमारे ऊपर हावी है उससे बचा जाना चाहिए। दुर्भाग्य से यही हास्यास्पद अंग्रेजियत हम पर हावी होती गई है। असल में यह अंग्रेजियत न होकर एक हीनग्रंथि है जो इनके व्यवहार में परिलक्षित होती है। जिसे अधुनातन मान लिया जाता है। गो अंग्रेजों के अच्छे गुण और अच्छाईयां हमसे कोसों दूर हैं। एक तरफ जहां हमारे देश के लोग हिंदी बोलने से बच रहे हैं वहीं दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विदेशियों में हिंदी सीखने और जानने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। विदेशी यहां आकर हिंदी भाषा समेत हमारी अन्य अनेक प्रादेशिक भाषाओं पर शोध कर रहे हैं। गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक स्मिट के अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार होगा।
विडम्बना है कि ज्ञान-विज्ञान की भाषा के तौर पर हिंदी लगातार कमजोर होती जा रही है। कहने की जरूरत नहीं कि यही स्थिति उर्दू, तमिल या तेलुगू की भी है। इन भाषाओं के लेखक-पत्रकार या तो सरकारी मदद पर चलते हैं या अंगरेजी संस्थानों से निकलने वाले भाषाई अखबारों या चैनलों में काम करते हैं। वर्तमान व्यवस्था के कारण अधिकतर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की भाषा व्यवहार की भाषा से अलग हो जाती है। जब उनकी ज्ञान की प्रक्रिया से ही इन भाषाओं को काट दिया गया है, तो फिर यह शिकायत कहां से जायज है कि अमुक अनुशासन भारतीय भाषाओं में नहीं पढ़ाए जा सकते! यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में प्राय: उच्च शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं नहीं हैं। कुछ राज्यों के विश्वविद्यायलों में अवश्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पठन-पाठन होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। फलस्वरूप, अक्सर वे उस विषय में पारंगत होने और आगे की पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विशेष वित्तीय सहायता से संचालित कार्यक्रम या पुस्तकालय भी प्राय: नहीं दिखाई देते।
हिंदी भाषा नहीं-संस्कार, जीवन शैली है
हो सकता है कि कभी भक्ति और अध्यात्म या कभी स्वातंत्र्य चेतना और स्वाभिमान हिंदी के स्वरूप के निर्धारक रहे हों किंतु आज तो ऐसा लगता है कि हिंदी बाजार और तकनीक के हवाले है। क्या हिंदी के भविष्य के निर्धारण में उन तकनीकी विशेषज्ञों के हिंदी ज्ञान,कौशल और हिंदी प्रेम की अहम भूमिका रहेगी जो डिजिटल हिंदी को सुलभ बनाने के प्रयासों में लगे हैं? यह भी विचारणीय है कि हिंदी के लिए जब बाजार द्वारा प्रयास किए जाते हैं तो इनका उद्देश्य हिंदी की बेहतरी से अधिक अपनी बाजारी जरूरतों को पूरा करना होता है। ऐसी दशा में हिंदी का भावी स्वरूप कैसा होगा?
हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने में लगे मनीषी निरंतर यह प्रयास करते रहते हैं कि देश और दुनिया में जो कुछ भी नया घट रहा है उसकी अभिव्यक्ति हिंदी में हो या हिंदी को इतना समर्थ बना दिया जाए कि वह जटिल, वेगवान, विखंडित, तकनीक और विज्ञान प्रधान जीवन के स्पंदन को व्यक्त कर सके। शायद यह स्पंदन दिल की धड़कन जैसा जीवंत नहीं है, संभव है कि यह घड़ी की टिक टिक जैसा एकरस, यांत्रिक और नीरस हो। आज का मनुष्य अनेक विषयों में जिस नैतिकता का पालन करता है अधिक समय नहीं हुआ है जब उसे अनैतिकता के रूप में व्याख्यायित किया जाता था। अब विज्ञान और तकनीकी के असर से जीवन की गति इतनी तीव्र और नियंत्रित है कि मनुष्य किसी एक भाव को आत्मसात नहीं कर पाता, जी नहीं पाता और उसे दूसरे भाव की ओर जबरन धकेल दिया जाता है। एक ऐसी पीढ़ी रूपाकार ले रही है जो प्रेम को जिए बिना प्रेम कर लेती है। घृणा को समझे बिना घृणा कर सकती है। हिंसा की आग में झुलस जाती है, झुलसा देती है किंतु उसी तरह अपरिवर्तित रहती है जैसे कोई निर्जीव अस्त्र हो। यह संवेदनहीनता इतनी सहज, इतनी सर्वव्यापी है कि इसे नव सामान्य व्यवहार का अंग मानकर स्वयं को इसके साथ अनुकूलित करना पड़ता है।
हम देखते हैं कि हिंदी को इस नए मनुष्य को अभिव्यक्त करने के लिए सक्षम और उससे भी अधिक इस नए मनुष्य के लिए रुचिकर बनाने की जद्दोजहद में बहुत समर्थ रचनाकार तथा आलोचक कथ्य,शिल्प और भाषा के ऐसे प्रयोगों में उलझ जाते हैं जो दयनीय रूप से असफल सिद्ध होते हैं। हो सकता है कि इस तरह की चुनौतियों से जूझकर विद्वज्जन स्वयं को इस ग्लानि से मुक्त कर लेते हों कि उन्होंने बतौर रचनाकार या आलोचक अपना धर्म निभाया किंतु उनका यह परिश्रम और पुरुषार्थ कितना हिंदी के आम प्रयोक्ता को मोहित और शिक्षित करता है और कितना नए मनुष्य को उस समय की याद दिलाता है जब वह अधिक मानवोचित विशेषताओं से युक्त था, कहना कठिन है।
विद्वजनों का यह बंद समाज कभी कभी आत्ममुग्ध और आत्मरति से ग्रस्त भी लगता है। हम तुकांत रचनाओं को, महाकाव्यों को, अप्रासंगिक कह खारिज कर सकते हैं, हम प्रेमचंद की ‘उदार और उदात्त नैतिकता’ को अव्यावहारिक आदर्शवाद बताकर उसका मखौल बना सकते हैं लेकिन इसी विशाल विश्व में हमारी उत्तर आधुनिक सोच से अछूती भी एक दुनिया है जो हमारे लिए इतिहास बन चुके साहित्यिक रूपों में रस तलाशती है।
जीवन की विराटता में तकनीकी के रथ पर सवार तूफानी गति से भागता नया मनुष्य भी है जो हमारी – ‘सुनो तो! रुको!! ठहरो!!!’- की पुकार को सुनने को तैयार नहीं है। हिंदी के स्वरूप को, उसकी अभिव्यक्तियों को, उसके शब्द भंडार और प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्तियां हमारी सदिच्छा से कहीं अलग बाजार और तकनीकी के द्वारा निर्धारित हो रही हैं।
हिंदी के कितने ही स्वरूप गढ़े जा रहे हैं-विज्ञापनों, टीवी सीरियलों,फिल्मों और वेब सीरीजों की अंग्रेजीनुमा हिंदी, दक्षिण की ब्लॉकबस्टर फिल्मों की डबिंग में प्रयुक्त दृश्यात्मक हिंदी, व्हाट्सएप पर स्टेटस सुझाने वाले एप्स के अनगढ़, नकलची शायरों और कवियों की कमजोर हिंदी, मंचों पर धमाल मचाने वाले और सोशल मीडिया व यू ट्यूब पर लाखों लोगों द्वारा देखे जाने वाले बेतुकी तुकबंदियों वाले कवियों की सजावटी-दिखावटी हिंदी, लाखों शिष्यों और श्रद्धालुओं को अपने सम्मोहन में रखने वाले धर्मगुरुओं एवं प्रवचनकत्तार्ओं की वाचाल हिंदी, 280 कैरेक्टर्स में अपनी बात रखने को मजबूर करने वाले ट्विटर की तीखी हिंदी, स्वयं को रचनाकार और पत्रकार समझने वाले लाखों युवाओं की फेसबुकिया हिंदी, टीवी चैनलों के महान प्रस्तोताओं की लड़खड़ाती-गड़गड़ाती हिंदी, हिंदी के तत्समीकरण के घातक प्रयासों को सोशल मीडिया के जरिये नए पंख लगाते घृणा के उपासकों की अन्य भाषाओं के शब्दों के स्पर्श से अपवित्र हो जाने वाली संकीर्ण हिंदी, विश्वविद्यालयों में हिंदी के जरिये अपनी आजीविका चलाते प्राध्यापकों की डराने वाली आडम्बरप्रिय, उत्सवधर्मी हिंदी, अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स को जल्दी से जल्दी पाठकों तक पहुंचाकर रुपया कमाने की हड़बड़ी से ग्रस्त प्रकाशकों के अंग्रेजीदां अनुवादकों की सतही हिंदी, बेरोजगारी से निजात ढूंढते वेबसाइट्स के कंटेंट राइटर्स की मजबूर हिंदी, आम लोगों की समझ में आने वाली हिंदी लिखने की कॉरपोरेट मालिक की सलाह का दबाव झेलते संपादकों की सतर्क हिंदी, छत्तीसगढ़ में दक्षिण भारतीय व्यंजन बेचते अन्ना की व्यवसाय सुलभ हिंदी, उड़ीसा और बंगाल से हिंदी पट्टी में काम की तलाश करते मजदूरों की डरी सहमी हिंदी, कॉल सेंटर में बैठे युवाओं की यांत्रिक हिंदी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रबंधकों को सिखाई गई चालाक हिंदी आदि आदि।
तकनीक ने हिंदी लिखने का हमारा तरीका बदला है। सबसे लोकप्रिय गूगल इंडिक की बोर्ड अंग्रेजी वर्णमाला की सहायता से हिंदी लिखता है। हमारे दिमाग में हिंदी के शब्दों के जो विम्ब बन रहे हैं उनकी रचना अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों द्वारा हो रही है। फॉन्ट उपयोगकर्त्ता की तकनीकी और भाषिक सीमाओं के कारण अनुस्वार और अनुनासिक का खुलकर गलत प्रयोग हो रहा है लेकिन पाठक संदभार्नुसार सही अर्थ समझ भी ले रहा है। आज की आपाधापी में विराम कहां इसलिए विराम चिह्न अप्रासंगिक हो गए हैं। गूगल कहता है-बोलने से सब होता है। लोग फोनेटिक टूल्स का जमकर उपयोग कर रहे हैं, बिना विराम चिह्नों के सही गलत लिखा जा रहा है और भावार्थ समझा भी जा रहा है। गूगल ट्रांसलेट तत्काल अन्य भाषा से हिंदी में अनुवाद कर रहा है, अनेक बार अर्थ का अनर्थ करने के बावजूद यह लोगों को उपयोगी लगता है और यह बेहतर भी होता जा रहा है।
लोकप्रिय बनाम गुणवत्तापूर्ण की बहस जासूसी और रूमानी उपन्यासों के जमाने से चलती रही है। हिंदी में ऐसे समर्थ लेखकों की बड़ी संख्या रही है जिन्होंने लोकप्रिय भी रचा और गुणवत्तापूर्ण भी। ऐसे लेखकों में जो सबसे पहला नाम स्मरण आता है वह है प्रेमचंद का। आज भी हिंदी में ऐसे लेखकों की कमी नहीं है किंतु अब योग्य रचनाकार होने से अधिक महत्वपूर्ण, अभिव्यक्ति के नए डिजिटल माध्यमों के संचालन में पारंगत होना तथा इनकी तासीर और मिजाज को समझना बन गया है। हमें उस मानसिकता से बाहर निकलना होगा जो लोकप्रिय लेखन को बाजारू समझती और कमतर आंकती है और विश्वास करती है कि गुणवत्तापूर्ण साहित्य को आम नासमझ और घटिया पाठक की स्वीकृति की कोई आवश्यकता नहीं है; जब इन आम पाठकों के दिमागी स्तर और समझ में सुधार आएगा तो उन्हें पता चलेगा कि हिंदी को विद्वानों ने आसमान की किन ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है। ‘लोकप्रिय‘ को भी समझना होगा कि यदि उसे कालजयी बनना है तो बिना गुणवत्ता के उसका काम नहीं बनने वाला।
विज्ञापन बोर्डों में हिंदी का हाल
ब्रजेश कानूनगो |
मिठाई और दवाई की दुकानों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है-‘मिठाईयां’, ‘दवाईयां’, जबकि मिठाई और दवाई शब्दों का बहुवचन करने पर ‘ई’ की बड़ी मात्रा छोटी ‘इ’ की मात्रा में बदलती है और सही शब्द बनाते हैं-‘मिठाइयां’ और ‘दवाइयां’।
भाषा विज्ञान और व्याकरण जहां टकराते हों वहां भाषा की शुद्धता एक बिंदु हो सकता है। स्थापित और निर्धारित प्रणाली के अनुसार शब्दों और सही वर्तनी (मात्राएं) के उपयोग के व्याकरणीय आग्रह होते हैं, जबकि भाषा विज्ञान के अनुसार जनस्वीकृति और लोगों के प्रयोग से किसी भी भाषा का विकास माना गया है। यद्यपि शब्दों के अपभ्रंश और बदले हुए स्वरूप मानक भाषा में स्वीकार किये जाते रहे हैं। लेकिन शब्दों को भ्रष्ट करने और भाषा को उसकी वैज्ञानिकता से दूर करने के अनायास प्रयास मन को बहुत पीड़ा पहुंचाते हैं।
हिंदी के बारे में एक बात बहुत महत्वपूर्ण है कि वह जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी भी जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो जैसा हम लिखते हैं वैसा ही हम उच्चारित भी करते हैं। लेकिन स्थिति यह है कि बच्चों को (कुछ हद तक बड़ों को भी) प्राय: स्वरों, व्यंजनों के संकेतों और ध्वनियों का सही-सही ज्ञान ही नहीं होता। उनके लिए ‘मात्र’ और ‘मातृ’ शब्दों में और उनके उच्चारण में कोई अंतर नहीं है। ‘गृह’ और ‘ग्रह’ भी उनके लिए एक ही होते हैं।
दूसरी ओर इस तरह के शब्दों के अर्थ और उनकी वर्तनियों का अंतर समझाने की किसी को चिंता नहीं है। हिंदी के सामान्य प्रयोग में इतनी अराजकता है कि जिसे जो लगता है , वह लिख देता है। विशेषत: होडिंर्गों, नामपट्टों, साइन बोर्डों, विज्ञापनों में शब्दों को भ्रष्ट करने का उपक्रम लगातार जारी है। यह अच्छी बात है कि हिंदी का प्रयोग हो रहा है, लेकिन क्या अब इतना और नहीं किया जा सकता कि अंगरेजी की तरह प्रयोग के पूर्व हिंदी के सही शब्द, वर्तनी और उसके अर्थ को शब्दकोश (कोष नहीं) में देख लिया जाए।
गलत शब्दों, त्रुटिपूर्ण वर्तनी के व्यापक प्रचार-प्रसार से होता यह है कि देखा-देखी बहुतायत से उन्ही का प्रयोग होने लगता है। हो यह रहा है कि सही शब्दों का स्थान गलत शब्द लेते जा रहे हैं। प्रिंटिंग टेक्नोलोजी और कम्प्यूटर टाइप सेटिंग , ग्राफिक्स आदि का विकास हुआ है लेकिन उस पर काम करने वाले टाइपिस्टों, फ्लेक्स बैनर बनाने वालों और पेंटरों का शब्द और भाषा ज्ञान सीमित ही होता है। केवल काम करवा लेने की हडबडी में विषय-वस्तु की भाषा के साथ खिलवाड़ को अनदेखा करना खतरनाक होगा।
सहज उपलब्ध उदाहरण है- मिठाई और दवाई की दुकानों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है-‘मिठाईयां’, ‘दवाईयां’, जबकि मिठाई और दवाई शब्दों का बहुवचन करने पर ‘ई’ की बड़ी मात्रा छोटी ‘इ’ की मात्रा में बदलती है और सही शब्द बनाते हैं-‘मिठाइयां’ और ‘दवाइयां’।
‘दुग्ध’ को सुधार कर लोग ‘दुध’ कर लेते हैं। जबकि दुग्ध का बदला हुआ सही शब्द ‘दूध’ है जोकि सही ध्वनि के अनुसार है। दूध-डेयरियों पर शायद ही कभी यह सही लिखा जाता होगा, यहां तक कि कई दुग्ध संघों के नाम पट्टों पर आसानी से ‘दुध संघ’ पढ़ा जा सकता है।
अपने आस-पास नजर दौडायेंगे तो सैकड़ों ऐसे शब्द दिखाई दे जायेंगे, जिन्हें पढ़ते हुए हिंदी की थोड़ी सी समझ रखने वाले किसी भी हिंदी-प्रेमी को अवश्य दु:ख होगा।
जन-जन की भाषा बनती हिंदी
हिंदी का करीब 1.2 लाख शब्दों का विशाल समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद अधिकांश लोग हिंदी लिखते और बोलते समय अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। भारतीय समाज में बहुत से लोगों की मानसिकता ऐसी हो गई है कि हिंदी बोलने वालों को वे पिछड़ा और अंग्रेजी में अपनी बात कहने वालों को आधुनिक का दर्जा देते हैं। आधुनिकता की ओर तेजी से अग्रसर कुछ भारतीय ही आज भले ही अंग्रेजी बोलने में अपनी आन, बान और शान समझते हों, परंतु सच यही है कि हिंदी ऐसी भाषा है, जिसे आज दुनिया के अनेक देशों में भी सम्मानजनक दर्जा मिल रहा है और हमारी राजभाषा हिंदी प्रत्येक भारतीय को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिला रही है। हिंदी विश्व की प्राचीन, समृद्ध एवं सरल भाषा है, जो न केवल भारत में बल्कि दुनिया के कई देशों में बोली जाती है। हिंदी भाषा को और ज्यादा समृद्ध बनाने के लिए ही प्रतिवर्ष 14 सितम्बर का दिन ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है और अगले 15 दिनों तक हिंदी पखवाड़े का आयोजन किया जाता है। अब प्रश्न यह है कि हिंदी दिवस प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को ही क्यों मनाया जाता है और इसे मनाए जाने की शुरूआत कब हुई? दरअसल भारत बहुत लंबे समय तक अंग्रेजों का गुलाम रहा और उस दौरान हमारे यहां की भाषाओं पर भी अंग्रेजी दासता का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। यही कारण रहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को ‘जनमानस की भाषा’ बताते हुए वर्ष 1918 में आयोजित ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ में इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। सही मायने में तभी से हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के प्रयास शुरू हो गए थे।
जब देश आजाद हुआ तो सर्वप्रथम 12 सितम्बर 1947 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने के प्रावधान का प्रस्ताव गोपालस्वामी आयंगर ने रखा था, जो स्वयं एक अहिंदीभाषी दूरदर्शी नेता थे। सभा की 12 से 14 सितम्बर तक चली तीनदिवसीय बहस में कुल 71 लोगों ने हिस्सा लिया था। लंबे विचार-विमर्श के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। उसके बाद भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के संदर्भ में अंकित कर दिया गया, ‘संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।’ इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
प्रतिवर्ष हिंदी दिवस 14 सितम्बर को ही मनाए जाने के लिए इसी दिन का चयन इसीलिए किया गया क्योंकि हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा देने के लिए पहली बार 14 सितम्बर 1949 को ही संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया था, इसलिए इस दिवस के आयोजन के लिए इसी तारीख को श्रेष्ठ माना गया। 14 सितम्बर 1953 को जब हिंदी भाषा को राजभाषा के रूप में लागू कर दिया गया तो गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लोगों ने इसका पुरजोर विरोध शुरू कर दिया और ब्रिटिश शासनकाल के दौरान मनोमस्तिष्क में रच-बस गई अंग्रेजी भाषा की वकालत करने लगे। उस विरोध को देखते हुए तब अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी जनसम्पर्क के लिए हिंदी को ही सबसे उपयोगी भाषा मानते थे। वर्ष 1917 का ऐसा एक किस्सा सामने आता है, जब कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन के मौके पर बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रभाषा प्रचार संबंधी कॉन्फ्रेंस में अंग्रेजी में भाषण दिया था और गांधी जी ने उनका वह भाषण सुनने के पश्चात उन्हें हिंदी का महत्व समझाते हुए कहा था कि वह ऐसा कोई कारण नहीं समझते कि हम अपने देशवासियों के साथ अपनी ही भाषा में बात न करें। गांधी जी ने कहा था कि अपने लोगों के दिलों तक हम वास्तव में अपनी ही भाषा के जरिये पहुंच सकते हैं। दरअसल हिंदी ऐसी भाषा है, जो प्रत्येक भारतीय को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाती है।
हिंदी का करीब 1.2 लाख शब्दों का विशाल समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद अधिकांश लोग हिंदी लिखते और बोलते समय अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। भारतीय समाज में बहुत से लोगों की मानसिकता ऐसी हो गई है कि हिंदी बोलने वालों को वे पिछड़ा और अंग्रेजी में अपनी बात कहने वालों को आधुनिक का दर्जा देते हैं। ऐसे में प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाने का उद्देश्य यही है कि इसके माध्यम से लोगों को हिंदी भाषा के विकास, हिंदी के उपयोग के लाभ तथा उपयोग न करने पर हानि के बारे में समझाया जा सके। लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाए कि हिंदी उनकी राजभाषा है, जिसका सम्मान और प्रचार-प्रसार करना उनका कर्त्तव्य है और जब तक सभी लोग इसका उपयोग नहीं करेंगे, इस भाषा का विकास नहीं होगा।




