Monday, April 20, 2026
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हत्यारा बना अवैध खनन

Samvad


PANKAJ CHATURVEDIहरियाणा के नूंह जिला के तावडू थाना क्षेत्र के गांव पचगांव में अवैध खनन की सूचना मिलने पर कार्यवाही को गए डीएसपी सुरेंद्र विश्नोई को 19 जुलाई को जिस तरह पत्थर के अवैध खनन से भरे ट्रक से कुचल कर मार डाला गया, अभी मामले की जांच पूरी हुई नहीं और 10 सितम्बर को नूह में एक अवैध खनन स्थल पर छापेमारी के दौरान अज्ञात लोगों ने पुलिस और जिला खनन विभाग की संयुक्त टीम पर हमला कर दिया। एक पुलिस वाला घायल भी हुआ। उससे एक बार फिर खनन माफिया के निरंकुश इरादे उजागर हुए हैं। यह घटना अरावली पर्वतमाला से अवैध खनन की है। वही अरावली, जिसका अस्तित्व है तो गुजरात से दिल्ली तक कोई 690 किलोमीटर का इलाका पाकिस्तान की तरफ से आने वाली रेत की आंधी से निरापद है और रेगिस्तान होने से बचा है। वही अरावली है, जहां के वन्य क्षेत्र में कथित अतिक्रमण के कारण पिछले साल लगभग इन्हीं दिनों सवा लाख लोगों की आबादी वाले खोरी गांव को उजाड़ा गया था। यह वही अरावली है, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर 2018 में जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? जब चौड़ी सड़कें, गगनचुंबी इमारतें किसी क्षेत्र के विकास का एकमात्र पैमाना बन जाएं तो जाहिर है कि इसका खामियाजा वहां की जमीन, जल और जन को ही उठाना पडेगा। निर्माण कार्य से जुडी प्राकृतिक संपदा का गैरकानूनी खनन खासकर पहाड़ से पत्थर और नदी से बालू, अब हर राज्य की राजनीति का हिस्सा बन गया है। पंजाब हो या मध्य प्रदेश या बिहार या फिर तमिलनाडु, रेत खनन के आरोप प्रत्यारोप से कोई भी दल अछूता नहीं है। असल में इस दिशा में हमारी नीतियां ही- ‘गुड खा कर गुलगुले से परहेज’ की हैं।

जरा देखिये-बरसात के दिनों में छोटी-बड़ी नदियां सलीके से बह सकें, उनके मार्ग में नैसर्गिक गतिविधियां हो सकें, इस उद्देश्य से राष्ट्रीय हरित न्यायालय ने समूचे देश में नदियों से रेत निकालने पर 30 जून से चार महीने के लिए पाबंदी लगाई हुई है। लेकिन क्या इस तरह के आदेश जमीनी स्तर पर क्रियान्वयित होते हैं? बस राज्य, शहर, नदी के नाम बदलते जाएं, अवैध खनन सारे देश में कानूनों से बेखबर ऐसे ही होता है। यह भी समझ लें कि इस तरह अवैध तरीके से निकाले गए पत्थर या रेत का अधिकांश इस्तेमाल सरकारी योजनाओं में होता है और किसी भी राज्य में सरकारी या निजी निर्माण कार्य पर कोई रोक है नहीं। सरकारी निर्माण कार्य की तय समय-सीमा भी है-फिर बगैर रेत-पत्थर के कोई निर्माण जारी रह नहीं सकता। जाहिर है कि कागजी कार्यवाही ही होगी और उससे प्रकृति बचने से रही।

यह किसी से छुपा नहीं था कि यहां पिछले कुछ सालों के दौरान वैध एवं अवैध खनन की वजह से सोहना से आगे तीन पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं। होडल के नजदीक, नारनौल में नांगल दरगु के नजदीक, महेंद्र्रगढ़ में ख्वासपुर के नजदीक की पहाड़ी गायब हो चुकी है। इनके अलावा भी कई इलाकों की पहाड़ी गायब हो चुकी है। रात के अंधेरे में खनन कार्य किए जाते हैं। सबसे अधिक अवैध रूप से खनन की शिकायत नूंह जिले से सामने आती है। पत्थरों की चोरी की शिकायत सभी जिलों में है। वैसे तो भूमाफिया की नजर दक्षिण हरियाणा की पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला पर है, लेकिन सबसे अधिक नजर गुरुग्राम, फरीदाबाद एवं नूंह इलाके पर है। अधिकतर भूभाग भूमाफिया वर्षों पहले ही खरीद चुके हैं। जिस गांव में डीएसपी विश्नोई जहां शहीद हुए या हाल ही में जहां सरकारी टीम पर हमला हुआ, असल में वे गांव भी अवैध हैं। अवैध खनन की पहाड़ी तक जाने का रास्ता इस गांव के बीच से एक संकरी पगडंडी से ही जाता है। इस गांव के हर घर में डम्पर खड़े हैं। यहां के रास्तों में जगह जगह अवरोध हैं। गांव से कोई पुलिस या अनजान गाड़ी गुजरे तो पहले गांव से खबर कर दी जाती है, जो अवैध खनन कर रहे होते हैं। पहाड़ी पर भी कई लोग निगरानी करते हैं और सूचना देते हैं कि पुलिस की गाड़ी आ रही है।

भले ही अरावली गैर खनन क्षेत्र घोषित हो, लेकिन यहां क्रशर धड़ल्ले से चल रहे हैं और क्रशर के लिए कच्चा माल तो इन अवैध खनन से ही मिलता है। हरियाणा- राजस्थान सीमा से सटे जमालपुर के बीवन पहाड़ी पर ही 20 क्रशर हैं, जिनके मालिक सभी रसूखदार लोग हैं। सोहना के रेवासन जोन में आज भी 15 क्रशर चालू हैं। हालांकि सभी क्रशर मालिक कहते हैं कि उनको कच्चा माल राजस्थान से मिलता है। अभी सात दिन पहले ही आगरा का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें अवैध खनन वाली तेरह टैÑक्टर ट्रोली टोल प्लाजा का बेरियर तोड़ कर निकल गर्इं। आखिर इतनी हिम्मत केवल ट्रैक्टर ड्राइवर में होती नहीं। इतना दुसाहस करने वाले को भरोसा रहता है कि उसका रसूख इस अपराध के परिणाम से उन्हें बचा लेगा।

नदी के एक जीवित संरचना है और रेत उसके श्वसन तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा। भीषण गर्मी में सूख गए नदी के आंचल को जिस निर्ममता से उधेड़ा जा रहा है, वह इस बार के विश्व पर्यावरण दिवस के नारे-‘केवल एक धरती’ और ‘प्रकृति के साथ सामंजस्य से टिकाऊ जीवन’ के बिलकुल विपरीत है। मानव जीवन के लिए जल से ज्यादा जरूरी जल-धारांए हैं। नदी महज पानी के परिवहन का मार्ग नहीं होती, वह धरती के तापमान के संतुलन, जल-तंत्र के अन्य अंग जैसे जलीय जीव व पौधों के लिए आसरा होती है।

लेकिन आज अकेले नदी ही नहीं मारी जा रही, उसकी रक्षा का साहस करने वाले भी मारे जा रहे हैं। साल 2012 में मध्य प्रदेश के मुरेना में नूह की ही तरह युवा आइपीएस अफसर नरेंद्र कुमार को पत्थर से भरे ट्रैक्टर से कुचल कर मार डाला था। कुछ दिन वहां सख्ती हुई, लेकिन फिर खनन-माफिया यथावत काम करने लगा। उसी चंबल में 2015 में एक सिपाही को को मार डाला गया था। इसी मुरेना में 2018 में एक डिप्टी रेंजर की ह्त्या ट्रैक्टर से कुचल कर की गई। आगरा, इटावा, फतेहाबाद से ले कर गुजरात तक ऐसी घटनाएं हर रोज होती हैं। कुछ दिन उस पर रोष होता है और यह महज एक अपराध घटना के रूप में कहीं गुम हो जाता है।

यह जान लें की जब तक निर्माण कार्य से पहले उसमें लगने वाले पत्थर, रेत, र्इंट की आवश्यकता का आकलन और उस निर्माण का ठेका लेने वाले से पहले ही सामग्री जुटाने का स्रोत नहीं तलाशा जाता, अवैध खनन और खनन में रसूखदार लोगों के दखल को रोका नहीं जा सकता। आधुनिकता और पर्यावरण के बीच समन्वयक विकास की नीति पर गंभीरता से काम करना जरूरी है। अवैध खनन जंगल, नदी, पहाड़, पेड़ और अब जन के जान का दुश्मन बन चुका है। यह केवल कानून का नहीं, मानवीय और पर्यावरणीय अस्तित्व का मसला है।


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