आठ सितंबर, 2025 नेपाल के इतिहास में लिखे जाने वाला सबसे काला दिन, जिसने ऐसी कई मासूम जानें ले लीं, जो ठीक से खिले भी न थे! उन बच्चों का कसूर क्या था? यही न कि उन्होंने अपने हक के लिए आवाज उठाई थी?
क्यों सरकार ने उनकी एक बात न सुनी और न ही कोई जवाब दिया और सरेआम उनके सीने पर गोली दाग दी! ये कैसी बर्बरता है? करोड़ों नेपाली जनता पूछना चाहती है कि जब हम अपनी बात कह ही न सकें तो कैसा लोकतंत्र?
इस घटना से पहले सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की किसकी हिम्मत थी? इक्का-दुक्का लोगों ने उठाई भी तो या तो वो जेल गया या तो वो जान से गए। भ्रष्ट नेताओं का यही तो कथन है, ‘भूखी जनता मरती है तो मरने दो,पर हमें चैन से जीने दो।’ वो जनता के भूखे पेट पर अपनी रोटी सेंकते रहें, पर जनता कुछ ना बोले। यही तो कारण था नेपाल में अमीर दिन प्रति दिन अमीर होते जा रहे थे और गरीब दिनों-दिन और गरीब। ऐसी स्थिति में देश की हालत बदतर होते जा रही थी, पर खामोशी का मतलब कायरता नहीं होता, ये तो तूफान के आने से पहले का खामोशी थी।
ये जो दर्जनों जाने गई, सैकड़ों घायल हुए, ढेरों सरकारी संपत्ति क्षतिग्रस्त हुई, दर्जनों सार्वजनिक संपत्ति में आग लगी, क्या इसका प्रमुख कारण सिर्फ सोशल मीडिया पर बैन था या सालों से चली आ रही निरंकुश सत्ता, असंवेदनशील सरकार और तानाशाह परमसत्तावादी शासन का दमन था या नेपाली जनता के वर्तमान और भविष्य कुचला और मसला जाने का उत्पीड़न था? ‘अपना काम है बनता, भाड़ में जाये जनता!’ नेताओं के बच्चे ब्रिटेन, फ्रांस देशों के बड़े-बड़े पांच सितारा होटल में जश्न करें और आम जनता के बच्चे हजारों और लाखों की तादाद में एशियाई या पड़ोसी मुल्कों में पढ़ाई और रोजी-रोटी के लिए मशक्कत करें, यह सब देखकर नेता- राजनेताओं ने आंख पर पट्टी बांध ली थी। क्यों किसी नेता को ये चिंता ना हुई कि युवा पलायन करेंगे तो देश विकसित कैसे होगा? फिर भी निराश देश को सोशल मीडिया का सहारा था क्योंकि सोशल मीडिया के द्वारा ही वो अपनी बात दुनिया के सामने रख पाते थे, पर अंधी सरकार ने अनर्गल बहाना बनाकर उस पर भी बैन लगा दिया और उसे लगा कि वो अपनी मनमानी करने में सफल हो जाएगा, पर वो श्री लंका और बंगलादेश का हाल भूल गया कि अति का अंत होता है, वो ये भी भूल गया कि ये जनता है और जनता जनार्दन होती है और उस पर से युवा जोश।
सोशल मीडिया तो महज एक चिंगारी थी, दरअसल युवाओं के सीने में नेताओं के प्रति आक्रोश की ज्वाला धधक रही थी। जब-जब युवा ने कलम छोड़कर विद्रोह की मशाल उठाई है तब-तब क्रांति आई है। आज के वर्चुअल मॉर्डन समय में जहां बच्चे के एक हाथ में दूध की बोतल होती है और दूसरे हाथ में मोबाइल होती है, और आज की नई जेनरेशन दादी-नानी से शूर-वीर और बलिदानों की कहानी नहीं सुनती है, वो तो रंग-बिरंगी रील्स देखती है। फिर कैसे और किसने जलाई इनके अंदर अपने देश प्रति क्रांति लाने का अलख? जवाब है- जेन जेड पीढ़ी। फिर सवाल ये उठता है कि जेन जेड क्या है और इसकी मांगें क्या हैं? असल में ये वो पीढ़ी है जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है। यानी आज के वक्त में इनकी उम्र करीब 13 से 28 साल के बीच है, इस जेनरेशन को सबसे ज्यादा ‘डिजिटल नेटिव्स’ कहा जाता है क्योंकि इनका बचपन और जवानी ज्यादातर इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बीती है या बीत रहा है। जेन जेड ने सोशल मीडिया के जरिये नई जेनरेशन के साथ संगठन बनाया और अपनी मांग सरकार के समक्ष रखने की अपील की थी वो इस प्रकार से है। संसद भंग करना, सांसदों का सामूहिक इस्तीफा, गोलीबारी का आदेश देने वाले और हिंसक दमन करने वाले उच्च पदस्थ अधिकारियों का तत्काल निलंबन, हमारे द्वारा अनुशंसित व्यक्ति के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन, अंतरिम सरकार के तहत शीघ्र चुनाव।
इस पीढ़ी का मेन हेड कौन है इसका खुलासा अभी तक नहीं हो पाया है। जेन जेड ने बहुत शांति और शालीन तरीके से अपनी मांग की अपील की थी पर सफल ना हो सका, कुछ उग्रवादी के नापाक इरादों के कारण ये विद्रोह की चिंगारी आग का रूप ले ली, जिसकी चपेट ने पूरे नेपाल को ध्वस्त कर दिया। नेपाल के कई ऐतिहासिक धरोहर, कई शॉपिंग मॉल, सरकारी कार्यलय, अनगिनत गाड़ियां, यहां तक कि नेपाली जनता का अथाह धन भी इस आगजनी में स्वाहा हो गया। देश और जनता दोनों खून के आंसू रो रहे हैं। आज जो अराजकता का धुआं फैला हुआ है, उसमें नेपाल का भविष्य धुंधला नजर आ रहा है। अभी तो फिलहाल देश की बागडोर यहां के जाबाज सिपाहियों के हाथ में है पर कल क्या होगा? कौन देश पर शासन करेगा? लोकतंत्र आएगा या फिर से राजतंत्र, ये कोई नहीं जानता है! बस दुआ है मेरा देश नेपाल फिर से संवर जाए और रूठी हुई खुशहाली लौट आए।

