तुर सुजान कहते हैं कि दुनिया की कहानी, कहानी के तत्वों की भांति प्रारंभ, विकास, चरमोत्कर्ष और अंत के रूप में अनेक बार दोहराई गई है। कहा तो यहां तक जाता है कि जो कुछ आज हो रहा है और आगे जाकर होगा, ऐसा अनेक बार हो चुका होता है और आगे भी होता रहेगा। इसमें किसी का कोई दखल कोई भी मायने नहीं रखता। जहां तक कुछ होने या नहीं होने में आदमी की भूमिका का सवाल है, तो वह कर्ता नहीं अपितु निमित्त ही है। इस दृष्टि से आदमी में इस बनती बिगड़ती दुनिया में बात-बात का श्रेय लेने की होड़ नागवार गुजरती है। लेकिन आम आदमी आध्यात्मिक दृष्टि से इतनी गहराई में नहीं उतरता और कठपुतली को नायक समझने की गंभीर भूल कर बैठता है। खैर।
लेकिन अधिकांश मामलों में देखा गया है कि ‘मैं’ का भाव आदमी के आत्मविश्वास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। इसके चलते आदमी के अंतर्मन की ऊर्जा और चेतना में इस कदर तीव्र संचार होता है कि कभी-कभी तो आदमी अपने बूते से बाहर की बात कर जाता है या कह जाता है। जिसका जनमानस पर कुछ ऐसा रुआब पड़ता है कि संबंधित शख्सियत को पालनहार और तारणहार तक मान लिया जाता है। वैसे जिनका मनोबल कमजोर होता है, वह दूसरों की दया पर ही निर्भर रहा करते हैं। इसके विपरीत आत्मविश्वास की प्रबलता कभी-कभी तो नियति तक को
चुनौती दे बैठती है। अनाधिकार चेष्टा इनकी रग-रग में समाहित हुआ करती है।
आजकल तो विशेष रूप से राजनीति में ऊलजुलूल विचार और व्यवहार का अनुसरण करने की मनोवृत्ति भी दिखाई देती है। जिसे आमतौर पर अंधभक्त और अंध समर्थक की परिभाषा के तहत चिन्हित किया जा सकता है। ठीक इसी तरह राजनीति के साथ-साथ सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जगत में भी एक प्रकार से कठपुतली के खेल का दृश्य दिखाई देता है। जिसके चलते जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है, वह वास्तविक नहीं होता। और जो वास्तविक होता है वह प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर नहीं होता। लेकिन आम आदमी अपनी निजी समस्याओं में ही इस कदर उलझा हुआ रहता है कि कब, कहां और कैसा क्या हो रहा है ? इस विषय पर अधिक माथापच्ची नहीं करता।
यही कारण है कि हमारे यहां हर किसी की दुकानदारी धड़ल्ले से चल रही है। अगर आदमी में सेल्समैनशिप के गुण हैं, तो वह किसी भी क्षेत्र में अपना परचम लहरा सकता है। आजकल हर तरह की क्रिया में आर्थिक क्रिया का अंश दिखाई देता है। इस अर्थ में अब अर्थशास्त्र के दायरे में राजनीति ही नहीं अपितु सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी समावेश कर लिया जाना चाहिए। दरअसल आजकल के दौर में आदमी का दृष्टिकोण ही आर्थिक हो गया है। व्यवहार में तो नजदीकी रिश्तों की भी आर्थिक परिभाषा की जाने लगी है। जिस दिन राजनीति, समाज, धर्म और संस्कृति से अर्थ निकल जाएगा तब इसका असल ‘अर्थ’ आम आदमी के अंतर्मन में दिव्य आनंद की असीम ऊर्जा का संचार कर सकेगा।

