
मध्यपूर्व जिसे भारत के संदर्भ में पश्चिमी एशिया कहा जा सकता है, सातवें दशक से ही युद्ध, नरसंहार, भूख और साजिशों का केंद्र बना हुआ है। इसकी आग दो देशों या दो कौम के अस्तित्व बचाओ संकट से आरंभ होकर आज लगभग एक दर्जन देशों में फैल चुकी है। इस्राइल और फिलिस्तीन ने अपनी अपनी भूमि को बचाने के लिए जब संघर्ष आरंभ किया तो यह लगा था कि यह एक स्थानीय झड़प होकर रह जायेगी लेकिन धीरे-धीरे इसमें मिस्र, सीरिया, लेबनान आदि देश भी शामिल हो गए। उसके बाद ईरान-ईराक, ईराक-कुवैत, ईराक और नाटो संगठन, ईरान इस्राइल आदि देशों में जंग हुई और मध्यपूर्व सतत् तबाही का एक मंजर बनकर रह गया।
अमरीका ने इन झगड़ों में सक्रिय भूमिका निभाई। या यों कह सकते हैं कि दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर की भूमिका निभाई। आज की तारीख में इस क्षेत्र के निवासियों के लिए अमरीका एक काल बनकर उभरा है जिसने इस्राइल की खतरनाक विस्तारवादी आकांक्षाओं को पर लगा दिये हैं।
दो दशक पहले तक एक और महाशक्ति तत्कालीन सोवियत संघ ने भी इराक और सीरिया के माध्यम से यहां अपना दबदबा रखा हुआ था लेकिन सोवियत संघ के बिखरने से शक्तियों का यह संतुलन भी बिखर गया और सद्दाम हुसैन तथा हाफिज असद के पराभाव के बाद ये दोनों देश भी अमरीकी नियंत्रण में चले गए। तेल उत्पादक अरब देश तो पहले से ही सऊदी अरब के नेतृत्व में अमरीका की गोदी में बैठकर ऐश कर रहे थे। ऐसे में फिलिस्तीन और ईरान ही ऐसे दो देश थे जो अपनी स्वतंत्रता को कायम रखते हुए अमरीका और इस्राइल के विस्तारवादी अभियान से अपने स्वयं के संसाधनों के बल पर जूझ रहे थे और मुस्लिम देशों तथा अरब देशों का उन्हें कोई सहयोग नहीं मिल रहा था। यासिर अराफात के बाद से फिलिस्तीन भी कमजोर हो गया और हमास, हिजबुल्लाह तथा लेबनानी आतंकी समूहों ने वहां काफी कुछ अतिक्रमण कर लिया। अब रह गया ईरान जो अमरीका, इजरायल तथा नाटो देशों की आंख की किरकिरी बना हुआ था और शिया मुस्लिम बाहुल्य देश होने के कारण सुन्नी अरब देशों को भी बहुत ज्यादा पसंद नहीं रहा है। उत्तरी कोरिया और चीन ने ईरान को मिसाइल एवं रेडार टेक्नोलॉजी में मदद की और रूस ने युद्धक विमान, पनडुब्बी तथा टैंक प्रोवाइड किए। ईरान के वैज्ञानिकों ने चीनी कोरियन तकनीक में अपनी तकनीक मिलाकर विश्व की बेहतरीन मिसाइलें तैनात कर ली हैं जिनके बूते आज वो एक साथ अमरीका, इस्राइल और अरब देशों को दहला रहा है। हमलावर द्रोण तकनीक में भी ईरान ने अमेरिका इस्राइल को पीछे छोड़ रखा है।
अब मूल बात यह है कि ईरान कब तक डटा रहेगा और इस युद्ध का परिणाम क्या होगा? यह हकीकत है कि अमरीका इस समय विश्व की सर्वश्रेष्ठ सैन्य ताकत है और उसके पास तकनीकी और हथियारगत श्रेष्ठता भी है। इसके विपरीत ईरान एक क्षेत्रीय देश है जो सीमित आर्थिक संसाधनों के बल पर यह युद्ध लड़ रहा है । लेकिन उसकी मिसाइल क्षमता और पैदल सेना इस समय बहुत मजबूत है और अमरीका तथा इजरायल कभी भी ईरानी क्षेत्र में अपनी आर्मी को घुसाने की गलती नहीं करेंगे। ईरान की वायुसेना और नौसेना बहुत कमजोर है और युद्धक विमानों के नाम पर उसके पास पुराने पड़ चुके रूसी मिग 29 विमान ही हैं। नौसेना में भी उसके पास कुछ लघु पनडुब्बी तथा युद्धक जहाज ही हैं जिनके बल पर वह केवल हार्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी ही कर सकता है और वह उसने कर भी ली है और इसके कारण विश्व तेल व्यापार को दिक्कतें आना शुरू हो चुकी हैं।
यह युद्ध शीतयुद्ध के बाद पूरे विश्व को फिर से दो भागों में बांटने वाला सिद्ध होने जा रहा है। यह पहली बार हुआ है कि नाटो देशों ने अमरीका के इस कदम का खुलकर समर्थन नहीं किया और ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने तो खुलकर कह दिया है कि इस युद्ध में उलझकर वह इराक वाली गलती नहीं दोहरायेगा। फ्रांस ने इस युद्ध को गैर जरूरी बतलाया है। सबसे बड़ी बात यह है कि जहां एक और अरब देशों के शासक परंपरानुसार अमरीका इस्राइल का समर्थन कर रहे हैं वहीं वहां की जनता इसके विरुद्ध उठ खड़ी हुई है और वहां खामनई की हत्या के विरोध में आंदोलन हो रहे हैं। मध्यपूर्व से बाहर के ज्यादातर देश इस युद्ध में तटस्थता दिखा रहे हैं और समय का इंतजार कर रहे हैं। फिर भी यह कहा जा सकता है कि ईरान के पास इस समय खुला समर्थन केवल रूस चीन और उत्तरी कोरिया का ही है और भारत पाकिस्तान जैसे उसके परंपरागत दोस्त अमरीका के दबाव में उससे विमुख हो चुके हैं। लेकिन यह पूरी संभावना है कि यदि यह लड़ाई लंबी चली तो निश्चित ही ट्रम्प और अमरीका इसमें अफगानिस्तान और वियतनाम की तरह कमजोर पड़ेंगे और उस स्थिति में जो तटस्थ राष्ट्र हैं उनका झुकाव धीरे-धीरे ईरान, चीन, रूस के त्रिकोण की तरफ बढ़ना आरंभ होगा।

