Saturday, March 7, 2026
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सांप्रदायिकता के कई रूप

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हम को मालूम है जन्नत की हकीकत, लेकिन दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है-गालिब। लगभग दो सप्ताह बीतने को है, जब सूबा बंगाल की राजधानी कोलकाता इसकी गवाह बनी थी, जब आज के समय में उर्दू के सबसे बड़े शायरों में शुमार जावेद अख्त़र अचानक निशाने पर आ गए थे। कहने को मामला ‘हिन्दोस्तानी सिनेमा में उर्दू’ के मसले पर आयोजित चार दिनी सेमिनार था, जो ‘पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी’ द्वारा आयोजित हो रहा था (11-14 सितम्बर 2025) और जिसके लिए नामचीन आलिमों को, लेखकों-कलाकारों को बुलाया गया था और साथ में एक मुशायरे का भी आयोजन था। इस प्रोग्राम को आखिरी लमहों में अपरिहार्य कारणों से टाल दिया गया था। अकादमी की तरफ से कोई वजह नहीं बताई गयी, अलबत्ता जाहिर था कि आनन फानन में इस बदलाव के पीछे दो अहम इस्लामिक संगठनों जमियत उलेमा-ए-हिन्द और वाहयादिन फाउंडेशन द्वारा दी गई चेतावनी थी।

खबरों के मुताबिक उन्हें जावेद अख्तर के इस सेमिनार में शिरकत करने पर गहरा एतराज था क्योंकि धर्म को लेकर उनके दृष्टिकोण से उन्हें एतराज था। उनका आरोप था कि वह ‘धर्म और खुदा के खिलाफ बोलते हैं।’ गौरतलब है कि जनाब जावेद अख्त़र खुद घोषित नास्तिक हैं और वह सार्वजनिक मंचों से इस बात को कहते भी हैं और यही बात इन इस्लामी जमातों के अगुवाओं को चुभ गयी थी। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि मुशायरे की सदारत में उनकी नास्तिकता का सवाल कहां बाधा बनता है। इन संगठनों ने यहां तक धमकी दी थी कि अगर सरकार उनकी मांग नहीं मानती है, तो वे वैसा ही राज्यव्यापी आंदोलन शुरू कर देंगे-जैसा तस्लीमा नसरीन के खिलाफ किया गया था और जैसा कि सभी जानते हैं, इस आंदोलन के कारण उन्हें वर्ष 2007 में राज्य छोड़ना पड़ा था। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती थीं, क्योंकि राज्य विधानसभा के चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तमाशे का परिणाम यह है कि इसने धर्म और नैतिकता के स्वयंभू संरक्षकों की आवाज को केंद्र में ला दिया है, उनके संकीर्ण विश्व दृष्टिकोण को उजागर कर दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि अख्तर के कोलकाता कार्यक्रम के स्थगित/प्रभावी रूप से रद्द होने से चरम हिंदुत्ववादियों को बेहद खुशी हुई होगी। इन लोगों के लिए भी अख्तर हिंदुत्व के मित्र नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के उनके प्रयासों की आलोचना और निंदा की है। जैसा कि पुरानी कहावत है, ‘एक ही पंख के पक्षी एक साथ रहते हैं’, धार्मिक वर्चस्व वादियों के बीच भी इसी प्रकार की तनातनी देखने को मिलती है-भले ही वे एक-दूसरे के प्रति स्पष्ट विरोध रखते हों-विभिन्न अवसरों पर।

धार्मिक वर्चस्ववादियों के बीच भी कई मौकों पर एक-दूसरे के स्पष्ट विरोध के बावजूद, इसी तरह की एक अजीबोगरीब तनातनी देखने को मिलती है। ऐसी ‘उद्देश्य की एकता’ विशेष रूप से तब देखने को मिलती है, जब राज्य ऐसे कानूनों का मसौदा तैयार करता है, जो किसी की आस्था को प्राथमिकता देने से इनकार करते हैं। ऐसे सभी कदम जो मूलत: धर्म को राजनीति से अलग करने को बढ़ावा देते हैं, उनके लिए अभिशाप हैं। चूँकि वे स्वयं को ‘अपने समुदाय’ का एकमात्र प्रवक्ता मानते हैं, इसलिए वे हमेशा आपत्तियां उठाने में सबसे आगे रहते हैं। पंजाब सरकार जिस ‘ईशनिंदा विरोधी कानून’ को लागू करना चाहती है, उस पर चल रही बहस पर गौर कीजिए। जैसा कि हम जानते हैं, प्रस्तावित पंजाब पवित्र धर्म ग्रंथों के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम विधेयक, 2025 (पीपीओएचएस अधिनियम) को हाल ही में राज्य विधानमंडल ने आगे की चर्चा के लिए एक समिति को भेज दिया है।

हमारे संविधान के विशेषज्ञों या हमारे संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को कायम रखने के इच्छुक लोगों/संस्थाओं ने ऐसे कदमों का-‘ईशनिंदा कानून की तरह’ के कदम का-कड़ा विरोध किया है, लेकिन न तो हिंदुत्व दक्षिणपंथियों ने और न ही मुस्लिम दक्षिणपंथियों ने इस कदम का विरोध करना आवश्यक समझा है। इस कानून की सभी धर्मनिरपेक्ष आलोचनाएं उनके कानों को संगीत की तरह लगती है : जैसे कि इस कानून की यह आलोचना कि यह कानून राज्य को धर्म से और अधिक दूर करने के बजाय, यह कानून ‘सांप्रदायिकता की पकड़ को और मजबूत करेगा, तथा सभी पक्षों पर धार्मिक चरमपंथियों के हाथ मजबूत करेगा।’ इसी तरह, ‘अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के खिलाफ, उन्हें परेशान करने, बदला लेने और व्यक्तिगत व व्यावसायिक झगड़ों को निपटाने के लिए — ये सभी मामले, जो ईशनिंदा से पूरी तरह असंबद्ध हैं’, जैसे शब्दों का दुरुपयोग उन्हें अटपटा नहीं लगता।

शायद, हम सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के उस फैसले को भी याद कर सकते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अगुआई में एक बेहद प्रगतिशील फैसला दिया था और जिसने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को मूलत: पलट दिया था। याद करें कि इस दौरान कैसे दक्षिणपंथी लोगों ने और भगवा से लेकर हरे तक की विभिन्न विचारधाराओं के रूढ़िवादी तत्वों ने इस प्रगतिशील फैसले का विरोध करने के लिए हाथ मिलाया था।

बाद में, जब सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को पुन: अपराध घोषित कर दिया, तो अनेक स्वयंभू धर्मगुरुओं और नैतिकता के पैरोकारों ने स्वयं को निर्दोष महसूस किया और यहां तक कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर भारतीय दंड संहिता की धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया, क्योंकि उनके अनुसार यह ‘न केवल इस देश की पूर्वी परंपराओं, नैतिक मूल्यों और धार्मिक शिक्षाओं के अनुरूप था, बल्कि यह पश्चिमी संस्कृति के आक्रमण और पारिवारिक व्यवस्था तथा सामाजिक जीवन के ताने-बाने के विघटन की आशंकाओं को भी दूर करता है।

यह प्रसंग 80 साल पहले के उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत अभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के अधीन था और शारदा अधिनियम लागू करने की बात चल रही थी, जिसके तहत 14 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर रोक लगा दी गई थी। आज बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि इस अधिनियम को लागू करने की शुरुआती प्रेरणा फुलमोनी नामक एक बाल-वधू की मृत्यु पर मुखर तबकों द्वारा महसूस की गई घृणा से आई थी, जिसकी शादी अपने से कहीं ज्यादा उम्र के व्यक्ति के साथ कर दी गई थी। तब ‘पवित्र’ और ‘दोनों धर्मों के पवित्र’, यानी हिंदू और मुसलमान, एकजुट होकर यह घोषणा करने आए थे कि वे ‘अपनी गहरी आस्थाओं और अपने सबसे प्रिय अधिकारों पर इस तरह का आघात’ नहीं होने देंगे।

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