Friday, March 6, 2026
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‘नो किंग्स’ आंदोलन ने ट्रंप को नकार दिया

लोकतंत्र के अलमबरदार माने जाने वाले भारत सरीखे देश में किसी को ‘नो किंग्स’ आंदोलन की कोई खास खबर नहीं है, जबकि आम नागरिकों के इसी विरोध प्रदर्शन ने सर्वशक्तिमान माने जाने वाले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की खुद उनके और दुनियाभर के देशों में भद्द पिटवा दी है। क्या और क्यों हो रहा है, यह आंदोलन?

रमाकांत नाथ

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ अमेरिका में ही आंदोलन तेज हो रहा है, हालांकि उनके दूसरे कार्यकाल को अभी केवल सात महीने ही हुए हैं। 14 जून 2025 को हुआ ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘नो डिक्टेटर’ या ‘नो टायरेंट्स’ विरोध के रूप में जाना जाता है, प्रदर्शनों की एक लंबी श्रृंखला थी। बडे पैमाने पर ट्रम्प की नीतियों और उनकी कार्रवाइयों के खिलाफ, जिसमें उनकी कथित फासीवादी प्रवृत्ति और लोकतांत्रिक पतन शामिल है, यह विरोध हुआ था। ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन अमेरिकी सेना की 250 वीं वर्षगांठ परेड और ट्रम्प के 79 वें जन्मदिन पर हुआ था। आयोजकों के मुताबिक फिलाडेल्फिया में प्रमुख कार्यक्रम सहित 2100 से अधिक शहरों और कस्बों में 50 लाख से अधिक लोगों के अलावा 20 अन्य देशों में यह आंदोलन किया गया। ट्रम्प के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन ने उनकी योग्यता, पारदर्शिता और कामकाज पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) के नारे के साथ सत्ता में आए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब अमेरिका और उसके करोड़ों नागरिकों के लिए कई परेशानियों का सबब बन गए हैं। सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों में ट्रम्प ने दुनिया में शांति स्थापित करने, गाजा में फिलिस्तीन-इजरायल युद्ध और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का वादा किया था, लेकिन दुनिया में शांति स्थापित नहीं हो पाई, उलटे कई देशों के बीच नए युद्ध शुरू हो गए।

ट्रंप द्वारा विश्व व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने और ‘व्यापार कर’ (टैरिफ) का भय दिखाकर अमेरिका को पुनर्प्रतिष्ठित करने का जो प्रयास किया जा रहा है, उससे विश्व में आर्थिक असमानता बढ़ रही है और विश्व अर्थव्यवस्था में एक और मंदी का आभास हो रहा है। अमेरिका में घरेलू उथल-पुथल, ट्रम्प की आर्थिक और विदेश नीतियों में समन्वय का अभाव और ‘अमेरिका को फिर से महान’ बनाकर स्वयं को स्थापित करने का जो प्रयास किया जा रहा है, उसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं, जैसा कि अमेरिकी जनता के ‘नो किंग्स’ आंदोलन की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तीन वर्षों से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का प्रयास किया था। यूक्रेन को अमेरिकी हथियार और वित्तीय सहायता बंद करने, रूस से बातचीत करने और कुछ दिनों का युद्ध-विराम करवाने के बाद भी जब रूस-यूक्रेन युद्ध नहीं रुका, तो ट्रम्प ने फिर से यूक्रेन को अमेरिकी हथियार और वित्तीय सहायता देना शुरू कर दिया, जो एक दोहरी नीति बन गई। अब जब अमेरिका के लिए रूस को किसी भी तरह से काबू में रखना संभव नहीं है, तो रूस-यूक्रेन युद्ध जारी रखने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। ईरान को बारह दिन की मोहलत देने के दो दिन बाद ही उसके परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करना अमेरिका को महंगा पड़ गया है। अमेरिका न तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोक पा रहा है, न ही उस पर प्रतिबंध लगा पा रहा है और न ही उस पर दोबारा हमला कर पा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस तरह की बयानबाजी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है।

कहा जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान और इजरायल-ईरान के बीच शुरू हुए युद्धों को रोक दिया था, लेकिन इन देशों के बीच आपसी रिश्ते बिल्कुल भी अच्छे नहीं हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि जो युद्ध-विराम हुआ है, वह कब तक लागू रहेगा। इसके बाद इजराइल-सीरिया के बीच फिर से शुरू हुए युद्ध में राष्ट्रपति ट्रम्प ने युद्ध-विराम घोषित कर दिया। इसी तरह वे थाईलैंड और कंबोडिया के बीच युद्ध रोकने के लिए फतवा जारी कर रहे हैं।

दुनिया में जहां भी युद्ध और गृहयुद्ध की स्थिति है, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वहां घुसकर और आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी देकर शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं; लेकिन ट्रम्प के इन प्रयासों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की उम्मीद में ट्रम्प ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं और पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की तरह यह पुरस्कार जीतकर खुद को दुनिया का रक्षक और शांति का अग्रदूत कहलाने को आतुर हैं।

गाजा में अमेरिका द्वारा प्रायोजित नरसंहार के लिए अमेरिका मुख्य रूप से जिम्मेदार है, जिसमें 80,000 से अधिक लोग मारे गए हैं और वहां जीवन असंभव हो गया है। अमेरिका इजरायल के माध्यम से आतंकवाद और दमन के जरिए पूरी दुनिया में भय का माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। कोई नहीं कह सकता कि एशिया, मध्य-पूर्व, यूरोप आदि में क्षेत्रीय युद्धों का माहौल कब विश्वयुद्ध में बदल जाएगा। ऐसे में अमेरिका की घरेलू समस्याएं काफी बढ़ गई हैं और अमेरिकी कहने लगे हैं कि इन सभी समस्याओं के लिए डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार और प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार है। ट्रम्प के विरोध में हुए आंदोलन को ‘नो किंग्स’ नाम दिया गया है जिसका मतलब है कि अमेरिकियों को किसी राजा की जरूरत नहीं है; वे किसी को राजा के रूप में नहीं देखना चाहते। आमतौर पर कहा जाता है कि ‘नो किंग्स’ आंदोलन के पीछे ट्रम्प और उनकी ‘रिपब्लिकन पार्टी’ के खिलाफ अमेरिका के आम लोगों की आवाज है। यह आवाज जो आज अमेरिका में सुनाई दे रही है, एक दिन दुनिया के दूसरे देशों में भी सुनाई देगी। जहां भी तानाशाहों ने सत्ता हथियाकर खुद को राजा के रूप में स्थापित किया है, वहां भी ‘नो किंग्स’ आंदोलन होगा।

अमेरिका के सभी 50 राज्यों में ‘नो किंग्स’ आंदोलन शुरू हो चुका है, जिसमें अमेरिका समेत कनाडा, जापान, मैक्सिको और यूरोप के 20 देश, जिनमें गुयाना, उत्तरी मारियाना, आइसलैंड,प्यूर्टोरिको, वर्जिन द्वीप समूह शामिल हैं। यहां शुरू हुए ‘नो किंग्स’ आंदोलन से यह संदेश जाता है कि दुनिया में भय का माहौल नहीं होना चाहिए, दुनिया में तानाशाही की कोई जरूरत नहीं है, राजतंत्र की कोई जरूरत नहीं है। अमेरिकी जनता का यह आंदोलन स्पष्ट रूप से घोषणा कर रहा है कि ‘हम निरंकुशता को अस्वीकार करते हैं, हम भय को अस्वीकार करते हैं और हम अत्याचारियों को अस्वीकार करते हैं।’

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