Tuesday, March 3, 2026
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नेपाल के लिए आगे की राह

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नेपाल इस समय नेतृत्वविहीन-सरकार विहीन है। राजधानी काठमांडू में जेनरेशन जेड के मात्र डेढ़ दिन के हिंसक व अराजक विरोध प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति त्यागपत्र दे चुके हैं। किसी देश की शासन सत्ता को चलाने के लिए कोई न कोई तंत्र तो आवश्यक है ही, लेकिन अजीब बात यह है कि नेपाल के सभी राजनीतिक दल-चाहे वे सत्तारुढ़ गठबंधन के हिस्सा हों या फिर विपक्ष में बैठे दल- सभी इस अभूतपूर्व विरोध के शिकार बने हैं और सभी के नेताओं के साथ हिंसा हुई है। जब पक्ष-विपक्ष सभी गुस्से के शिकार हैं तो सवाल यह है कि नेपाल के लिए आगे की राह क्या है? यह केवल उसकी राजनीति का सवाल नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के समूचे लोकतांत्रिक भविष्य के लिए भी गहरे विमर्श का विषय है।

वर्तमान आंदोलन का सबसे बड़ा संकट उसका नेतृत्वविहीन होना है। कोई औपचारिक संरचना या वैचारिक रूपरेखा न होने से यह उग्र भी हुआ और अस्थिर भी। सोशल मीडिया ने इसे गति दी और देखते-देखते भीड़तंत्र में बदल दिया। इस शून्य में काठमांडू के मेयर और रैपर बालेन शाह जैसे लोकप्रिय आइकॉन को युवा ‘प्रधानमंत्री’ के रूप में देखने लगे। बालेन ही हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया पर इस आंदोलन की चिंगारी सुलगाई। अमूमन ऐसे स्वत:स्फूर्त और नेतृत्वविहीन आंदोलनों में आंदोलनकारियों को जो भी आइकॉन के रूप में नजर आता है, उसी चेहरे को तारणहार मान लिया जाता है।

यूक्रेन का उदाहरण हमारे सामने है, जहां जेलेंस्की ऐसी ही आकांक्षाओं के सैलाब पर सवार होकर आए थे और देश को युद्ध में फंसा बैठे। बालेन जैसे अनुभवहीन और बबूले से फूटे नेता कुछ समय के लिए युवाओं के गुस्से को तो शांत कर देंगे, लेकिन क्या वह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे, जर्जर अर्थव्यवस्था और संवैधानिक विसंगतियों वाले देश को पटरी पर ला पाएंगे, यह संदिग्ध है। यदि आकांक्षाएं पूरी न हुईं तो यही भीड़ शीघ्र ही उनके खिलाफ भी खड़ी हो सकती है। उनका चीनपरस्त रुझान भारत के हितों के अनुकूल भी नहीं है।

कुछ लोग इसकी तुलना 2024 के बांग्लादेश के तख्तापलट से कर रहे हैं। निस्संदेह, सतही तौर पर दोनों में युवा आक्रोश और राजनीतिक नेतृत्व से मोहभंग की समानता अवश्य है, किंतु परिणाम भिन्न हैं। बांग्लादेशियों के पास नेतृत्व के विकल्प के रूप में युनूस जैसा वैश्विक ख्याति वाला अर्थशास्त्री था, जिन पर आम जनता का भरोसा था। भले ही युवा आक्रोश की खुमारी उतरने के बाद और विपक्षी दल बीएनपी के विरोध तथा पाकिस्तानी मूल से उपजी सेना की सत्ताकांक्षाओं से यदा-कदा युनूस की अस्थायी सरकार की विफलता की खबरें उठती रहती हैं, लेकिन वहां अभी किसी नए विप्लव की कोई संभावना नहीं दिखाई देती। ऐसा जरूर हो सकता है कि देर-सबेर चुनाव होने पर लोग युनूस को खारिज कर खालिदा जिया की बीएनपी को सत्ता में ले आएं।

कुछ लोगों को इस आंदोलन में भारत में आम आदमी पार्टी जैसा उभार भी नजर आ रहा रहा है। लेकिन आप का उभार पूरी तरह हिंसारहित व लोकतांत्रिक तरीके से था। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुदृढ़ता के कारण लोग अपने मताधिकार का शांतिपूर्ण तरीके से प्रयोग करके उसे दिल्ली की सत्ता में लाए और उसी तरीके से विदा भी कर दिया। ध्यान रहे कि जनता ने उसे सत्ता से विदा कर अपना लोकतांत्रिक गुस्सा निकाला, नेपाल की तरह हिंसात्मक आक्रोश में भरकर खदेड़ा नहीं। इसके विपरीत नेपाल का आंदोलन हिंसा और अराजकता से भरा है। वहां राजनीतिक प्रक्रिया का सम्मान नहीं दिखता।

नेपाल का घटनाक्रम न तो बांग्लादेश का दोहराव है और न ही आप जैसी कोई संभावनाओं की राजनीति की संभावना। यह अपने आप में एक अनूठा घटनाक्रम है। जिसमें सारे के सारे खदेड़ दिए गए हैं और यह नजर ही नहीं आता कि अब बचा कौन है? इसीलिए बालेन जैसे सोशल आइकॉन में आंदोलनकारी शक्तियां अपना भविष्य देख रही हैं। कुछ हलकों से राजशाही की पुनर्स्थापना की आवाजें भी उठ रही हैं। पिछले कुछ समय में देश में राजशाही समर्थक तेजी से सक्रिय हुए हैं और इसके लिए प्रदर्शन भी कर रहे थे।

लेकिन यह मौजूदा व्यवस्था से हताश लोगों कि उसी प्रकार की मांग है, जैसे भारत में आजादी के बाद के दो-तीन दशकों तक आजादी से अप्रत्याशित परिवर्तनों की आकांक्षाओं के पूरी न होने पर कुछ भारतीय टिप्पणी कर दिया करते थे-इससे तो फिरंगी ही ठीक थे। इतिहास का पहिया पश्चगामी न होकर सदैव आगे की ओर बढ़ता है और नया इतिहास रचता है। इसलिए एक बार मिटी हुई राजशाही पुन: नेपाली लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकती। यह उन लाखों नेपालियों की भावनाओं पर भी कुठाराघात होगा, जिनके परिवारों ने राजशाही विरोधी आंदोलन में बलिदान किया। ऐसे अराजक दौर में सेना की भी राजनीतिक सत्ता को हासिल करने की इच्छाएं प्रबल हो जाती हैं। 19 वीं एवं 20 वीं सदी में राणा राजशाही के दौरान नेपाल ने सैन्य तानाशाही को झेला है और फिलहाल के उपद्रव को संभालने में पुलिस की विफलता के बाद कानून व्यवस्था सेना के हाथ में ही है। स्वाभाविक है कि नेपाल में सेना भी ऐसे अवसर का लाभ उठाने को उद्यत हो सकती है। सेना का राजसत्ता को संभालना किसी भी देश के लिए हितकारी नहीं हो सकता है। यह हमने पाकिस्तान समेत विभिन्न उदाहरणों में देखा है।

क्षणिक आवेश में उपजे अनुभवहीन नेतृत्व के स्थायित्व की गारंटी नहीं है, राजशाही का लौट आना या सैन्यतंत्र का शासन लोकशाही के लिए उचित नहीं ठहराए जा सकते तो तो फिर नेपाल के लिए भविष्य का रास्ता क्या है? कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र का विकल्प अपेक्षित सुधारों के साथ लोकतंत्र ही हो सकता है। सोशल मीडिया तो बहाना था, दरअसल नेपाल के युवाओं का गुस्सा बूढ़े नेतृत्व के बीच बारी-बारी सत्ता की बंदरबांट, उनकी संततियों की ऐशपरस्ती और देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर है। लिहाजा बूढ़े नेतृत्व- ओली, देऊबा, प्रचंड, खनाल आदि को अब सत्ता मोह का त्याग कर राजनीति से किनारा कर लेना चाहिए तथा अपने दलों की कमान युवा नेतृत्व को सौंप देनी चाहिए, पर ये उनकी अपनी संततियां न हों। इनके राजनीति से बाहर होते ही खीझी जनता का गुस्सा ठंडा हो जाएगा। युवा नेतृत्व के उभरने से युवा आकांक्षाओं को भी समझा जाएगा और ऐसे विद्रोहों की पुनरावृति नहीं होगी।

नेपाल के इतिहास के इस संधिकाल में वैसे नई और पुरानी पीढ़ी के समन्वय के लिए इंग्लैंड जैसा संवैधानिक राजतंत्र का विकल्प भी उचित हो सकता है-नख-दंत विहीन आलंकारिक राजपद, लेकिन वास्तविक सत्ता संसद के हाथों में। भारत को नेपाल के घटनाक्रम पर निगाह रखनी होगी। नेपाल में घुसा चीन इस मौके पर अपने को पूरा वहां धंसा लेने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगा।

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