Saturday, March 7, 2026
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नीट परीक्षा पर सुप्रीम फैसले से निकली राह

Nazariya

Rohit mahaswariनीट यूजी-2024 पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है, जो कि करीब 24 लाख छात्रों के लिए राहतभरा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नीटकृयूजी परीक्षा कैंसिल नहीं होगी। कोर्ट ने कहा है कि गड़बड़ी के पर्याप्त सबूत नहीं हैं। नीट परीक्षा को लेकर देशव्यापी हंगामे व राजनीतिक बयानबाजियों के बावजूद यह सुखद खबर है। हालांकि, 23 जुलाई को को आए फैसले का मानवीय पक्ष यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 24 लाख अभ्यर्थियों को होने वाली परेशानी को प्राथमिकता दी है। इसके बावजूद शीर्ष अदालत का फैसला भारत में परीक्षा प्रक्रियाओं में प्रणालीगत सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। हाल के दिनों में देश में विभिन्न रोजगारपरक प्रतियोगी परीक्षाओं व व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने और संदेह के घेरे में आने के मामले लगातार उजागर होते रहे हैं। निश्चित रूप से सुनहरे भविष्य की आस में रात-दिन एक करने वाले प्रतियोगियों के साथ यह अन्याय बेहद कष्टदायक है। जो प्रतिभागियों का विश्वास व्यवस्था से उठाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की कि नीट- यूजी 2024 पेपर लीक पटना और हजारीबाग में हुआ। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) आगे की जानकारी उजागर करने के लिए पेपर लीक के मामले में अपनी जांच जारी रखेगी। वहीं न्यायालय ने काउंसलिंग और अन्य प्रवेश प्रक्रियाओं को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रखने की अनुमति दी है। इसने यह भी संकेत दिया है कि इसी तरह के मुद्दों को संबोधित करने और रोकने के लिए परीक्षाओं के भविष्य के संचालन के लिए दिशा निर्देश प्रदान किए जाएंगे। कोर्ट के व्यावहारिक फैसले के बावजूद इस विवाद ने हमारी शैक्षिक व परीक्षा प्रणाली के भीतर व्याप्त विसंगतियों को भी उजागर किया है। बहरहाल, मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी कि लीक परीक्षा प्रणाली का उल्लंघन नहीं है, एक अस्थायी राहत जरूर प्रदान करता है। लेकिन इस सिस्टम में अंतर्निहित कमजोरियों को संबोधित किया जाना जरूरी है। इसके बावजूद राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी यानी एनटीए और आईआईटी दिल्ली द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार बिहार के हजारीबाग और पटना में लीक महत्वाकांक्षी चिकित्सा पेशेवरों के लिये होने वाली महत्वपूर्ण परीक्षा आयोजन के तौर-तरीकों की विश्वसनीयता पर प्रश्न तो उठाते ही हैं।

प्रभावित छात्रों के मामलों को निपटाने के लिए, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी पर न्यायालय की निर्भरता समस्या के दीर्घकालीन समाधान के बजाय एक कामचलाऊ दृष्टिकोण को ही दर्शाती है। वहीं दूसरी ओर गत जून माह में यूजीसी-नेट परीक्षा का रद्द होना भी चिंताओं को और बढ़ा देता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को अज्ञात सूत्रों से मिले तथ्यों के आधार पर शिक्षा मंत्रालय ने स्वतरू संज्ञान लेते हुए यह कार्रवाई की थी। हालांकि यह कदम छात्रों के हितों की तात्कालिक रक्षा की दृष्टि से सार्थक है लेकिन यह घटनाक्रम हमारी परीक्षातंत्र के बुनियादी ढांचे की कमजोरी को ही उजागर करता है। कह सकते हैं कि परीक्षा तंत्र की संवेदनशीलता के मद्देनजर ऐसे तदर्थवाद व पारदर्शिता की कमी छात्र समुदाय में अविश्वास व चिंता को बढ़ाते हैं।
इस घटनाक्रम के बाद सरकार को परीक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने और युवाओं की आकांक्षाओं को संबल देने के लिये इस क्षेत्र में सुधारों को वरीयता देनी चाहिए। निस्संदेह, मेडिकल प्रवेश परीक्षा के मामले के निस्तारण में सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता की सराहना की जानी चाहिए।

बड़ी संख्या में याचिकाएं परीक्षा दोबारा आयोजित कराने के लिये दायर किये जाने के बावजूद, लाखों छात्रों के हित व वक्त की जरूरत के मुताबिक कोर्ट ने तार्किक फैसला दिया। जिसमें इस बात पर ध्यान दिया गया कि किसी गड़बड़ी से परीक्षा किस सीमा तक प्रभावित हुई है। कोर्ट ने इस बाबत ठोस व तार्किक पक्ष को प्राथमिकता दी। साथ ही परीक्षा के सामाजिक पक्षों को भी ध्यान में रखा। निश्चित रूप से जिन परीक्षार्थियों का चयन हो चुका था, उन्हें पुन: परीक्षा देने को बाध्य करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें चिंतित भी हैं। इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम 2024 लागू किया है, जिसकी अधिसूचना पिछले माह जारी की गई थी। नीट-यूजी के मामले में केंद्र सरकार ने कुछ तात्कालिक कदम उठाए हैं। नया कानून लागू करने के साथ ही इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई है और कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक पर अंकुश लगाने के लिए नया कानून बनाया है। उत्तर प्रदेष के अलावा कई अन्य राज्यों ने भी पेपर लीक से जुड़े कानून बनाए हैं।

निस्संदेह, लाखों छात्रों के लिए परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था संदेह से मुक्त होनी चाहिए। परीक्षा की शुचिता बनाये रखने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है। अन्यथा छात्रों का व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से बनाए गए कानूनों में प्रवेश व प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पर्चा लीक के दोषियों को सजा के कड़े प्रावधान किए गए हैं। अब सवाल यह भी उठता है कि क्या हर राज्य में अलग-अलग कानून बना देने से पेपर लीक मामलों पर अंकुश लग पाएगा? क्या ये कदम छात्रों और अभिभावकों की परेशानी दूर करने के लिए काफी हैं? हमें समझना होगा यह कवायद मात्र रोग के लक्षणों का उपचार करना है। मूल समस्या कहीं अधिक गहरी है और इसकी जड़ों पर प्रहार करने की जरूरत है।

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