
लेखकों के लिए बहुधा कलम के सिपाही उक्ति का प्रयोग किया जाता है। इस उक्ति को सच्चे अर्थों में सार्थक करने वाले और जीने वाले साहित्यकार हरपाल सिंह अरुष का कोई मुकाबला समकालीन हिन्दी साहित्य में कहीं नजर नहीं आता है। शिक्षा विभाग में अधिकारी थे यानी दिन भर सरकारी काम काज में व्यस्त रहते मगर अरुष की रातें आराम करने की बजाए सर्जन के लिए होती। देर रात एक दो बजे तक वह शब्दों से खेलते तो शब्द भी इस अनूठे खिलाड़ी के हाथों खेलकर आह्लादित होते और दलितों, पिछड़ों, वंचितों के जीवन संघर्षों को उकेरती उनकी कविताऐं, कहानियां और लेख आलेख साहित्य के नए आयाम रचते। उनकी सर्जनात्मक क्षमता और सामर्थ्य का उनके समकालीन साहित्यकारों को छोड़िए, युवा लेखक भी लोहा मानकर उन्हें हैरत से देखते।