Saturday, April 17, 2021
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फिर राफेल का जिन्न बाहर

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लगता है कि रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार का देश का इतिहास अपने को एक बार फिर दोहरा रहा है। पाठकों को याद होगा, राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीकाल में 24 मार्च, 1986 को स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी एबी बोफोर्स से 15 अरब अमेरिकी डॉलर का चार सौ होवित्जर फील्डगनों (बोफोर्स तोपों) की खरीद का सौदा हुआ तो स्वीडन रेडियो ने किस तरह उसमें बिचौलियों की मार्फत एक बड़े भारतीय नेता व सैन्य अधिकारियों को दलाली का भुगतान दिए जाने की पोल खोलकर बड़ा राजनीतिक भूचाल ला दिया था। इस भूचाल का फल यह हुआ था कि दशकों तक राजीव गांधी कहें या कांग्रेस की उसके बाद की सारी राजनीति इस कांड की बलि चढ़ जाती रही थी। भले ही लंबी जांच पड़ताल के बाद भी, जिसमें कथित दलाली की रकम से कई गुना ज्यादा धन खर्च हो गया, इस कांड को किसी अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका, राजनीतिक हलकों में अभी भी कभी न कभी, कहीं न कहीं उसकी अनुगूंज सुनाई पड़ जाती है।

अब फ्रांस की, जिसकी एक कंपनी से नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा छत्तीस राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की जा रही है, ‘मीडिया पार्ट’ नामक समाचार वेबसाइट ने अपने देश की एजेंसे फ्रांकाइस ऐन्टीकरप्शन नामक भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी द्वारा की गई जांच के हवाले से इस खरीद के फौरन बाद एक भारतीय बिचौलिये को दस लाख यूरो के भुगतान संबंधी जो रिपोर्ट दी है, उससे भले ही वैसा भूचाल न आए, जैसा स्वीडन रेडियो की बोफोर्स तोप सौदे संबंधी रिपोर्ट के बाद आया था।

अंदेशे और संदेह प्रबल होते दिखते हैं कि इस सौदे में भी बोफोर्स तोप जैसा ही खेल हुआ है और सर्वोच्च न्यायालय के इस संबंधी मनोनुकूल फैसले के हवाले से मोदी सरकार द्वारा बार-बार किया जाता रहा यह दावा सही नहीं है कि सौदा पूरी तरह ‘क्लीन’ है और उसे लेकर उठाए जा रहे सवालों के पीछे देश के सुरक्षा बलों का मनोबल घटाने की साजिश है।

आगे बढ़ने से पहले दो चीजें समझ लेनी चाहिए। पहली यह कि अगर ‘मीडिया पार्ट’ की रिपोर्ट के बाद स्वीडन रेडियो की रिपोर्ट जैसा भूचाल नहीं मच रहा या आगे नहीं मचता तो इसके कारण रिपोर्ट की विश्वसनीयता या अविश्वसनीयता में न होकर देश की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में हैं और वहीं तलाशे जाने चाहिए। निस्संदेह, आज की राजनीति में भ्रष्टाचार उतना निंदनीय या त्याज्य नहीं रह गया है।

जितना 1986 में बोफोर्स सौदे के वक्त था। तिस पर इस वक्त न विपक्ष 1986 जितना शक्तिशाली है, न ही उसके पास विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसा कोई नैतिक चमक वाला नेता है। अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल के भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन की लोकपाल की मांग तो इस बीच ऐसे अंजाम तक पहुंचा दी गई है कि उसके बारे में बात करना ही असंगत लगने लगा है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार सौदे में भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों को बारम्बार नकारती और उन्हें पूछने वालों के सामने अकड़ती रहे।

दूसरी बात जो कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, वह यह कि सरकार के इस तर्क को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता कि राफेल सौदे की बाबत सवाल उठाने से देश के सुरक्षा बलों का मनोबल घटता है। वह तो तब घटता, जब कोई खरीदे गए राफेल विमानों की गुणवत्ता पर सवाल उठाता। अतीत गवाह है, बोफोर्स तोप सौदे पर सवाल उठाये जाने से भी उनका मनोबल नहीं घटा था।

कारगिल के संघर्ष में बोफोर्स तोपें पाकिस्तान को धूल चटाने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुर्इं, तो कहते हैं कि उनकी मार्फत पाक सेना या उसके द्वारा प्रशिक्षित कर भेजे गए घुसपैठियों पर कहर बरपाने के बाद भारतीय सैनिक ‘राजीव गांधी जिंदाबाद’ के नारे लगाया करते थे।

इसलिए उनका मनोबल घटने की बात करने के उलट ‘मीडिया पार्ट’ द्वारा सामने लाए गए नए तथ्यों की रोशनी में दूध का दूध और पानी का पानी करने वाली जांच करा ली जाए, अलबत्ता, यह सुनिश्चित करते हुए कि जांच का हश्र बोफोर्स सौदे की जांच जैसा न हो, तो इससे खुद नरेंद्र मोदी सरकार का ही भला होगा। वह पाक साफ सिद्ध हुई तो इस सिलसिले में संयुक्त संसदीय समिति तक की मांग करने वाले उसके विरोधी भरपूर मुंह की खाएंगे।

‘मीडिया पार्ट’ की रिपोर्ट के आगे सरकार का सिरदर्द बनी रहने में कोई संदेह नहीं है। इस कारण और कि वह किसी नेता के हवा-हवाई बयान या आरोप प्रत्यारोप पर नहीं, राफेल निर्माता कंपनी के आडिट पर आधारित है और उसमें जिस बिचौलिये अथवा एजेंट को भुगतान की बात कही गई है, उसका आपराधिक इतिहास रहा है।

वह राफेल बनाने वाली कंपनी की भारतीय सब-कॉन्ट्रैक्टर कंपनी से जुड़ा हुआ है और 2019 में अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद घोटाले की जांच के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तार भी किया जा चुका है। तिस पर कंपनी का आडिट करने वालों के अनुसार यह उसका इकलौता ‘बोगस भुगतान’ नहीं है, जिसका उसने कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं व वकीलों, खासकर कांग्रेस, उसके नेता राहुल गांधी और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा इस विमान सौदे को लेकर सवाल उठाये जाने के बाद जांच की याचना के रूप में मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली उसकी पीठ ने 14 नवंबर, 2019 को यह कहते हुए उसको नकार दिया था कि मामले की जांच की जरूरत नहीं है।

पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि उसे नहीं लगता कि सौदे के मामले में किसी एफआईआर या जांच की जरूरत है। न्यायालय ने 14 दिसंबर, 2018 को सौदे की प्रॉसेस और सरकार के पार्टनर चुनाव में किसी तरह के फेवर के आरोपों को भी बेबुनियाद बताया था। बाद में उसने इस फैसले के विरुद्ध दाखिल पुनर्विचार याचिकाएं भी खारिज कर दी थीं।

तब, जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, मोदी सरकार और उसका नेतृत्व कर रही भाजपा ने इस फैसले को एक सुर में ‘क्लीन चिट’ और ‘सत्य की जीत’ करार दिया था। उन्होंने राहुल और कांग्रेस से सौदे के खिलाफ ‘बेबुनियाद एवं शर्मनाक अभियान’ को लेकर देश से माफी मांगने को भी कहा था।

ऐसे में उसका नैतिक दायित्व है कि इस नए खुलासे को लेकर न सिर्फ अपना पक्ष स्पष्ट करे, बल्कि सवाल उठाने वालों को संतुष्ट कर सकने वाली जांच कराये। अन्यथा इस सौदे का फिर से बोतल से बाहर आ गया जिन्न आने वाले दिनों और वर्षों में उसका व भाजपा का उसी तरह पीछा करता रहेगा, जैसे बोफोर्स दलाली का मामला कांग्रेस और उसकी सरकारों का किया करता था। जानकारों के अनुसार बोफोर्स मामले में तो सिर्फ दलाली का आरोप था, जबकि राफेल मामले में अनियमितताओं की एक लंबी फेहरिस्त सामने आ चुकी है।


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