
पिछले कुछ वर्षों में आए कहानी-संग्रहों में ‘इच्छाएं’ कहानी संग्रह अलग और अकेला अच्छा है और मैं इसे ऊंचाई पर देखना चाहूंगा कि जब भी मैं इस संग्रह को पढ़ूं तो मेरा सिर भी ऊंचा रहे। दूसरों के साथ इसकी तुलना करना मुझे ठीक नहीं लगता। यह दूसरों को छोटा कर, बड़े होने जैसा न लगे, लेकिन इसे मैंने दूसरों से अलग कर अकेला रखा है। रचना-यात्रा के लिए आज भी हड़बड़ी में सामान बांधते समय मैं ‘इच्छाएं’ साथ में जरूर रखूंगा, भले दो रोटी का टिफिन भूल जाऊं। -विनोद कुमार शुक्ल