Saturday, March 7, 2026
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जंगलों की तबाही का खतरा

दुनिया में आज जलवायु परिवर्तन से मुकाबले की दिशा में पेड़ और जंगलों की महत्ता की चर्चा जोरों पर है। इसका अहम कारण जलवायु परिवर्तन के कारण समूची दुनिया में संतुलित और समग्र विकास के लक्ष्य का लगातार भीषण चुनौती बनकर सामने आना है। दुनिया में जिस तेजी से पेड़ों की तादाद कम होती जा रही है, उससे पर्यावरण तो प्रभावित हो ही रहा है, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, कृषि और मानवीय जीवन ही नहीं, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी भीषण खतरा पैदा हो गया है। जहां तक जंगलों के खत्म होने की गति का सवाल है,उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जाएगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जाएंगे। हकीकत में हर साल दुनिया में एक करोड़ हेक्टेयर जंगल लुप्त होते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र भी इसकी पुष्टि करता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में कीड़े-मकोड़े भी 3.5 करोड़ हैक्टेयर जंगल हर साल बर्बाद कर रहे हैं। इससे ऐसा लगता है कि इंसान तो क्या दूसरे जीव भी जीवन के लिए जरूरी पेड़ों-जंगलों के दुश्मन बनते जा रहे हैं।

यदि देश की बात करें तो अकेले उत्तराखंड में बीते 8-9 बरसों के दौरान ढाई लाख से ज्यादा पेड़ काट दिए गए हैं। इनमें एक लाख से ज्यादा पेड़ आल वैदर रोड के नाम पर और शेष पर्यटन, देहरादून से लेकर दिल्ली तक सड़क चौड़ीकरण, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना व सुरंग आधारित परियोजनाओं आदि के नाम पर देवदार, बांज, राई, कैल जैसी दुर्लभ प्रजातियों के पेड़ों का अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। पिछले बीस सालों के दौरान 40,000 हेक्टेयर जंगल आग की समिधा बने हैं जिसमें लाखों पेड़ जलकर राख हो गए हैं। उत्तराखंड तो एक उदाहरण है, जबकि विकास के नाम पर पेड़ों के अंधाधुंध कटान का सिलसिला पूरे देश में जारी है।

असल में बीते दो दशकों में समूची दुनिया में 78 मिलियन हैक्टेयर यानी 193 मिलियन एकड़ पहाड़ी जंगल नष्ट हो गए हैं। जबकि पहाड़ दुनिया के 85 फीसदी से ज्यादा पक्षियों, स्तनधारियों और उभयचरों के आश्रय स्थल या यूं कहें कि घर हैं। इस बारे में एशिया,उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप का जायजा लें तो पाते हैं कि पहाड़ी जंगलों के खात्मे की दर में एशिया 39.8 मिलियन हेक्टेयर वन नुकसान के मामले में सर्वोपरि है। उसके बाद उत्तरी अमेरिका, 18.7 मिलियन हैक्टेयर के साथ दूसरे पायदान पर, दक्षिणी अमेरिका 8.3 मिलियन हैक्टेयर के साथ तीसरे, अफ्रीका 6.4 मिलियन हैक्टेयर के साथ चौथे पायदान पर है।

दुनिया में आधे से अधिक वन रूस में 81.5 करोड़ हैक्टेयर, भारत में 80.9 करोड़ हैक्टेयर, ब्राजील में 49.7 करोड़ हैक्टेयर, कनाडा 34.7 करोड़ हैक्टेयर और संयुक्त राज्य अमेरिका के 31 करोड़ हैक्टेयर क्षेत्र में हैं। गौरतलब है कि हर साल जितना जंगल खत्म हो रहा है, वह एक लाख तीन हजार वर्ग किलोमीटर में फैले देश जर्मनी, नार्डिक देश आइसलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों के क्षेत्रफल के बराबर है। लेकिन दुख की बात यह है कि इसके अनुपात में नए जंगल लगाने की गति बेहद धीमी है। लंदन के थिंक टैंक एनर्जी ट्रांसमिशन कमीशन की मानें तो समूची दुनिया में हर मिनट औसतन दस फुटबाल मैदान के बराबर यानी 17.60 एकड़ जंगल काटे जा रहे हैं। बीते 30 सालों में 42 करोड़ हैक्टेयर जंगल को मैदान बना दिया गया है।

जहां तक धरती का फेफड़ा कहे जाने वाले दक्षिण अमेरिका के अमेजन बेसिन के बहुत बड़े भूभाग पर फैले अमेजन के वर्षा वनों का सवाल है, वे विनाश के कगार पर हैं। बढ़ते तापमान, भयावह सूखा, वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं के चलते अमेजन के जंगल खतरे के दायरे में हैं। आज अमेजन के जंगलों के 10 से 47 फीसदी हिस्से पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जबकि अमेजन के जंगलों का 18 फीसदी हिस्सा नष्ट हो ही चुका है। यदि यह आंकड़ा 20-25 फीसदी तक पहुंच गया तो यह जंगल पूरी तरह सवाना यानी घास के मैदान में बदल जाएगा। हकीकत में अब अमेजन के लिए ‘रेड अलर्ट’ का ऐलान करने का समय आ गया है। इसमें जलवायु परिवर्तन के चलते पड़ने वाले सूखा और गर्मी व आग सहित बहुतेरे कारकों की बड़ी़ भूमिका है। जंगलों के खात्मे में आग भी एक अहम कारक है, जिसके चलते दुनिया में हर साल लाखों हैक्टेयर जंगल आग की भेंट चढ़ जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अमेजन वनों का लगभग आधा हिस्सा 2050 तक खत्म हो जाएगा। दरअसल दुनिया में जंगलों का सबसे ज्यादा विनाश ब्राजील में हुआ है और यह सिलसिला आज भी जारी है। उसके बाद डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आफ कांगो और बोलीविया का नम्बर आता है।

यदि मैरीलैंड यूनिवर्सिटी और वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के ग्लोबल वाच की हालिया रिपोर्ट की मानें तो दुनिया भर में साल 2023 में 37 लाख हैक्टेयर जंगल नष्ट हो गए। जबकि भारत में 2023 के दौरान 21,672 हैक्टेयर जंगल खत्म हो गए। देश में 2022 में 21,839 हैक्टेयर जंगलों का खात्मा हुआ। 2001 से 2023 के बीच भारत में तकरीब 23.3 लाख हेक्टेयर जंगल खत्म कर दिए गए। 2013 से 2023 के बीच के दस सालों में देश में हुए जंगलों के 95 फीसदी खात्मे में जंगलों की अवैध कटाई और आग की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी की अहम भूमिका रही है। यदि यूके स्थित साइट यूटिलिटी बिडर की रिपोर्ट की मानें तो भारत ने बीते 30 वर्षों में जंगलों की कटाई में भारी बढो़तरी हुयी है। इसमें 2015 से 2020 के इन पांच वर्षों के दौरान तो जंगल कटाई ने कीर्तिमान बनाया है। इस दौरान देश में 6,68,400 हैक्टेयर वनों का खात्मा हुआ। यह आंकड़ा दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे अधिक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1990-2020 के बीच के तीस वर्षों में 42 करोड़ हैक्टेयर जंगलों का खात्मा हुआ है। इसमें देश के पांच राज्यों यथा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश शीर्ष पर हैं, जहां देश में आग से सबसे ज्यादा जंगल तबाह हुए हैं और यह सिलसिला आज भी जारी है।

दरअसल जैव विविधता को संरक्षित करने में वन की उपयोगिता जगजाहिर है, लेकिन विडम्बना है कि हम उन्हीं के साथ खिलवाड़ कर अपने जीवन के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। बीते तीन दशक इसके सबूत हैं कि उनमें हमने तकरीब एक अरब वन मानवीय स्वार्थ के चलते खत्म कर दिए हैं। दुख इस बात का है कि जंगल बचाने की लाख कोशिशों के बावजूद दुनिया में वनों की कटाई में और तेजी आई है और उसकी दर चार फीसदी से भी ज्यादा हो गई है। मौजूदा दौर की हकीकत यह है कि दुनिया में हर मिनट 21. 1 हैक्टेयर में फैले जंगलों का खात्मा हो रहा है। देखा जाए तो जल, जंगल और जमीन के मुद्दे आपस में गहरे तक जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन आज की सबसे बड़ी जरूरत है। तभी सामुदायिक प्रयासों को प्रोत्साहित कर धरती को बचाया जा सकता है।

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