
मनीष कुमार चौधरी |
करीब चालीस साल पहले अमरीका में स्माइली का प्रयोग शुरू हुआ। आज उन्होंने दुनिया भर में अपना साम्राज्य फैला लिया है। दो डॉट, उनके आगे एक डैश का निशान और फिर ब्रैकेट बंद का निशान। इमोजी की शुरूआत यहीं से हुई। असल में इसकी शुरूआत अमरीकी इनफॉर्मेटिक्स एक्सपर्ट स्कॉट फाह्लमन ने की। उन्होंने इसे इमोटिकॉन्स नाम दिया। इमोटिकॉन्स यानि ‘इमोशन’ और ‘आइकन’। जापान के सॉफ्टवेयर इंजीनियर शिगेताका कुरिता ने वर्ष 1999 में इमोजी का आविष्कार किया। इमोटिकॉन्स से अलग इमोजी में पिक्सल सर्किट का सहारा लेकर चेहरा-सा बनाया गया। इस तरह तस्वीरों वाली भाषा का आगाज हुआ। इमोजी ने हमारी जिंदगी में जो जगह हासिल कर ली है, उसकी कई बार हम कल्पना भी नहीं कर पाते। इमोजी हमारी जिंदगी में हौले-हौले कुछ इस तरह घुल-मिल गए हैं, जिस तरह चाय में चीनी। इमोजी महज कुछ मजेदार आइकन भर नहीं हैं, जिन्हें आप इस्तेमाल करते हैं। यह डिजिटल दुनिया की वह भाषा है, जो किसी भी बाधा को पार करके दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक आपकी बात आसानी से पहुंचा पाती है।
सोशल मीडिया पर जब से इमोजी आए हैं, लिखने का अंदाज ही बदल गया है। दु:ख, हंसी, परवाह, चिढ़, प्रेम, गुस्सा, जन्मदिन, शुभकामनाएं हर जज्बात, भावना के लिए इमोजी तैयार हैं। बस, एक क्लिक के माध्यम से आप अपने अहसास जस के तस साझा कर सकते हैं। इससे समय की बचत होती है। भाव पुख्ता तौर पर साझा किए जाते हैं। इस बात को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि जब शब्दों की जेब खाली हो या कहीं कोई झिझक आड़े आ रही हो, तब अभिव्यक्ति के लिए भी इनका बड़ा सहारा है! कोई भी भाषा मन के विचारों को पूरी तरह समझाने में सक्षम नहीं है। इक्कीसवीं सदी की डिजिटल दुनिया में ‘इमोजी’ इसका तोड़ है।
हम अब केवल बोलकर बातें नहीं करते। रोजाना काफी बातें मैसेज या चैट में लिख कर भी होती हैं। ऐसी बातचीत में भावनाओं को खुलकर जाहिर करने के लिए इमोजी सबसे बड़ा सहारा होती है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी हम अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए जमकर इमोजी का इस्तेमाल करते हैं। कहा जाता है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर प्रभावशाली होती है। वैसे ही एक इमोजी उस बात को आसानी से जाहिर कर देती है, जिसके लिए हमें सैकड़ों अक्षर टाइप करने पड़ते। नए जमाने की चैटिंग में चैट का बड़ा हिस्सा इमोजी से रिप्लेस हो चुका है। इमोजी कल्चर और समाज की जरूरत के हिसाब से बदलते जा रहे हैं। दिन-प्रतिदिन नई-नई इमोजी जन्म ले रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग, गांव से लेकर शहर तक मोबाइल इस्तेमाल करने वाला हर शख्स इमोजी का दिल खोलकर इस्तेमाल करता है। कहना चाहिए कि आज की युवा पीढ़ी ने शब्दों से संकेतों की एक नई भाषा गढ़ ली है। इमोजी ने अपनी जड़ें इस तरह जमा ली हैं कि यह एक पूरी भाषा बन चुका है। पूरे-पूरे उपन्यास इसके उपयोग से ट्रांसलेट किए जा रहे हैं। ‘मोबी-डिक’ जैसा अमरीकन रोमांटिक नॉवेल, जिसे अमरीकन पुनर्जागरण की बेहतरीन कृति माना जाता है, इमोजी के इस्तेमाल से ट्रांसलेट हो चुका है।
करीब चालीस साल पहले अमरीका में स्माइली का प्रयोग शुरू हुआ। आज उन्होंने दुनिया भर में अपना साम्राज्य फैला लिया है। दो डॉट, उनके आगे एक डैश का निशान और फिर ब्रैकेट बंद का निशान। इमोजी की शुरूआत यहीं से हुई। असल में इसकी शुरूआत अमरीकी इनफॉर्मेटिक्स एक्सपर्ट स्कॉट फाह्लमन ने की। उन्होंने इसे इमोटिकॉन्स नाम दिया। इमोटिकॉन्स यानि ‘इमोशन’ और ‘आइकन’। जापान के सॉफ्टवेयर इंजीनियर शिगेताका कुरिता ने वर्ष 1999 में इमोजी का आविष्कार किया। इमोटिकॉन्स से अलग इमोजी में पिक्सल सर्किट का सहारा लेकर चेहरा-सा बनाया गया। इस तरह तस्वीरों वाली भाषा का आगाज हुआ। इमोजी पिक्टोग्राफ होते हैं। यह जापानी भाषा के शब्द इ (पिक्चर) और मोजी (पात्र) से मिलकर बना है। जब कुरिता जापान की मोबाइल कंपनी डोकोमो के इंटरनेट प्लेटफॉर्म को तैयार करने का काम कर रहे थे, उन्होंने ऐसे 176 इमोजी तैयार किए जो साधारण तरीके से जानकारी पहुंचा सकें। ये इमोजी फिलहाल न्यूयॉर्क के मॉडर्न आर्ट संग्रहालय के स्थायी संग्रह का हिस्सा हैं। कुरिता ने ऐसे कैरेक्टर तैयार किये थे जो मौसम का हाल (जैसे बादल, धूप, छतरी, बर्फ), ट्रैफिक (कार, ट्राम, एयरप्लेन, जहाज), तकनीक (लैंडलाइन, सेलफोन, टीवी) बता सके। लेकिन बात जानकारी से आगे बढ़कर बात दिल के हाल तक पहुंच गई और दिमाग से ज्यादा इसने मन को छुआ।
यूं छपाई की दुनिया में स्माइली का प्रयोग बहुत पुराना है। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने संभवत: 1862 में राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का भाषण छापते वक्त इसका पहली बार इस्तेमाल किया। वर्ष 1881 में लोकप्रिय व्यंग्य पत्रिका ‘पक’ ने विभिन्न टाइप सैट का प्रयोग कर कुछ स्माइली गढ़े। माना जाता है कि चिह्नों को खुशनुमा चेहरे की शक्ल 1963 में हार्वे बाल ने दी। इसे स्माइली नाम मिला 1972 में। तब फ्रेंकलिन लोफरानी ने फ्रांसीसी अखबार ‘फ्रांस सोएर’ में अच्छी खबरों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चलाए गए अभियान ‘टेक द टाइम टू स्माइली’ के लिए इस चेहरे को यह नाम दिया। कम्प्यूटर पर इन्हें बनाने का श्रेय अलबत्ता स्कॉट फाह्लमन को जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि दुनिया में जितनी तरह के लोग हैं, सबकी चैटिंग की-बोर्ड में जगह बन सके इसके लिए अपना दिमाग कौन खर्च करता है। तो उस महिला का नाम है- जेनिफर डेनियल। जेनिफर ‘इमोजी सबकमेटी फॉर द यूनिकोड कंसोर्टियम’ की प्रमुख हैं। यही संस्था हमारे चैट बॉक्स की इमोजी डिजाइन करने के लिए जिम्मेदार है। ‘इमोजी हमारे लिए इतनी जरूरी क्यों हैं,’ इसके बारे में जेनिफर का मानना है, ‘हम 80 प्रतिशत समय बिना कुछ बोले खुद को व्यक्त करते हैं। जब हम बोलते भी हैं तो इसके कई तरीके होते हैं। हम चैटिंग उस तरह करते हैं, जैसे हम बातचीत करते हैं। इस दौरान हम अनौपचारिक और लापरवाह होते हैं। इस दौरान आप टाइप करते-करते थकें तो इमोजी से अपनी बात कह दें।’ शुरूआत में जब चैटिंग की-बोर्ड में इमोजी शामिल की गई तो लोगों के मन में गलत विचार आया कि यह हमारी भाषा को खराब करेगी। कोई नई भाषा सीखना कठिन होता है और इमोजी भी एक नई भाषा ही थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि यह उसी भाषा का हिस्सा थी, जिसे हम पहले से बोलते आ रहे थे। आपके साथ-साथ इमोजी में भी बदलाव होता है। आप जैसी बातचीत करते हैं और जिस तरह खुद को व्यक्त करते हैं, यह भी वैसी ही हो जाती है।
इमोजी के लोकप्रिय होने के साथ ही उसकी तादाद भी बढ़Þने लगी है। यूनिकोड कंसोर्टियम हर साल अपनी लिस्ट में नये इमोजी शामिल करता है। इमोजी आपको फोन पर जितना आसान दिखाई देता है, उसे लेकर चर्चा उतनी ही गंभीर होती है। मसलन, शर्ट, टोपी या अंगूठे के विभिन्न रंगों को लेकर भी लंबी-लंबी बैठकें होती हैं। कुछ महीने पहले गूगल के बर्गर इमोजी ने सुर्खियां बटोरी थीं। गूगल के बर्गर इमोजी में टिक्की के नीचे चीज स्लाइस थी, वहीं एप्पल के इमोजी में स्लाइस ऊपर थी। ट्विटर पर इसे लेकर बहस भी छिड़ी कि कौनसा इमोजी सही है। अब सवाल यह है कि इमोजी का भविष्य क्या है? आॅनलाइन रहने वाले करीब 92 प्रतिशत लोग इमोजी का इस्तेमाल करते हैं। इंस्टाग्राम पर तो आधी से ज्यादा पोस्ट इमोजी से भरी होती है। संचार और अभिव्यक्ति की दुनिया में कब, कौन, कहां स्माइली, इमोटिकॉन्स या इमोजी का प्रयोग करने लगेगा और उन्हें नया अर्थ दे देगा, कोई नहीं जानता। अब तो इमोजी से जुड़े कई एप भी आ गए हैं, जिनके जरिए आप अलग-अलग किस्म और भाषा में अपनी बात कह पाएंगे। ‘हंसते-हंसते आंसू निकल जाएं’ यह 2015 की सबसे लोकप्रिय इमोजी साबित हुई थी। करीब 20 करोड़ से ज्यादा लोगों ने इसका इस्तेमाल किया। इस चलन की वजह से आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी ने उस इमोजी को सबसे लोकप्रिय शब्द चुना। वर्ल्ड इमोजी दिवस की शुरूआत इमोजीपीडिया के संस्थापक जेरेमी बर्ग ने 17 जुलाई 2014 में की थी, तब से प्रत्येक 17 जुलाई को वर्ल्ड इमोजी दिवस के रूप में मनाया जाता है।


