
जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगेल के हवाले से कहा था, ह्यहम इतिहास से यही सीखते हैं कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते।ह्ण अंतरराष्ट्रीय राजनीति की त्रासदी सिर्फ यह नहीं है कि इतिहास खुद को दोहराता है। यह है कि नेता अतीत के सबक जानने के बावजूद वही गलतियां बार-बार दोहराते रहते हैं। जब ट्रंप ने ईरान पर हमला शुरू किया था, तब शायद उन्होंने एक बड़ी गलतफहमी पाल ली थी कि अमेरिका की बेहतर सैन्य शक्ति ईरान को चंद दिनों के भीतर ही आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर सकती है। लेकिन अब तक के घटनाक्रम इस बात का संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान के प्रतिरोध का पूरी तरह से अनुमान नहीं लगाया था। जिस संघर्ष को शुरू करने में ट्रंप ने जल्दबाजी की, उसके न तो नतीजों पर और न ही उसके संदेश पर उनका कोई नियंत्रण है। इस नई स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए अमेरिका संघर्ष कर रहा है। बाहर निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति न होने से ट्रंप की राष्ट्रपति के तौर पर विरासत और उनकी पार्टी के राजनीतिक भविष्य, दोनों के लिए जोखिम पैदा हो गया है।
‘अमेरिका फर्स्ट’ सिद्धांत के संदर्भ में उनकी हर नीति का क्रियान्विति के स्तर पर विफलता में बदल जाना उनके खुद के देश अमेरिका के नागरिकों के बीच गलत कदमों के रूप में चिन्हित किया जा रहा है। ट्रंप की एकतरफा कार्रवाइयां द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों अर्थात अन्य देशों की संप्रभुता, राज्यों की समानता, क्षेत्रीय अखंडता, कानून के शासन के प्रति सम्मान पर समझ में आने वाला संदेह पैदा करती हैं। ट्रंप में एक ऐसे राष्ट्रपति की झलक दिख रही है जो बलपूर्वक कार्रवाई और तीखे राजनीतिक विभाजन के असामान्य संयोजन से आकार लेता है। ट्रंप की इस गंभीर गलती का जवाब शायद ईरान के ऐतिहासिक चरित्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी सिद्धांतों को गहराई से न समझने में छिपा है। ईरान, इस्राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चल रहा तनाव केवल सैन्य टकराव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये अलग-अलग दृष्टिकोणों, जनधारणाओं, भौगोलिक परिस्थितियों और सूचना युद्ध की लड़ाई है।
ईरान, जो 5000 साल पुरानी सभ्यता का वाहक है और भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत विशाल है (इसका क्षेत्रफल भारत के क्षेत्रफल का लगभग आधा है और यह फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और ब्रिटेन के कुल क्षेत्रफल के बराबर है) आज एक अस्थिर भू-राजनीतिक तूफान के केंद्र में खड़ा है। हो सकता है कुछ समय बाद अमेरिका ईरान को फौजी ताकत से दबा ले, लेकिन वह ईरानी लोगों की देशभक्ति को खत्म नहीं कर सकता। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इतिहास बार-बार दिखाता है कि जब देशों की संप्रभुता (आजादी) पर खतरा आता है, तो वे उसका जोरदार विरोध करते हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी सिद्धांतों को नजरअंदाज किया जाता है, तो किसी दूसरे देश पर हमला करने के नतीजे हमेशा दर्दनाक ही होते हैं। किसी भी देश के नागरिक भले ही अपने शासकों से खुश न हों, लेकिन वे पराए देश के शासकों का शासन कदापि नहीं चाहते।
अमेरिका और ईरान के बीच कभी औपचारिक रूप से युद्ध नहीं हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच दशकों से तनाव बना हुआ है। इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। वर्ष 1953 में अमेरिका ने ईरान में एक गुपचुप तख्तापलट करवाया था, जिसके जरिए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को सत्ता से हटा दिया गया था। यह घटना पूरे मध्य-पूर्व में अमेरिका-विरोधी भावना के सबसे शुरुआती और गहरे कारणों में से एक बन गई। वर्ष 1964 में वियतनाम युद्ध में अमेरिका की और ज्यादा दखलंदाजी से देश इतिहास के सबसे बड़े दलदलों में से एक में फंस गया था। वर्ष 2003 में इराक पर किया गया हमला इसका एक और जबरदस्त उदाहरण है।
विडंबना यह है कि ट्रंप खुद भी राजनीति में तब मशहूर हुए थे, जब उन्होंने इराक युद्ध की आलोचना की थी और उन अमेरिकियों से समर्थन मांगा था जो उनकी इस राय से सहमत थे। आज लगता है कि वह उससे भी ज्यादा खतरनाक गलती दोहरा रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ दशकों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों के दौरान ईरानी शासन बार-बार होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने और वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मचाने की धमकी देता रहा है। लेकिन अमेरिकी सत्ता हर बार इसे गीदड़भभकी मानती आई है। आखिरकार जब ईरान ने अपने तुरुप के इक्के यानी होर्मुज को बंद करने का दांव चल ही दिया है तो इस समस्या की वैश्विक स्तर पर गहराई का अंदाज न सिर्फ अमेरिका, अन्य देशों को भी हो गया है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो फारसी खाड़ी में तेल को लेकर होने वाले सभी संघर्ष अपेक्षाकृत नए हैं, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य तो हजारों वर्षों से अस्तित्व में है। यह हमेशा से ही समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र रहा है और कई देशों के ऊर्जा व्यापार को मध्य-पूर्व से जोड़ता है। जिनमें भारत भी शामिल है।
इतिहास गवाह है कि युद्ध विनाशकारी भी होता है और बदलाव लाने वाला भी। और यह भी कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, उसे खत्म करना मुश्किल। अगर इस मौजूदा संकट को समय रहते न रोका गया, तो यह अर्थव्यवस्थाओं को तबाह कर सकता है, ऊर्जा की आपूर्ति में रुकावट डालने के अलावा कई देशों में अस्थिरता पैदा कर सकता है। ईरान के साथ युद्ध में फंसे अमेरिका के लिए वित्तीय मोर्चे पर भी अच्छी खबर नहीं है। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने सरकार से ईरान युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर से ज्यादा अतिरिक्त फंड जारी करने का अनुरोध किया है। युद्ध के पहले दो हफ्तों में मध्य पूर्व में अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सैन्य ठिकानों पर ईरानी हवाई हमलों से 800 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। अमेरिका स्थित थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज’ की एक रिपोर्ट के विश्लेषण में पाया गया कि इस नुकसान का ज्यादातर हिस्सा तेहरान के जवाबी हमलों के दौरान हुआ।
हालांकि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी संपत्तियों को हुए नुकसान का पूरा अंदाजा अभी साफ नहीं है, लेकिन 800 मिलियन डॉलर का आंकड़ा इस बात की जानकारी देता है कि एक लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से अमेरिका को कितना नुकसान हो सकता है। मध्य पूर्व में अमेरिकी एयर बेस पर इमारतों और अन्य बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के कारण अमेरिका को अनुमानित तौर पर अतिरिक्त 310 मिलियन डॉलर का खर्च उठाना पड़ा है। ईरान की सैन्य चतुराई के आगे कई बार अमेरिका को हास्यास्पद स्थिति का सामना करना पड़ा है, जब ईरान के 20 हजार डॉलर के ड्रोन को खत्म करने के लिए अमेरिका को अपनी 20 से 40 लाख डॉलर की इंटरसेप्ट मिसाइलों को झोंकना पड़ा है।
युद्ध शुरू होने से पहले सत्ताधारी अभिजात वर्ग के प्रति ईरानियों की शिकायतों का स्तर बेहद ऊंचा था और ईरानी सरकार एक कमजोर स्थिति में फंसी हुई थी। अब ऐसा बिल्कुल नहीं है।

