
भारत की राजनीति हमेशा यहां की संस्कृति से प्रभावित रही है। जिन्होंने भी यहां की राजनीति में अपनी गहरी छाप छोड़ी है, उन्होंने यहां की संस्कृति को महज समझा ही नहीं था, बल्कि अपनी जीवन शैली को भी इस संस्कृति के अनुरूप आकार दिया था। लगता है कि राहुल गांधी ने बहुत देर से ही सही, मगर इस सूत्र को समझ लिया है या उन्हें समझा लिया गया है। राहुल इस सूत्र पर अमल करते भी दिख रहे हैं। नरेंद्र मोदी की छवि बहुत ही करीने से बनायी गई। उन्होंने बचपन में तालाब से मगरमच्छ निकाल लिया था, हिमालय की दुष्कर यात्रा की थी, बर्फीली ठंड में कठिन तपस्या की थी और बुद्ध की तरह अपनी पत्नी को छोड़कर राष्ट्र सेवा में अकेले ही चल पड़े थे। इन कहानियों के पीछे सत्ता पाने की ताक थी। यह साध पूरी हुई और नोटबंदी, जीएसटी जैसे निर्णयों में उनके गढ़ी गयी छवि तार-तार होती दिखी। हालांकि, प्रचार तंत्र के बूते यह छवि इस कदर गहरी रची गई थी कि उसे ध्वस्त होने में समय लगा। हालांकि, पूरी तरह ध्वस्त होना अभी बाकी है।
शुरुआत में राहुल गांधी ने भी एक गहरी शैक्षिक छवि बनाने की कोशिश की थी। उसी कोशिश में अपने-अपने फील्ड के कई माहिर लोगों से उन्होंने बातचीत की थी। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे रघुराज रामन से बातचीत उसी कड़ी का एक हिस्सा थी। लेकिन, राहुल गांधी या उन्हें सलाह देने वाले शायद यह भूल गए थे कि एकैडमिक पॉलिटिक्स किसी तबके के लिए होती है और उसके लिए न सिर्फ़ बहुत लंबे समय का इंतजार किया जाता है, बल्कि उसके लिए गहरी और शोधपरक किताबों की एक श्रृंखला लिखनी होती है।
राहुल को यह भी याद नहीं रहा कि एक मास अपील उन्हें विरासत में मिली है। उनकी पार्टी एक पारिवारिक प्रतिनिधित्व वाली पार्टी जरूर है है, लेकिन यह पार्टी आजादी से पहले हिंदुस्तान का एक अव्वल संगठन भी रहा है, जिसकी भूमिका आजादी पाने से पहले लंबे संघर्ष और बलिदान की रही है। आजादी से पहले की पीढ़ी अब रही नहीं,और ऊपर से वह पीढ़ी आ गई है, जिसे इतिहास से शायद बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है।
उन्हें इतिहास की कम जानकारी है और जो कुछ इस समय सोशल मीडिया से उन्हें मिल भी रही है, वह तोड़-मरोड़कर दी जा रही है। ऐसे में आजादी के संघर्ष में कांग्रेस की भूमिका से अनजान वोटरों का कांग्रेस के प्रति वह भाव नहीं हो सकता, जो राजीव गांधी तक था। ऐसे में राहुल को एक ऐसी छवि की दरकार थी,जिसके भीतर आम आदमी की सहनशीलता प्रदर्शित होती हो। आम आदमी की समझ की झलक दिखती हो।
राहुल की भारत जोड़ो यात्रा ने यह कमी पूरी कर दी है। अब लोगों को ऐसे लगने लगा है कि जिस नरेंद्र मोदी को उन्होंने संत माना था, उनके पास भले ही परिवार नहीं है, लेकिन उनका सम्बन्ध कॉरपोरेट से जुड़ता है। नरेंद्र मोदी की पार्टी के चमचमाते आॅफिस और सुसज्जित सुविधाएं, उनकी आंखों पर लगे महंगे चश्मे, बेशकीमती घड़ी और करीने से सजे उनके कोट की जेब में हजारों रुपयों की खोंसी हुई कलम उन्हें अपने माथे पर कभी-कभी लगाये गए त्रिपुंड,गंगा आरती और बद्रीनाथ के मंदिर में तपस्या से अलग बिल्कुल कर देते हैं।
वहीं भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल को ऐसी छवि बख़्शी है कि राहुल दिन में मीलों चलते हैं; महीनों से रोज-रोज चल रहे हैं; उनके साथ सैकड़ों लोग चल रहे हैं; हर तबके के लोग चल रह हैं; जिसमें कॉरपोरेट के पैसे नहीं लगे हैं और इस यात्रा की शैली इतनी साधारण है कि किसी को जुड़ने में कभी किसी तरह की कोई हिचक नहीं है।
जिस सुविधाभोगी दौर में हम जी रहे हैं, उसमें चलना कितना मुश्किल है, यह कम से कम मध्यम वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक को खूब पता है। राहुल का पैदल चलना इस दौर की एक ऐसी चीज है, जिसे तपस्या की भारतीय परंपरा के खांचे में ले आता है। राहुल जिस समृद्ध और वैभवशाली पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं,उसे देखते हुए उनकी यह यात्रा एक खास तरह का मायने अख्तियार कर लेता है।
उनकी भारत जोड़ो यात्रा अब उस उत्तर भारत से गुजर रही है, जहां कड़ाके की ठंड है। इस समय यह ठंड हड्डी कंपा रही है। मगर, राहुल की देह पर कवेल टीशर्ट है। उनकी बॉडी लैंग्वेज बताती है कि इस ठंड का उन पर कोई असर नहीं है। आम भारतीय जनमानस मानता है कि साधुओं, संन्यासियों, फकीरों को ठंड नहीं सताती। ऊपर से पचास के ऊपर के राहुल कुंवारे भी हैं। यह एक तरफ उनकी इस छवि को भारतीय परंपरा में शुचिता की हैसियत हासिल हो जाती है, तो दूसरी तरफ यह छवि पौरुषता का अहसास भी कराती है।
पिछले आठ सालों में जिस तरह की टकराहट देखी गई है, भारतीय समाज उसका आदी कभी नहीं रहा है। इससे अब आम जनमानस ऊबने लगा है। गहराते बेरोजगारी और आर्थिक संकट की मार से खासकर नौजवान बेहाल हैं। ऐसे में नई दिल्ली में भारत जोड़ो यात्रा के पड़ाव के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कार्यालय में आयोजित राहुल की प्रेस कॉन्फ्रÞेंस में सवालों के दिए गए जवाब लोगों में उम्मीद जगाते हैं।
ये जवाब बताते हैं कि इस यात्रा ने उन्हें शिक्षा,रोजगार,संस्कृति,राजनीति, और अर्थतंत्र की असलियत समझने में बेहद मदद की है। इससे लोगों की अपेक्षाओं को महसूस करने में भी सहूलियत हुई है। कड़कती ठंड में महज टीशर्ट से काम चलाने से जुड़े सवाल का जवाब राहुल गांधी ने यह बताते हुए दिया कि इस पर वह अलग से एक वीडियो बनाएंगे, जिसमें वह बताएंगे कि इसका राज क्या है और लोग कम कपड़ों में भी हार हिला देने वाली ठंड का किस तरह मुकाबला कर सकते हैं।
यह जवाब लोगों से उनकी कनेक्टिविटी की एक ऐसी कड़ी है, जो राहुल को लेकर जिज्ञासा जगाती है। जिज्ञासा की सियासत असल में लोगों को लामबंद करती है, सियासत को चर्चा में बनाए रखती है और चर्चा में बने रहना ही सियासत को सत्ता की सीढ़ी बनता है, क्योंकि चर्चाएं यूं ही नहीं होतीं। सोशल मीडिया के जरिये बना दिया गया कल का पप्पू आज नायक बनने की राह पर है और जिस कथित नायक के इशारे पर पप्पू बनाया गया था, वह बिना किसी तीन-तिकड़म के खुद पप्पू बनने के अंजाम के मुहाने पर है।
महीनों से पैदल चलते राहुल की बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ी, महंगी गाड़ियों में सफर करते मोदी की करीने से छांटी गई दाढ़ी का मुंह चिढ़ाती है; दांत कटकटाती ठंड में स्थिर भाव वाले राहुल की साधारण टीशर्ट, मोदी के महंगे और स्टाइलिश वेश-भूषा का खामोशी से मजाक उड़ाती है; शाहजादा करार दिया गया एक नौजवान त्याग से लोगों का सियासी संत बनता दिख रहा है और संतई की सियासत करते मोदी पाने की चाहत में ऐश्वर्य के प्रतीक बनते जा रहे हैं। राजनीतिक संस्कृति के ऐतबार से ये दोनों सियासी शैलियां आने वाले दिनों के साफ संकेत दे रहे ही हैं।


