Wednesday, March 4, 2026
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Utpana Ekadashi 2024: 26 नवंबर को मनाई जाएगी उत्पन्ना एकादशी, जानिए इसका महत्व और पूजा विधि

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। एकादशी व्रत का व्रत हर माह में दो बार आता है। साथ ही उत्पन्ना एकादशी का भी बहुत महत्व होता है। यह मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। पंचांग के अनुसार, अगहन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 25 नवंबर, सोमवार की रात 01: 02 मिनट से शुरू होगी, जो अगले दिन यानी 26 नवंबर, मंगलवार की रात 03:47 मिनट तक रहेगी। चूंकि 26 नवंबर को एकादशी तिथि सूर्योदय के समय रहेगी, इसलिए ये व्रत इसी दिन किया जाएगा। तो आइए जानते है उत्पन्ना एकादशी का महत्व और पूजा विधि

महत्व

मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का संबंध भगवान विष्णु की महाशक्ति मां एकादशी के जन्म से है। विष्णु पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत को सभी प्रकार के पापों और दोषों का नाश करने वाला माना गया है। उत्पन्ना एकादशी व्रत से मोक्ष की प्राप्ति होती है और यह जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। नारद पुराण के अनुसार इस दिन उपवास करके द्वादशी को गंध आदि उपचारों से भगवन श्री कृष्ण की पूजा करें। तत्पश्चात श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करके स्वयं भी अपने इष्टजनों के साथ एकाग्र होकर भोजन करें। इस प्रकार जो भक्ति भाव से ‘उत्पन्ना’ का व्रत करता है,वह अनंतकाल में श्रेष्ठ विमान पर बैठकर भगवान विष्णु के लोक में चला जाता है।

पूजा विधि

उत्पन्ना एकादशी का व्रत दशमी तिथि की रात्रि से ही शुरू हो जाता है। दशमी के दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें और मन को शुद्ध रखें। एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, चंदन, तुलसी दल, अक्षत, पीले फूल और फल अर्पित करें।

भगवान को पंचामृत अर्पित करें और धूप-दीप जलाकर विष्णु सहस्त्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। पूजा के दौरान एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। दिनभर निराहार या फलाहार व्रत रखते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करें और रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करें। अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें। यह विधि भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और जीवन के पापों से मुक्ति दिलाने में सहायक मानी जाती है।

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