जलकुंभी स्वतंत्र रूप से जल में तैरने वाला खरपतवार है। इसके पौधे ऊंचाई में कुछ सेंटीमीटर से लेकर 60 सेंटीमीटर तक के हो सकते हैं। इसका तना खोखला और छिद्रदार होता है तथा पर्व संधियों से झुंड में रेशेदार जड़ें निकलती है। इसकी पत्तियां चिकने हरे रंग की होती है। इस पौधे के फूल नीले, सफेद-बैंगनी रंग के आकर्षक होते है। इन पौधों की पत्तियों में हवा भरी होती है जिससे ये जल की सतह पर आसानी से तैर सकते है। इसके बीज लम्बे समय तक जीवित रहते है। यह खरपतवार बहुत तेजी से प्रगुणन और वृद्धि करता है और लगभग 12-15 दिन में इसकी संख्या दुगुनी हो जाती है।
समस्या नहीं रोजगार का साधन बन सकती है जलकुम्भी
इसके अधिक फैलाव के कारण नौकायन,सिंचाई, मछली पालन आदि में व्यवधान उत्पन्न होता है। जलकुम्भी अपने चटाईनुमा बढ़वार के कारण जलाशय की पूरी सतह को आच्छादित कर लेती है जिससे हवा और सूर्य का प्रकास अवरुद्ध हो जाने से जलीय जंतुओं विशेषकर मछली उत्पादन, सिंघाड़ा और मखाना उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता है। इस खरपतवार के प्रकोप के कारण नदीं, नालों और नहरों में जल प्रवाह 20-30 प्रतिशत तक घट जाता है।
इससे एक तरफ पानी की गुणवत्ता खराब होती है, तो दूसरी तरफ गर्मियों में वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ने से जलाशय और तालाब सूखने लगते है।जलकुम्भी के सड़ने से जलाशय और तालाबों का पानी प्रदूषित (गन्दा) हो जाता है । जलकुम्भी के पौधे मच्छरों आदि को भी शरण देते है जिससे मलेरिया, डेंगू जैसे घातक रोगों का प्रसार होता है। शहरी निकायों के जलस्त्रोतों से जलकुम्भी हटाने या नियंत्रित करने के लिए प्रति वर्ष हजारों-लाखों रुपए खर्च करना पड़ता है।
यदि जलस्त्रोतों से जलकुम्भी को इक्कट्ठा कर इससे विभिन्न उत्पाद बनाने के लिए बेरोजगारों को शिक्षित-प्रशिक्षित किया जाए तो यह जलीय खरपतवार समस्या नहीं रोजगार और आमदनी का एक जरिया बन सकती है।
जल कुम्भी का नियंत्रण
जलीय खरपतवारों विशेषकर जलकुम्भी के नियंत्रण के लिए इसे यंत्रों द्वारा काटकर एकत्रित कर नाव में भरकर जलस्त्रोतों से बाहर निकाला जा सकता है। इस विधि में समय,श्रम और पैसा अधिक लगता है। ऊपर से काटकर निकालने के बाद फिर से जलकुम्भी पनपने लगती है, क्योंकि इसके बीज और कन्द बहुत समय तक जीवित रहते है।
रासायनिक विधि से नियंत्रित करने के लिए अनेक प्रकार के शाकनाशी जैसे पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट और 2,4-डी के छिड़काव द्वारा भी जलकुम्भी को नियंत्रित किया जा सकता है। परन्तु इन रसायनों के उपयोग से जलस्त्रोतों के प्रदूषित होने तथा जलीय जंतुओं के अस्तित्व को संकट उत्पन्न हो सकता है।
इसलिए बड़े पैमाने पर रसायनों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। जलकुम्भी को जैविक विधि से नियंत्रित करने में नियोकेटिना आइकार्नी तथा आथोर्गेलुमना टेरेबा जैसे कीटों का प्रयोग कारगर सिद्ध हुआ है। ये कीट इन पौधों के प्रसार, फूल और बीज पैदा करने की क्षमता कम कर देते है जिससे इस खरपतवार की संख्या कम हो जाती है।
जलकुंभी के फायदे
जलकुंभी के दुष्प्रभावों के साथ-साथ इसमें बहुत से आर्थिक गुण भी पाए जाते है. ग्रामीण क्षेत्रों में पौधे का उपयोग जैव-गैस संयंत्रों में कच्चे पदार्थ के रूप में किया जा सकता है। जलकुम्भी मुलायम होने के कारण आसानी से विघटित होने वाली वनस्पति है। इसी गुण के कारण जलकुम्भी इथेनाल और बायो-गैस (मीथेन) उत्पादन के लिए वरदान साबित हो सकती है।
जैव-गैस संयंत्र में जलकुम्भी के उपयोग से गोबर की बचत होगी जिसे खाद के रूप में खेतों में उपयोग किया जा सकता है। जलकुम्भी का उपयोग कागज, रस्सी, बैग, टोकरी और अन्य सजावटी सामन बनाने में भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, जलकुम्भी को पालतू पशुओं जैसे बकरी एवं अन्य मवेशियों हेतु पौष्टिक हरे चारे के रूप में भी खिलाया जा सकता है। भैंसों को जल कुम्भी काफी पसंद है । सूखे चारे के साथ 20 प्रतिशत जलकुम्भी मिलाकर पशुओं को खिलाई जा सकती है।
जलकुम्भी पौधे का उपयोग कम्पोस्ट बनाकर कमाई का जरिया बनाया जा सकता है। जलकुम्भी से तैयार कम्पोस्ट को गृह वाटिका में सब्जियों, फलों तथा सजावटी पौधों को उगाने में प्रयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, जलकुम्भी कम्पोस्ट को नर्सरी में पौधो को तैयार करने हेतु भी प्रयुक्त किया जा सकता है। कम्पोस्ट को जमीन से निकाली गई पौध की जड़ों की नमीं को बनाये रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जलकुम्भी का उपयोग पौध प्रसारण विधियों जैसे दाव कलम (लेयरिंग) तथा रोपण (ग्राफ्टिंग) में भी किया जा सकता है।
जलकुम्भी में जल के प्रदूषकों जैसे लीड, क्रोमियम, जिंक, मैगनीज, कॉपर आदि को अवशोषित करने की क्षमता होती है। अत: पौधे का उपयोग जल शोधन में भी किया जा सकता है। इन सब के अलावा दुनिया भर में लोग अपने भोजन में इसका उपयोग पूरक आहार के रूप में करते हैं। इसमें 90 प्रतिशत पानी के अलावा कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा के अलावा विटामिन ए, विटामिन सी, रिबोफाल्विन, विटामिन बी 6, कैल्शियम की उचित मात्रा भी पायी जाती है। देश की पुरातन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में जलकुम्भी का विशेष महत्व है ।
इसके पौधे से अस्थमा, कफ, एंजाइमा, थाइराइड, शरीर के अंदरूनी दर्द, त्वचा संबंधी बीमारियों के लिए दवाइयां बनाई जाती है। जलकुम्भी का तेल और इसके सूखे पाउडर से दवाइयां तैयार की जाती है। जलकुंभी की भस्म से मोटापा, बाल गिरना, याददाश्त कमजोर होना, रूखी त्वचा, पेट की समस्या व हाथ-पैरों में ऐंठन जैसी बीमारियों से भी राहत मिलने के प्रमाण है। यहां हम किसी भी रोग के निवारण हेतु जलकुम्भी सेवन की सिफारिस नहीं कर रहे है। सक्षम चिकत्सक के परामर्श के उपरान्त ही इसके सेवन की सलाह दी जाती है ।
इस प्रकार हम देखते है की भारत के सभी राज्यों के जल स्त्रोतों विशेषकर जलाशयों एवं तालाबों में तेजी से पैर पसारती जलकुम्भी देश के बेरोजगारों और नौजवानों के लिए आकर्षक रोजगार और आमदनी अर्जित करने का साधन बन सकती है। प्रकृति प्रदत्त जल कुम्भी की समस्या को अवसर में बदला जा सकता है। जल कुम्भी से एक नावोन्वेशी स्टार्ट-अप के रूप में खेती के लिए बहुमूल्य खाद,विविध सजावटी सामान, कागज, बैग,टोकनी, धागे, दवाइयों के अलावा जैव-उर्जा का उत्पादन किया जा सकता है।