
अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। परस्पर विश्वास का गहरा संकट साफ देखा जा रहा है। पिछली कई सरकारों और राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में भारत का विश्वास अर्जित करने की जो कोशिशें हुई थीं, माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप ने उस पर पानी फेर दिया है। अमेरिका को कर्ज और आर्थिक संकट से उबारने के लिए ट्रंप ने मेक ग्रेट अमेरिका अगेन के श्लोगन के साथ दुनिया भर के देशों के साथ जिस तरह ब्लैकमेलिंग की नीति अपनाई, उसके बहुत गलत संदेश गए हैं। ग्लोबलाइजेशन के दौर में यदि आप व्यापक वैश्विक हितों की अनदेखी करते हुए संरक्षणवाद पर उतर आएं तो टकराव और संघर्ष तय ही है।
यह सही है कि अमेरिका तीस ट्रिलियन से ऊपर की अर्थव्यवस्था और बेजोड़ सैन्य शक्ति के चलते आज भी विश्व में सिरमौर बना हुआ है परंतु पिछले कुछ वर्षों में उसने जो संरक्षणवादी नीति अपनाई हैं, उससे भले ही आर्थिक तौर पर उसे थोड़ा सँभल दिया हो, परंतु जहां तक साख और सम्मान की बात है, वो उसने गवां दिए हैं। ट्रंप का अपने दूसरे कार्यकाल में भारत के प्रति जिस तरह रुख बदला है, उससे वैश्विक राजनीति पर बारीक निगाह रखने वाले भी हैरान हैं क्योंकि ऐसा कोई कारण समझ में नहीं आ रहा कि पिछले कार्यकाल में जो पाकिस्तान उनकी निगाहों में आतंक की जननी था, वह अचानक स्वर्ग जैसा साफ सुधरा कैसे हो गया। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीम को फेवरेट बताकर उनके लिए व्हाइट हाउस में लंच होस्ट करने वाले ट्रंप को इतनी तो समझ होगी ही कि इसे भारत कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। मसला केवल भारत-पाकिस्तान नीति में यू-टर्न का ही नहीं है।
भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत प्राय बताना, उससे पूर्व शांति का नोबल प्राइज पाने की जल्दबाजी में कूटनीतिक मर्यादा का उल्लंघन कर अपनी ओर से भारत-पाकिस्तान के बीच सीज फायर का ऐलान कर देना, विदेश मंत्रालय के खंडन करने के बावजूद उसे बारंबार दोहराते रहना, संसद में प्रधानमंत्री के स्पष्ट इंकार के बाद भी उसे रिपीट करना और रूस से र्इंधन खरीदने के बचकाना बहाना बनाते हुए पचास प्रतिशत टैरिफ थोप देना, ऐसी कार्रवाई रही जिन्होंने भारत का भरोसा भी तोड़ा और उसके सम्मान को ठेस भी पहुंचाई।
जिस अर्थव्यवस्था को ग्यारवें स्थान से चौथे स्थान तक ले आया गया है और जहां कई महानगरों में ट्रंप टावर खड़े हैं, जहां दीपावली जैसे पर्व पर छह लाख करोड़ का कारोबार होता हो, उसे यदि आप मरणासन्न अवस्था में बता रहे हैं और फिर भी अपने मन मुताबिक ट्रेड डील करने का दबाव बना रहे हैं तो कोई भी आत्म स्वाभिमानी राष्ट्र इसे स्वीकार नहीं करेगा। वही भारत ने किया भी है। भारी भरकम पचास प्रतिशत टैरिफ दो ही देशों पर लगा है। एक ब्राजील और दूसरा भारत पर। चीन और रूस ने भी चूकि उनकी मनमानीपूर्ण नीतियों को मानने से इंकार कर दिया है, इसलिए ट्रंप ने चीन पर पहली नवंबर से सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर डाली है। रूस पर अनेक तरह के प्रतिबंध पहले से चले आ रहे हैं, अब उसकी दो बड़ी तेल कंपनियों पर भी पाबंदी लगा दी है। इनसे भारत और चीन कच्चा ईंधन खरीदते आ रहे हैं। इनमें से एक की जामनगर स्थित नायरा रिफाइनरी में हिस्सेदारी भी है। यानी ट्रंप अब भारत को आर्थिक नुकसान पहुंचाने पर आमादा हैं। एचबी वन वीजा पर दस गुना फीस बढ़ाकर जहां उन्होंने भारतीय प्रतिभाओं का रास्ता रोकने की कोशिश की है, वहीं चाबहार पोर्ट को 2018 में प्रतिबंधों से जो छूट दी गई थी, उसे भी वापस लेने का ऐलान कर दिया है। बेतहाशा टैरिफ से भारत की अनेक कंपनियों, कारोबारियों और क्षेत्रों को बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है।
ट्रंप को शायद लग रहा होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनसे संपर्क कर इन पाबंदियों को हटाने की अनुनय विनय करेंगे परंतु ऐसा हुआ नहीं। जब पीएम जी-सेवन समिट में भाग लेने कनाडा पहुंचे तब भी दोनों की भेंट नहीं हो सकी क्योंकि ट्रंप सीज फायर पर अवांछित बयानबाजी करने के बाद मोदी का सामना नहीं करना चाहते थे, लिहाजा वहां से रवाना हो गए। बाद में उनकी पीएम से फोन पर बात हुई तो कहा कि वाशिंगटन होते हुए निकल जाएं, जिसे पीएम ने अस्वीकार कर दिया। मोदी की उनके तौर तरीकों से नाराजगी का आलम यह रहा कि वह यूएन एसेंबली को संबोधित करने भी नहीं गए। विदेश णंत्री एस जयशंकर को भेज दिया। इजिप्ट में गाजा पीस समिट में भाग लेने के लिए जब प्रधानमंत्री को बुलाया गया, तब भी वह शर्म-अल-शेख नहीं गए।
वहां बीस-बाईस देशों के राष्ट्र प्रमुख आमंत्रित किए गए थे, जिनमें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी थे। हर बात का श्रेय लेने के लिए ट्रंप आजकल जिस तरह की नाटकीयता करते हैं, मोदी उसका हिस्सा नहीं बनना चाहते। मलेशिया में आसियान देशों की समिट में हिस्सा लेने के लिए चूकि ट्रंप भी पहुंचे हैं, इसलिए मोदी ने वहां जाने का कार्यक्रम भी टाल दिया। इस बीच दो ऐसे अवसर आए, जब ट्रंप ने अपनी ओर से उन्हें फोन किए। एक मोदी के 75 वें जन्म दिन पर बधाई देने के लिए और दूसरा दीपावली की शुभकामनाएं देने के लिए। दोनों फोन काल के बाद उन्होंने फिर से कुछ ऐसे दावे कर डाले, जिनका विदेश मंत्रालय को खंडन करना पड़ा। प्रधानमंत्री का नाम लेकर ट्रंप ने कहा कि मेरे दोस्त ने मुझसे ये वादा किया है कि भारत दिसंबर तक रूस से ईंधन खरीदना बंद कर देगा। यानी जो बात हुई ही नहीं, उसका ऐलान कर देना। और यही कारण है कि मोदी उनसे मिल ही नहीं रहे हैं।
ट्रंप और मोदी के इन कूटनीतिक दांव-पेंच को दुनिया भर में बड़े कौतूहल के साथ देखा जा रहा है। जब से पहलगाम नरसंहार के डिजायनकार आसिम मुनीर को ट्रंप ने अपनी गोद में बैठाया है, उसी समय से भारत ने यह मान लिया कि अब मौजूदा ट्रंप सरकार के साथ आगे नहीं बढ़ा जा सकता। लिहाजा भारत ने अपनी राह पकड़ ली है। यानी अमेरिका के मनमाने टैरिफ के चलते भारत के जिन क्षेत्रों को झटका लगा है, उससे उबरने के लिए नए सहयोगियों की तलाश और उनसे ट्रेड डील के रास्ते तलाशने का काम बहुत तेजी से भारतीय वाणिज्य और विदेश मंत्रालय कर रहा है।
भारत को इसकी भी जानकारी है कि ट्रंप के पाक में व्यक्तिगत हित हैं, जिन्हें वो साधने में लगे हैं। ट्रंप के रहते भारत अब अमेरिका के साथ सहज हो पाएगा, लगता नहीं। इस समय ट्रंप अपने देश में भी कई मोर्चों पर घिरे हुए हैं। मनमाने टैरिफ और देशों को धमकाने की नीति के चलते भारत ही नहीं, चीन, रूस और ब्राजील भी नाराज हैं। कई और ऐसे देश अमेरिका के साथ सहज अनुभव नहीं कर रहे, जिनकी अर्थव्यवस्थाएं दरअसल निर्यात पर ही आधारित हैं। भारत के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। इस बात का जरूर उसे अफसोस है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में जितनी अच्छी समझबूझ दोनों देशों में रही, उतनी ही खराब उनके दूसरे कार्यकाल में हो चुकी है। और इसमें किसी सुधार की अभी गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही है।

